Uttar pradesh

यह वाकई ‘नया भारत’ है जो अंधविश्वास के रास्ते पर धड़ल्ले से आगे बढ़ रहा है?

सुभाष गाताडे तांत्रिकों के सान्निध्य में मंत्रियों का जाना और पाप-पुण्य के फेर में पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना अंधश्रद्धा पर सरकारी मुहर ल...


सुभाष गाताडे
तांत्रिकों के सान्निध्य में मंत्रियों का जाना और पाप-पुण्य के फेर में पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना अंधश्रद्धा पर सरकारी मुहर लगाना है.

जनाब भूपेंद्र सिंह चूडास्मा, जो गुजरात के शिक्षा मंत्री हैं और आत्माराम परमार, जो राज्य के सामाजिक न्याय मंत्रालय का ज़िम्मा संभाले हैं, वह दोनों पिछले दिनों अचानक सुर्खियों में आए. वजह थी उस वीडियो का वायरल होना जिसमें दिखाया गया था कि भरी सभा के सामने तांत्रिक अपना कारनामा दिखा रहे थे, पीछे संगीत की धुन चल रही थी, वह अपने को लोहे की जंजीरों से पीट रहे थे और जनता ही नहीं, बल्कि गुजरात के उपरोक्त दोनों मंत्री उस नज़ारे को देख रहे हैं.

स्पष्ट है कि उनका यह आचरण भारतीय संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल था जो धारा 51 ए /एच/ में स्पष्ट करती है कि यह सभी नागरिकों की बुनियादी ज़िम्मेदारी होगी कि ‘वह वैज्ञानिक चिंतन, मानवता और अनुसंधान को विकसित करेंगे.’ बहरहाल, मंत्रीद्वय को लगा होगा कि ‘झाड़ फूंक करने वालों’ के सम्मान समारोह में- जिसमें वह करीब सौ ओझाओं से हाथ मिलाते भी दिखे- उनकी सहभागिता को या तो नज़रअंदाज़ किया जाएगा या ज़रूरत पड़ने पर आस्था की दुहाई देते हुए उचित ठहराया जा सकेगा, जो उन दोनों ने किया.

जनाब चूडास्माा ने कहा कि ‘वह दैवी शक्ति के उपासकों का मेला था न कि ऐसे लोगों का जो अंधश्रद्धा फैलाते हैं.’ श्री परमार ने यह कहते हुए अपना बचाव किया कि ‘जो लोग उनकी सहभागिता का विरोध कर रहे हैं, वह हिंदू संस्कृति के बारे में जानते नहीं हैं. वह दैवी शक्ति वाले पवित्र लोग थे.’

वैसे यह बात रेखांकित करने वाली रही कि उनकी इस सहभागिता का मसला सुर्खियां बना रहा, यहां तक कि दलितों और अन्य उत्पीड़ित तबकों ने यह कहते हुए विरोध प्रदर्शन किए कि मंत्रीद्वय ने घातक अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने का काम किया. लोगों को यह बात भी विचलित करने वाली लगी कि ग्रामीण गुजरात ऐसे हज़ारों तांत्रिकों/ओझाओं के चंगुल में होने के बावजूद- जो अंधश्रद्धा से युक्त तमाम कारनामों को अंजाम देते हैं – इन मंत्रियों को इस समारोह से कुछ गुरेज़ नहीं था.

याद रहे ऐसे झाड़-फूंक करने वालों की ज़्यादतियों को बेपर्दा करने के लिए तर्कशील आंदोलन से जुड़े लोग लंबे समय से सक्रिय रहे हैं. ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं कि एकल महिलाओं की संपत्ति छीनकर उसे उनके रिश्तेदारों को सौंपने के मामले में भी इन ओझाओं का हाथ रहता आया है \, जो महिला को डायन घोषित कर देते हैं.

पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र ने तो डॉ. दाभोलकर की अगुआई में संचालित ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ के तहत चले लंबे अभियान के बाद ऐसे आचारों, व्यवहारों को रोकने के लिए- जो जनता की अंधश्रद्धा का इस्तेमाल करते हैं – एक कानून भी बनाया है, जिसके तहत सैकड़ों ऐसे लोगों पर कार्रवाई भी हुई है जो काला जादू या अन्य अघोरी प्रथाओं का प्रयोग करते हैं. अपने इन्हीं प्रयासों के लिए डॉ. दाभोलकर को शहीद होना पड़ा.

गौरतलब है कि जून के पूर्वार्द्ध में हुई इस घटना को लेकर बहस जारी ही थी कि उत्तर प्रदेश से एक अलग ढंग से ख़बर आई, जिसमें बताया गया कि कांवड़ यात्रा के रास्ते में जो गूलर के पेड़ दिखते हैं – जिसे अंजीर नाम से भी जाना जाता है – उनकी छंटाई होगी क्योंकि कांवड़ियों की निगाह में वह ‘अपवित्र’ होते हैं.

ध्यान रहे कि कांवड़ यात्रा का मौसम श्रावण माह /जुलाई के दूसरे सप्ताह में/ शुरू होता है, जिसमें शिव के भक्त मीलों चल कर गंगा का पानी लाते हैं और उससे शिव की मूर्ति का अभिषेक करते हैं. इस बार कांवड़ यात्रा की तैयारियों की बैठक की अध्यक्षता खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने की थी.

उधर गूलर के पेड़ की खासियत यह बताई जाती है कि वह अपने फलों के चलते हमेशा पक्षियों को आकर्षित करता है, सदाबहार रहता है और संस्कृतियों के संगम का प्रतीक है और उसमें कई औषधीय गुण हैं, जो कई दुर्लभ बीमारियों में काम आते हैं. इतना ही नहीं, छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में और यूपी के कुछ हिस्सों में उसे बेहद पवित्र समझा जाता है, यहां तक कि लोगों की शादी का मंडप भी गूलर की लकड़ी से ही बनता है.

दरअसल ज्योतिषियों का एक हिस्सा यह कहता है कि कांवड़िये अगर गूलर के पेड़ के नीचे से गुजरे तो यात्रा में हासिल ‘पुण्य’ कम हो जाता है. प्रश्न उठता है कि श्रद्धालु खुद यह तय करे कि जिन चीज़ों को, स्थानों को वह अपवित्र मानता है, उसके बारे में खुद निर्णय ले, यह एक सेक्युलर कहलाने वाली सरकार का ज़िम्मा कैसे हो सकता है कि वह नागरिकों के एक हिस्से के ‘पुण्य’ के खाते का हिसाब-किताब रखे और उसके लिए जनता के टैक्स एकत्रित धन से कदम उठाए.

जाहिर है कि कांवड़िए- जिनकी तादाद कुछ करोड़ बताई जाती है – की मान्यताओं को वरीयता प्रदान करके एक तरह से बहुमत की आवाज़ को न केवल अनसुना कर दिया गया है बल्कि उनकी अंधश्रद्धा पर भी आधिकारिक मुहर लगाई है. समाचार यह भी मिला है बहुसंख्यक समुदायों या उनके एक मुखर हिस्से के आग्रहों को देखते हुए या उन्हें खुश करने के लिए योगी सरकार ने सूबे के 75 जिलों की हर तहसील में नए पेड़ लगाने की मुहिम के तहत ‘नवग्रह वाटिका’, ‘पंचवटी’, ‘हरीशंकरी’ जैसों को स्थापित करने का ऐलान किया है जिन पेड़ों का वर्णन हिंदुओं की धार्मिक किताबों में प्रस्तुत किया गया है.

पेड़ों की ग़ैर-ज़रूरी छंटाई – जिसका पर्यावरणवादियों और तर्कशील समूहों ने विरोध किया है – या तांत्रिकों के सम्मान समारोह में मंत्रियों की मौजूदगी जैसे कदम छोटे जान पड़ सकते हैं, अगर हम जानें कि किस तरह एक सूबे / राजस्थान/ के शिक्षा मंत्री ने गोआतंक के बढ़ते दिनों में यह अवैज्ञानिक दावा किया कि गाय आॅक्सीजन का उत्सर्जन करती है.

गाय की ‘पवित्रता’ में एक और ‘प्रमाण’ देने वाला यह वक्तव्य एक ऐसे समय दिया गया था जब स्वयंभू गोरक्षकों के आतंक में उछाल आया दिखता है, जहां वह बात बात पर किसी को भी जान से खतम करने को आमादा दिखते हैं.

‘इंडियास्पेंड’ नामक एक वेबसाइट ने यह बताया कि ‘मई, 2014 में जबसे प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है तबसे ऐसे हमलों की 97 फीसदी घटनाएं हुई हैं और गाय संबंधी हिंसा की आधी से अधिक घटनाएं यानी 63% में से 32% उन राज्यों से सुनने को मिली हैं, जहां भाजपा का शासन रहा है. 25 जून, 2017 तक दर्ज रिकार्ड पर यह विश्लेषण आधारित है.

कोई यह कह सकता है कि आखिर अंधश्रद्धा फैलाने के लिए क्या महज भाजपा शासित राज्यों को ही ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उसे बढ़ावा देने में शासक वर्गों की अन्य पार्टियां भी सक्रिय रहती हैं. इसमें निश्चित ही कोई दो राय नहीं है.

ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जब राज्य में सूखे की स्थिति के मद्देनज़र अन्य पार्टी /जैसे कांग्रेस/ ने सूबे के विभिन्न प्रार्थनास्थलों में विशेष पूजा का आयोजन किया या ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं कि नवनिर्मित तेलंगाना और आंध प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने वास्तुदोष दूर करने के नाम पर करोड़ों रुपया अपने मकानों के नवीनीकरण पर खर्च किया या अपने देवताओं को खुश करने के लिए यज्ञ का आयोजन किया ताकि उनके द्वारा शासित राज्य समृद्धि की ओर बढ़ें.

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने के मामले ने हाल के वर्षों में तेज़ गति ग्रहण की है, जबसे केंद्र में हिंदू दक्षिणपंथ की सरकार आई है, जिसका सीधा ताल्लुक संघ के असमावेशी फलसफे से है. हम याद कर सकते हैं कि किस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने रिलायंस फाउडेशन द्वारा स्थापित अस्पताल के उदघाटन के अवसर पर ‘चिकित्साविज्ञान को मिथकशास्त्र’ और गणेश और कर्ण की कथाओं को उद्धृत करके पुराणों में प्लास्टिक सर्जरी और जेनेटिक साइंस की उपस्थिति की बात कही थी.

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि हिंदुत्व दक्षिणपंथ के उभार ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस की बहसों को भी प्रभावित किया है – जहां यह देखने में आया है कि छद्म विज्ञान को विज्ञान के आवरण में पेश किया जा रहा है या वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा मिलने वाली राशि में कटौती जारी है तथा एक विशिष्ट एजेंडा को आगे बढ़ाने में उनका इस्तेमाल हो रहा हैै.

साल की शुरुआत में तिरुपति में आयोजित ‘भारत विज्ञान कांग्रेस’ के अधिवेशन को लेकर वैज्ञानिकों के एक हिस्से एवं लोक विज्ञान तथा तर्कशील आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने अपनी आपत्ति पहले ही दर्ज की थी. जाने माने वैज्ञानिक और सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलेक्युलर बायोलॉजी के पूर्व निदेशक पीएम भार्गव द्वारा इस संबंध में जारी बयान काफी चर्चित भी हुआ था जब उन्होंने विज्ञान कांग्रेस में विज्ञान एवं आध्यात्मिकता जैसे मसलों पर सत्र आयोजित करने के लिए केंद्र सरकार तथा विज्ञान कांग्रेस के आयोजकों की तीखी भर्त्सना की.

उनका कहना था कि ‘मैं अभी तक चालीस से अधिक बार भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशनों को 1948 के बाद से उपस्थित रहा हूं मगर विज्ञान को अंधश्रद्धा के समकक्ष रखना एक तरह से भारतीय विज्ञान के दिवालियेपन का सबूत है.’ उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि यह महज सरकार का दोष नहीं है मगर वैज्ञानिक समुदाय का भी है जिन्हें ऐसे सम्मेलन में शामिल होने से इनकार करना चाहिए था.

जानकार बता सकते हैं कि यह पहली दफा नहीं है जब विज्ञान कांग्रेस की बैठकें गलत कारणों से सुर्खियां बनीं. इसकी एक झलक बीते विज्ञान कांग्रेस में आयोजित विशेष व्याख्यान में देखी गई थी जब बुलाए गए ‘विद्वानद्वय’ ने प्राचीन भारत में किस तरह विमान उड़ाने की क्षमता थी, इसे लेकर विस्तार में बातें रखी थीं.

विज्ञान की नई शाखा के तौर पर काउपैथी का आगमन या गोविज्ञान का इस क्लब में नया प्रवेश हुआ है. अभी पिछले ही माह राष्ट्रीय स्तर के तमाम विज्ञान विभागों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं ने इस संबंध में एक नए साझे कदम का ऐलान किया है.

डिपार्टमेंट आॅफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी द्वारा ‘पंचगव्य’ की वैज्ञानिक पुष्टि और इस सिलसिले में अनुसंधान को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन किया गया है. इस 19 सदस्यीय कमेटी का कार्यकाल तीन साल का होगा. यह देखना दिलचस्प होगा कि चीजें किस तरह आगे बढ़ती हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके नेतृत्व में अक्सर नए भारत के निर्माण की बात करते रहते हैं. यूपी विधानसभा में मिली जीत के बाद यह स्वर और तेज हुआ है. अगर हम हमारे इर्दगिर्द घटित होते परिदृश्य को देखें तो स्पष्ट होता है कि यह वाकई एक ‘नया भारत’ है. एक ऐसा भारत जिसने बीते पूर्वाग्रहों, अलगावों एवं भेदभावों को नए सिरे से खोजा है और वह अतार्किकता के रास्ते पर धड़ल्ले से आगे बढ़ रहा है. साभार द वायर

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CARE OF MEDIA: यह वाकई ‘नया भारत’ है जो अंधविश्वास के रास्ते पर धड़ल्ले से आगे बढ़ रहा है?
यह वाकई ‘नया भारत’ है जो अंधविश्वास के रास्ते पर धड़ल्ले से आगे बढ़ रहा है?
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