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नवरात्रि का शुभ मुहूर्त: जानिए कब क्या करें जिससे पूर्ण हों सभी कार्य

नवरात्रि का शुभ मुहूर्त: जानिए कब क्या करें जिससे पूर्ण हों सभी कार्य


-आचार्य पं. श्रीकान्त पटैरिया जी के द्वारा

प्रत्येक साल में चैत्र, आषाढ़, आश्विन (क्वार) और माघ महीनों में चार बार नवरात्रि आते हैं ,लेकिन चैत्र और आश्विन माह की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक चलने वाले नवरात्रि ही ज्यादा लोकप्रिय हैं जिन्हें पूरे देश में बङी धूम धाम से मनाई जाती है। आराधना के लिये श्रेष्ठ माना जाता है। धर्म ग्रंथों, पुराणों के अनुसार चैत्र नवरात्रों का समय बहुत ही भाग्यशाली बताया गया है। इसका एक कारण यह भी है कि प्रकृति में इस समय हर और नये जीवन का, एक नई उम्मीद का बीज अंकुरित होने लगता है। जनमानस में भी एक नई उर्जा का संचार हो रहा होता है। लहलहाती फसलों से उम्मीदें जुड़ी होती हैं। सूर्य अपने उत्तरायण की गति में होते है। ऐसे समय में मां भगवती की पूजा कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करना बहुत शुभ माना गया है।

चैत्र नवरात्र 06 अप्रैल से प्रारम्भ होकर 14 अप्रैल 2019 दिन रविवार को प्रातः 5 बजकर 48 मिनट तक नवमी तत्पश्चात दशमी तिथि तक होगा । संवत्सराम्भ एवं पक्षारम्भ 6 अप्रैल 2019 दिन शनिवार को ही प्रतिपदा तिथि सूर्योदय से दोपहर 02 बजकर 21मिनट तक रहेगीं। 06 अप्रैल से ही वासन्तिक नवरात्रि की शुरुआत होगी । 05 अप्रैल दिन शुक्रवार को दोपहर 01 बजकर 23 मिनट पर  प्रतिपदा तिथि लग जाएगी,  जो अगले दिन 6 अप्रैल को दोपहर 02 बजकर 21 मिनट तक रहेगी ,इसके बाद  द्वितीया तिथि लग जायेगी । अतः उदया तिथि के कारण नवरात्रि का आरम्भ 06अप्रैल दिन शनिवार से ही माना जायेगा । धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश स्थापना प्रतिपदा को अर्थात पहले दिन 06 अप्रैल 2019 को ही की जाएगी,

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त लाभ एवं अमृत चौघड़िया तथा शुभ अभिजीत मुहुर्त्त में किया जाना अति उत्तम होता है। इस वर्ष प्रातःकाल शुभ ग्रह की लग्न में 07:53 बजे से 09:51 बजे तक शुभग्रह लग्न में सर्वोत्तम है। यदि किसी कारण नही कर पाए तो अभिजीत मुहूर्त्त एवं मध्यान्ह 11:30 से 12:18 बजे तक किया जाना उत्तम होगा। वैसे इस वर्ष घटस्थापना सुबह सूर्योदय से दोपहर 02:21 से पूर्व प्रतिपदा तिथि में किया जा सकता है।

इस प्रकार प्रतिपदा 6 अप्रैल 2019 को सूर्योदय 5 बजकर 49 मिनट से शुरु होगी। जो 12 अप्रैल 2019 दिन शुक्रवार को सुबह 10:03 बजे से 13 अप्रैल दिन शनिवार को सुबह दिन में 08:04 बजे तक अष्टमी तिथि रहेगी, उसके बाद नवमी तिथि लग जायेगा। 13 अप्रैल दिन शनिवार को महानवमी का व्रत होगा क्योंकि 13 अप्रैल को सुबह 08:04 बजे के बाद ही नवमी तिथि लग जायेगी जो 14 अप्रैल की सुबह 05 बजकर 48 मिनट तक ही विद्यमान रहेगी अतः नवमी तिथि में ही नवरात्र सम्बंधित हवन -पूजन 14अप्रैल को प्रातः 05:48 बजे के पूर्व किसी भी समय किया जा सकता है । नवरात्रि का पारण दशमी तिथि 14 अप्रैल दिन रविवार को प्रातः काल 05 बजकर 48 मिनट के बाद किया जाएगा। साथ ही 13 अप्रैल दिन शनिवार को मध्यान्ह नवमी तिथि होने के कारण प्रभु श्री राम की जयतीं यानी रामनवमी का पुण्य पर्व भी मनाया जायेगा।

(नोट, जिसके यहां अष्टमी का हवन होता है वो 12 मार्च को करे जिनके यहां नवमी का हवन होता है वो लोग 13 मार्च 2019 को करे )
नवरात्री में नौ देवियों की पूजा होती है ये नौ देवियाँ है..

1. शैलपुत्री

शैल" का अर्थ है पहाड़। चूंकि माँ दुर्गा पर्वतों के राजा, हिमालय के यहाँ पैदा हुई थीं, इसी वजह से उन्हे पर्वत की पुत्री यानि "शैलपुत्री" कहा जाता है।

2. ब्रह्मचारिणी

इसका तात्पर्य है- तप का पालन करने वाली या फिर तप का आचरण करने वाली। इसका मतलब यह भी होता है, कि एक में ही सबका समा जाना। इसका यह भी अर्थ निकलता है,कि यह सम्पूर्ण संसार माँ दुर्गा का एक छोटा सा अंश मात्र ही है।

3. चंद्रघंटा

माता के इस रूप में उनके मस्तक पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र अंकित है। इसी वजह से माँ दुर्गा का नाम चंद्रघण्टा भी है।

4. कूष्मांडा

इसका अर्थ समझने के लिए पहले इस शब्द को थोड़ा तोड़ा जाए। 'कू' का अर्थ होता है- छोटा। 'इश' का अर्थ- ऊर्जा एवं 'अंडा' का अर्थ- गोलाकार। इन्हें अगर मिलाया जाए तो इनका यही अर्थ है, कि संसार की छोटी से छोटी चीज़ में विशाल रूप लेने की क्षमता होती है।

5. स्कंदमता

दरअसल भगवान शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का एक अन्य नाम स्कन्द भी है। अतः भगवान स्कन्द अर्थात कार्तिकेय की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस रूप को स्कन्दमाता के नाम से भी लोग जानते हैं।

6. कात्यायनी

एक कथा के अनुसार महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उनके वरदान स्वरूप माँ दुर्गा उनके यहाँ पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं। चूंकि महर्षि कात्यायन ने ही सबसे पहले माँ दुर्गा के इस रूप की पूजा की थी, अतः महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण माँ दुर्गा कात्यायनी के नाम से भी जानी जाती हैं।

7. कालरात्रि

मां दुर्गा के इस रूप को अत्यंत भयानक माना जाता है, यह सर्वदा शुभ फल ही देता है, जिस वजह से इन्हें शुभकारी भी कहते हैं। माँ का यह रूप प्रकृति के प्रकोप के कारण ही उपजा है।

8. महागौरी

माँ दुर्गा का यह आठवां रूप उनके सभी नौ रूपों में सबसे सुंदर है। इनका यह रूप बहुत ही कोमल, करुणा से परिपूर्ण और आशीर्वाद देता हुआ रूप है, जो हर एक इच्छा पूरी करता है.

9. सिद्धिदात्री

माँ दुर्गा का यह नौंवा और आखिरी रूप मनुष्य को समस्त सिद्धियों से परिपूर्ण करता है। इनकी उपासना करने से उनके भक्तों की कोई भी इच्छा पूर्ण हो सकती है। माँ का यह रूप आपके जीवन में कोई भी विचार आने से पूर्व ही आपके सारे काम को पूरा कर सकता है।

पूजा का कृत्य प्रारम्भ। प्रातःकाल नित्य स्नानादि कृत्य से फुरसत होकर पूजा के लिए पवित्र वस्त्र पहन कर उपरोक्त पूजन सामग्री व श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक ऊँचे आसन में रखकर, पवित्र आसन में पूर्वाविमुख या उत्तराभिमुख होकर भक्तिपूर्वक बैठे और माथे पर चन्दन का लेप लगाएं, पवित्री मंत्र बोलते हुए पवित्री करण, आचमन, आदि को विधिवत करें। तत्पश्चात् दायें हाथ में कुश आदि द्वारा पूजा का संकल्प करे। आज ही नवरात्री मे नवदुर्गा पूजन हेतु अपना स्थान सुरक्षित करे |
सभी प्रकार की कामनाओ हेतु।

(०1)
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यषो देहि द्विषो जहि।।
अगर आप की अनावश्यक विलम्ब हो रहा है तो इस मंत्र का प्रयोग करते हुए पाठ करे,

(०2)
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।

(03)रोग से छुटकारा पाने के लिए:


रोगानषेषानपहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।
पूजन करने की विधि:
मंत्रों से तीन बार आचमन करें।

(04)
मंत्र ॐ केशवाय नमः,
ॐ नारायणाय नमः,
ॐ माधवाय नमः

(05)
हृषिकेषाय नमः बोलते हुए हाथ धो लें।

(06) आसन धारण के मंत्र:

ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।

(07) पवित्रीकरण हेतु मंत्र:

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षंतद्बाह्याभ्यन्तरं शुचि।।

(०8) चंदन लगाने का मंत्रः

ॐ आदित्या वसवो रूद्रा विष्वेदेवा मरूद्गणाः। तिलकं ते प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये।।

(9) रक्षा सूत्र मंत्र (पुरूष को दाएं तथा स्त्री को बांए हाथ में बांधे)
मंत्रः

ॐ येनबद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।तेनत्वाम्अनुबध्नामि रक्षे माचल माचल ।।

(10) दीप जलाने का मंत्रः

ॐ ज्योतिस्त्वं देवि लोकानां तमसो हारिणी त्वया। पन्थाः बुद्धिष्च द्योतेताम् ममैतौ तमसावृतौ।।

(11) संकल्प की विधिः

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरूषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपराद्र्धे श्रीष्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे- ऽष्टाविंषतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे
श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुकषर्मा अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतोल
आदि मंत्रो को शुद्धता से बोलते हुए शास्त्री विधि से पूजा पाठ का संकल्प लें।
प्रथमतः श्री गणेश जी का ध्यान, आवाहन, पूजन करें।

(12) श्री गणेश मंत्र:

ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकायेषु सर्वदा।।

कलश स्थापना के नियम :-

पूजा हेतु कलश सोने, चाँदी, तांबे की धातु से निर्मित होते हैं, असमर्थ व्यक्ति मिट्टी के कलश का प्रयोग करत सकते हैं। ऐसे कलश जो अच्छी तरह पक चुके हों जिनका रंग लाल हो वह कहीं से टूटे-फूटे या टेढ़े न हो, दोष रहित कलश को पवित्र जल से धुल कर उसे पवित्र जल गंगा जल आदि से पूरित करें। कलश के नीचे पूजागृह में रेत से वेदी बनाकर जौ या गेहूं को बौयें और उसी में कलश कुम्भ के स्थापना के मंत्र बोलते हुए उसे स्थाति करें। कलश कुम्भ को विभिन्न प्रकार के सुगंधित द्रव्य व वस्त्राभूषण अंकर सहित पंचपल्लव से आच्छादित करें और पुष्प, हल्दी, सर्वोषधी अक्षत कलश के जल में छोड़ दें। कुम्भ के मुख पर चावलों से भरा पूर्णपात्र तथा नारियल को स्थापित करें। सभी तीर्थो के जल का आवाहन कुम्भ कलश में करें।

(13) आवाहन मंत्र करें:

ॐ कलषस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू ।।

(14) षोडषोपचार पूजन प्रयोग विधि -

आसन (पुष्पासनादि):
ॐ अनेकरत्न-संयुक्तं नानामणिसमन्वितम्। कात्र्तस्वरमयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम्।।

(15) पाद्य (पादप्रक्षालनार्थ जल):

ॐ तीर्थोदकं निर्मलऽचसर्वसौगन्ध्यसंयुतम्। पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं तेप्रतिगृह्यताम्।।

(16) अघ्र्य (गंध पुष्प्युक्त जल):

ॐ गन्ध-पुष्पाक्षतैर्युक्तं अध्र्यंसम्मपादितं मया।गृह्णात्वेतत्प्रसादेन अनुगृह्णातुनिर्भरम्।।

(17) आचमन (सुगन्धित पेय जल):

ॐ कर्पूरेण सुगन्धेन वासितं स्वादु षीतलम्। तोयमाचमनायेदं पीयूषसदृषं पिब।।

(18) स्नानं (चन्दनादि मिश्रित जल):

ॐ मन्दाकिन्याः समानीतैः कर्पूरागरूवासितैः।पयोभिर्निर्मलैरेभिःदिव्यःकायो हि षोध्यताम्।।

(19) वस्त्र (धोती-कुत्र्ता आदि):

ॐ सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे। मया सम्पादिते तुभ्यं गृह्येतां वाससी षुभे।।

(20) आभूषण (अलंकरण):

ॐ अलंकारान् महादिव्यान् नानारत्नैर्विनिर्मितान्। धारयैतान् स्वकीयेऽस्मिन् षरीरे दिव्यतेजसि।।

(21) गन्ध (चन्दनादि):

ॐ श्रीकरं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। वपुषे सुफलं ह्येतत् षीतलं प्रतिगृह्यताम्।।


(22) पुष्प (फूल):

ॐ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्त्तितः।
मयाऽऽहृतानि पुष्पाणि पादयोरर्पितानि ते।।

(23) धूप (धूप):

ॐ वनस्पतिरसोद्भूतः सुगन्धिः घ्राणतर्पणः।सर्वैर्देवैः ष्लाघितोऽयं सुधूपः प्रतिगृह्यताम्।।

(24) दीप (गोघृत):

ॐ साज्यः सुवर्तिसंयुक्तो वह्निना द्योतितो मया।गृह्यतां दीपकोह्येष त्रैलोक्य-तिमिरापहः।।

(25) नैवेद्य (भोज्य)

ॐ षर्कराखण्डखाद्यानि दधि-क्षीर घृतानि च। रसनाकर्षणान्येतत् नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।।

(26) आचमन (जल)

ॐ गंगाजलं समानीतं सुवर्णकलषस्थितम्। सुस्वादु पावनं ह्येतदाचम मुख-षुद्धये।।

(27) दक्षिणायुक्तताम्बूल(द्रव्य पानपत्ता):

ॐ लवंगैलादि-संयुक्तं ताम्बूलं दक्षिणां तथा। पत्र-पुष्पस्वरूपां हि गृहाणानुगृहाण माम्।।

(28) आरती (दीप से):

ॐ चन्द्रादित्यौ च धरणी विद्युदग्निस्तथैव च। त्वमेव सर्व-ज्योतींषि आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम्।।

(29) परिक्रमाः

ॐ यानि कानि च पापानि जन्मांतर-कृतानि च। प्रदक्षिणायाः नष्यन्तु सर्वाणीह पदे पदे।।
भागवती एवं उसकी प्रतिरूप देवियों की एक परिक्रमा करनी चाहिए।यदि चारों ओर परिक्रमा का स्थान न हो तो आसन पर खड़े होकर दाएं घूमना चाहिए।


(30) क्षमा प्रार्थना:

ॐ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि भक्त एष हि क्षम्यताम्।। अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम। तस्मात्कारूण्यभावेन भक्तोऽयमर्हति क्षमाम्।। मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं तथैव च। यत्पूजितं मया ह्यत्र परिपूर्ण तदस्तु मे।।

(31 )
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पष्यन्तु मा कष्चिद् दुःख-भाग्भवेत् ।

आचार्य पं. श्रीकान्त पटैरिया(ज्योतिष विशेषज्ञ)

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