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Thursday, June 13, 2019

उजाले शेष हैं !


ध्रुव गुप्त 
कविता साहित्य की सबसे नाज़ुक विधा है, मगर दुर्भाग्य से आज सबसे ज्यादा अनाचार कविता के साथ ही हो रहा है। बौद्धिक आतंकवाद और अबूझ शब्दजाल ने कविता को आमजन की पहुंच से बहुत दूर कर दिया है। कविता किसी भी दौर की हो, वह मानसिक व्यायाम नहीं, हार्दिकता का स्पर्श होती है। कविताएं दुनिया नहीं बदलतीं। वे विश्व की अर्थव्यवस्थाएं भी नहीं तय करतीं। वे आपमें सिर्फ संवेदना पैदा करती है ताकि आप दुनिया को बदलने का ख्वाब देख सकें। कविता नफ़रत और गुस्से का विस्तार नहीं, दिलों में जगह बनाने की कोशिश में लगा मुहब्बत का खामोश जज़्बा है। कविता खोखले शब्द नहीं, शब्दों में खनखनाती भावुकता है। जैसे आंखों में चमकती ओस। जैसे हथेली पर रखा गुलाब। कथ्य कुछ भी हो, कवि की संवेदना जहां पाठक या श्रोता की दबी संवेदनाओं को खुरच कर जगा दे कविता वहीँ संभव होती है। वर्तमान कविता परिदृश्य में कुछ गिनती के ही युवा कवि हैं जो कविता को उसकी जड़ों तक लौटाने के लिए प्रयासरत हैं। युवा कवि श्लेष अलंकार निःसंदेह उनमें से एक हैं।

श्लेष अलंकार का पहला कविता संकलन 'उजाले शेष हैं' की कविताएं पढ़ते हुए ताज़ा हवा के झोंकों से गुजरने का अहसास होता है। इन कविताओं में कहीं बौद्धिक छद्म नहीं, कोई आयातित विषय नहीं, भावनाओं की कृत्रिमता नहीं, शब्दों की बाजीगरी नहीं। हमारे आसपास की चीजों, स्थितियों, रिश्तों और उनसे जुड़ी भावनाओं की पुनर्रचना करते हुए वे हमें उस संसार में ले जाती हैं जो पहचाना हुआ होते हुए भी किसी तिलिस्म-सा लगता है। कविताओं के गांव, उनकी पगडंडियां, उनके घर-आंगन, घर के चूल्हों से उठता धुआं, नदी-पोखर, खेत, फसल, पक्षी, हवा, बारिश और उनके बीच से उठती एक परिचित गंध हमारी स्मृतियों को बड़ी मासूमियत से कुरेदती चलती हैं। कविताओं में हर तरफ मानवीय और पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट पसरी हुई महसूस होती है। इनमें प्रतीक्षा करती मां है, बचपन है, दोस्त हैं, किशोरावस्था की रूमानियत है, विगत प्रेम का अवसाद है, पीछे छूटती जा रही कोमल स्मृतियां हैं,जवानी के संघर्ष हैं, सामाजिक अंतर्विरोध हैं और इन सबके बीच है रिश्तों की आत्मीयता को बचा ले जाने की कवि की बेचैनी।

श्लेष की कविताओं की अंतर्धारा में एक मासूम कच्चापन है जो थोड़ा अनगढ़ होते हुए भी हमें फिर से गढ़ता है। एक भावुकता है जो जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी हमें खुद से परिचित कराती चलती है। एक आकुलता है जो भीतर तक बेचैन करती है। इन कविताओं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें पढ़ लिए जाने के बाद शब्द तो विगत हो जाते हैं, मगर उनका आत्मीय स्पर्श अंतर्मन पर लंबे समय तक बना रहता है। इन कविताओं का शिल्प आरोपित नहीं है। कवि की भावनाएं स्वयं अपना शिल्प गढ़ती चलती हैं। गांव-गवई की सोंधी गंध लिए कविताओं की भाषा में एक आत्मीय और सहज प्रवाह है। शब्द जाने-पहचाने हैं और इसीलिए वे पाठकों के साथ सीधा संबंध बनाते चलते हैं।

श्लेष अलंकार कविता की उस धारा के साथ खड़े हैं जो जीवन के बीच से गुजरती है और गहरे जीवन-मूल्यों को संस्कारित करती है। कृत्रिम जीवन-स्थितियों और छद्म बौद्धिकता के भार से दबी कविताओं के इस समय में यह जरूरी है कि जीवन से गहरे जुड़े कवियों की कविताओं को एक आत्मीय स्वीकृति मिले।
(यह किताब amazon पर उपलब्ध है)

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