जानिए श्राद्ध क्या है और क्यों करना चाहिए श्राद्ध

जानिए श्राद्ध क्या है और क्यों करना चाहिए श्राद्ध


स्कंद पुराण के अनुसार पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं। दूर की पूजा भी ग्रहण कर लेते हैं और दूर से की गई स्तुति से भी संतुष्ट हो जाते हैं। देवता और पितर गंध तथा रस तृण से तृप्त होते हैं। जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न का सार तत्व है। जिस प्रकार गोशाला में बिछड़ी हुई माता को बछड़ा किसी न किसी प्रकार ढूंढ़ ही लेता है, उसी प्रकार मंत्र आहूत द्रव्य को पितरों के पास किसी न किसी प्रकार पहुंचा ही देता है। अपने पितरों का तिथि अनुसार श्राद्ध करने से पितृ प्रसन्न होकर अनुष्ठाता की आयु को बढ़ा देते हैं। साथ ही धन धान्य, पुत्र-पौत्र तथा यश प्रदान करते हैं।
   
महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है कि पितर लोग श्राद्ध से तृप्त होकर आयु, पूजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, राज्य एवं अन्य सभी सुख प्रदान करते हैं। ‘आयु: प्रजां, धनं विद्यां स्वर्गं, मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छान्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितां महा:॥ याज्ञ स्मृति 1/270।

श्राद्ध चंद्रिका में कर्म पुराण के माध्यम से वर्णन है कि श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याण कर वस्तु है ही नहीं इसलिए समझदार मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध का अनुष्ठान करना चाहिए। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में कहा गया है कि श्राद्ध की कोई भी वस्तु व्यर्थ नहीं जाती, अतएव श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

हमारे धर्म शास्त्रों में श्राद्ध के सम्बन्ध में इतने विस्तार से विचार किया गया है कि इसके सामने अन्य समस्त धार्मिक कार्य गौण लगने लगते हैं. श्राद्ध के छोटे से छोटे कार्य के सम्बन्ध में इतनी सूक्ष्म मीमाँसा और समीक्षा की गई है कि विचारशील व्यक्ति तो सहज में ही चमत्कृत हो उठते हैं. वास्तव में मृत माता-पिता एवं अन्य पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया दान ही “श्राद्ध” है. हम यूँ भी कह सकते हैं कि श्रद्धापूर्वक किए जाने के कारण ही इसे श्राद्ध कहा गया है. श्राद्ध से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर आईये डालते हैं एक नजर धार्मिक दृष्टिकोण से…………!!!
“श्राद्धकल्पता” अनुसार पितरों के उद्देश्य से श्रद्धा एवं आस्तिकतापूर्वक पदार्थ-त्याग का दूसरा नाम ही श्राद्ध है.

पित्रयुद्देश्येन श्रद्दया तयक्तस्य द्रव्यस्य
ब्राह्मणैर्यत्सीकरणं तच्छ्राद्धम !!

“श्राद्धविवेक” का कहना है कि वेदोक्त पात्रालम्भनपूर्वक पित्रादिकों के उद्देश्य से द्रव्यत्यागात्मक कर्म ही श्राद्ध है—-श्राद्धं नाम वेदबोधित पात्रालम्भनपूर्वक प्रमीत पित्रादिदेवतोद्देश्यको द्रव्यत्यागविशेष: !

पितरों को भोज्य पदार्थो का श्राद्धापूर्वक अर्पण ही श्राद्ध है। ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि ‘देशे काले च पात्रे च श्राद्धया विधिना चयेत। पितृनुद्दश्य विप्रेभ्यो दत्रं श्राद्धमुद्राहृतम’॥ श्राद्धतत्व में पुलस्त्य जी कहते हैं कि श्राद्ध में संस्कृत व्यंजनादि पकवानों को दूध, दही, घी आदि के साथ श्राद्धापूर्वक देने के कारण ही  इसका नाम श्राद्ध पड़ा, ‘संस्कृत व्यज्नाद्यं च पयोदधिद्यतान्वितम्’ श्राद्धया दीयते यस्माच्छाद्ध तेन प्रकीर्तितम्’।

” गौडीय श्राद्धप्रकाश” अनुसार भी देश-काल-पात्र पितरों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक हविष्याण,तिल,कुशा तथा जल आदि का त्याग-दान श्राद्ध है—देशकालपात्रेषु पित्रयुद्देश्येन हविस्तिलदर्भमन्त्र श्रद्धादिभिर्दानं श्राद्दम !

शास्त्र के अनुसार पिता का श्राद्ध पुत्र को भी करना चाहिए। पुत्र न हो तो पत्नी श्राद्ध करे। पत्नी न हो तो सहोदर भाई और उसके अभाव में जामाता और दौहित्र भी श्राद्ध के अधिकारी हैं। माता का श्राद्ध पिता के ही साथ किया जाना चाहिए। मत्स्य पुराण में श्राद्ध का सर्वाधिक उपयुक्त समय दोपहर के बाद 24 मिनट का माना गया है। श्राद्ध के दौरान तीन गुण जरूरी हैं, पहला क्रोध न हो, दूसरा पवित्रता बनी रहे, तीसरा जल्दबाजी न हो। श्राद्धकर्ता को ताम्बूल, तेल मालिश, उपवास, औषधि तथा परान्न भक्षण आदि से वर्जित किया गया है।श्राद्ध भोजन ग्रहण करने वाले को भी पुनभरेजन, यात्रा, भार ढोना, दान लेना, हवन करना, परिश्रम करना और हिंसा आदि से वर्जित किया गया है। श्राद्ध में काला उड़द, तिल, जौ, सांवा, चावल, गेहूं, दुग्ध पदार्थ, मधु, चीनी, कपूर, बेल, आंवला, अंगूर, कटहल, अनार, अखरोट, नारियल, खजूर, नारंगी, बेर, सुपारी, अदरख, जामुन, परवल, गुड़, कमलगट्टा, नींबू, पीपल आदि प्रयोज्य बताए गए हैं।
वृहत्पराशर में श्राद्ध की अवधि में मांस भक्षण और मैथुन कार्य आदि का निषेध किया गया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार श्राद्ध के सात्विक अन्न व फलों से पितरों की तृप्ति करनी चाहिए। शंखस्मृति, मत्स्य पुराण में कदम्ब, केवड़ा, मौलसिरी, बेलपत्र, करवीर, लाल तथा काले रंग के सभी फूल एवं उग्र गंध वाले सभी फूल वर्जित किए गए हैं।

इसके साथ ही श्राद्ध में कमल, मालती, जूही, चम्पा और सभी सुगंधित श्वेत पुष्प तथा तुलसी व भृंगराज प्रयोज्य बताए गए हैं। श्राद्ध चंद्रिका में केले के पत्ते का भोजन के उपयोग में वर्जित किया गया है। पत्तल से काम लिया जा सकता है, परंतु भोजन के सर्वाधिक उपयुक्त सोने, चांदी, कांसे और तांबे के पात्र बताए गए हैं।

श्राद्ध भोजन ग्रहण करने वालों के लिए रेशमी वस्त्र, कम्बल, ऊन, काष्ठ, तृण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ कहे गए हैं। काष्ठ आसनों में भी कदम्ब, जामुन, आम, मौलसिरी एवं वरुण के आसन श्रेष्ठ बताए गए हैं परंतु इनके निर्माण में लोहे की कोई कील नहीं होनी चाहिए। जिन आसनों का श्राद्ध में निषेध किया गया है उनमें पलाश, वट, पीपल, गूलर, महुआ आदि के आसन हैं।

श्राद्ध भोजन करने वालों में उनकी प्रज्ञा, शील एवं पवित्रता देखकर उन्हें आमंत्रित करने का विधान है। अपने इष्ट मित्रों तथा गोत्र वालों को खिलाकर संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। श्राद्ध में चोर, पतित, नास्तिक, मूर्ख, मांस विक्रेता, व्यापारी, नौकर, शुल्क लेकर शिक्षण कार्य करने वाले, अंधे, धूर्त लोगों को नहीं आमंत्रित किया जाना चाहिए (मनुस्मृति, मत्स्य पुराण और वायु पुराण)। श्राद्ध में तर्पण को दायें हाथ से करना चाहिए। तिल तर्पण खुले हाथ से होना चाहिए। तिल को हाथ, रोओं में तथा हस्तबुल में नहीं लगे रहना चाहिए।

यह सच है कि हमारे पितृ यानी पूर्वज श्राद्ध कर्म से संतृप्त होते हैं। अत: श्राद्ध की विधि को श्रद्धापूर्वक संपन्न किया जाना चाहिए। पक्ष के दौरान यदि निष्ठा के साथ पूर्वजों को सिर्फ जल भी अर्पित किया जाए, तो सहज ही प्रसन्न हो जाता हैं। वैदिक पंरपरा मे श्राद्ध की विधि में चार कर्म बताए गए हैं। पिंडदान, हवन, तर्पण और ब्राह्मण भोजन। ‘हवन पिंड दानश्च श्राद्धकाले कृताकृतम’। इस नियम के अनुसार यदि संभव हो, तो श्राद्ध में पिंडदान और हवन किया जा सकता है। यदि संभव न हो तो, पिंडदान भी छोड़ा जा सकता है। लेकिन दर्पण और ब्राह्मण भोज श्राद्ध का मुख्य अंग हैं। इनके करने से पूर्वजों को तृप्ति मिलती है। इसलिए इस कर्म को अवश्य करें।
श्राद्ध करना जरूरी है, क्योंकि मृत्यु के पश्चात कभी कोई जीव बहुत दिनों तक बेहोश हो जाता है तो उसको होश में लाने के लिए श्राद्ध होता है। कहीं वह जीव कीट, पतंग आदि की योनि में चला जाता है तो उसको कृत्यकारक भोजन मिले- इसके लिए भी श्राद्ध की आवश्यकता है। कोई भूत-प्रेत-पिशाच हो जाए तो उसको उस योनि से छुड़ाने के लिए भी श्राद्ध की आवश्यकता होती है।
श्राद्ध में एक, तीन या पांच सदाचारी एवं धार्मिक स्वभाव के ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान हैं। भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों को वस्त्र, द्रव्य और दक्षिणा देने की परंपरा हैं। अत: भोजन के बाद ब्राह्मणों को तिलक लगाकर दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना श्राद्ध के उद्धेश्य पूरे नहीं होते।
फिर श्राद्धकर्ता को अपने बंधु-बांधवों के साथ श्राद्धान्न का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार विधिवत श्राद्ध करने से पितर संतुष्ट होकर धन और वंश की वृद्धि का आर्शीवाद देते हैं।
नरक में हो तो नरक से मुक्त हो और स्वर्ग में हो तो वहां उसको विषय-सुख मिले-इसलिए भी श्राद्ध होता है। जीव जहां भी होगा वहां उसके पास भगवान श्राद्ध का सुख भेज देंगे। यदि वह भगवान से मिल गया होगा या मुक्त हो गया होगा तो श्राद्ध का जो फल है, वह श्राद्ध करने वाले के पास लौटकर आ जाएगा और उसको मिल जाएगा। इसलिए वह जो श्रद्धा-संपाद्य, श्रद्धा के द्वारा सम्पन्न होने वाला कर्म है, इसको कर लेना ही अच्छा रहता है।

इसलिए मरने के बाद आत्मा रहती है, यह विश्वास श्राद्ध से प्राप्त होता है। अपने पिता के जीवन-काल में यदि कोई अवज्ञा हुई हो तो उसका परिमार्जन हो जाता है। परलोक है, कर्म का फल मिलता है-ये सब बातें श्राद्ध करना चाहिए और अगर दूसरा कोई करने वाला न हो या उसके करने पर विश्वास न हो, तो स्वयं कर लेना चाहिए।

श्राद्ध गांव में या नगर में भी होता है, नदी तट पर भी होता है और तीर्थ में भी होता है। अत: यदि कोई आपका श्राद्ध करने वाला हो, और उस पर आपका विश्वास हो तो बहुत बढ़िया है। उस पर श्राद्ध का भार छोड़ दीजिए। मरने वाले जीव के लिए श्राद्ध आवश्यक है।


श्राद्ध न करने से हानि:–

जो लोग यह समझकर कि पितर हैं ही कहाँ—श्राद्ध नही करता, पितर-लोग लाचार होकर उसका रक्तपान करते हैं. जो उचित तिथि पर जल से अथवा भोजा इत्यादि से भी श्राद्ध नहीं करता,पितर उसे श्राप देकर अपने लोक को लौट जाते हैं. मार्कण्डेयपुराण का कहना है कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता,वहाँ वीर,निरोगी,शतायु पुरूष नहीं जन्म लेते. जहाँ श्राद्ध नहीं होता, वहाँ वास्तविक कल्याण नहीं होता.

श्राद्ध में महत्व के साथ पदार्थ :–

गंगाजल, दूध,शहद, कुशा,सूती कपडा, दौहित्र और तिल–ये कुल सात श्राद्ध में बहुत ही महत्व के प्रयोजनीय हैं.
इनके अतिरिक्त श्राद्धकर्म में तुलसी की भी विशाल महिमा कही गई है. तुलसी की गंध से पितृगण प्रसन्न होकर, पूर्णत: तृप्ति को प्राप्त कर इस लोक से विष्णुलोक की ओर गमन कर जाते हैं.

श्राद्धकर्ता के लिए वर्ज्य सात वस्तुएं:–

पान खाना, उपवास, स्त्रीसंभोग,औषध,दातुन करना और पराये अन्न का सेवन करना—ये सात वस्तुएं श्राद्धकर्ता के लिए वर्जित हैं. यदि भूल से इनमें से किसी वस्तु का प्रयोग हो भी जाए तो प्रायश्चित कर 108 बार गायत्री मन्त्र का जाप अवश्य कर लेना चाहिए.
इसके अतिरिक्त श्राद्ध में ताँबें के बर्तनों का बहुत महत्व है. लोहे/स्टील के बर्तनों का श्राद्ध में कदापि उपयोग नहीं करना चाहिए. रसोई बनाते अर्थात खाना बनाने में भी इनका उपयोग नहीं किया जाता. केवल काटने या धोने इत्यादि के लिए इन्हे प्रयोग में लाया जा सकता है.


श्राद्ध में प्रशस्त अन्न:- 

फलादि, काले उडद,तिल,जौं,श्यामक चावल, गेहूँ, दूध के बने सभी पदार्थ, शहद, चीनी,कपूर, आँवला, अंगूर, कटहल, गुड, नारियल, नींबूं, अखरोट इत्यादि पदार्थ प्रशस्त कहे गये हैं. अत: इनका अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए.


श्राद्ध में निषिद्ध अन्न:-

चना, मसूर, सत्तू, मूली, जीरा, कचनार, काला नमक, लौकी, बडी सरसों, सरसों का शाक, खीरा, और कोई भी बासी, गला-सडा,कच्चा, अपवित्र फल या अन्न निषिद्ध है. 

श्राद्ध में पाठय प्रसंग :-

श्राद्धकाल में पुरूषसूक्त,श्रीसूक्त,सौपर्णाख्यान, श्रीभागवतगीता, ऎन्द्रसूक्त,सोमसूक्त,सप्तार्चिस्तव,मधुमती अथवा अन्य किसी पुराणादि का पठन-श्रवण अवश्य करना चाहिए.

श्राद्ध कैसे करें :—


भारत में किसी भी तीर्थ पर जाकर पितृ की तिथि अनुसार योग्य विद्वान ब्राह्मण द्वारा कर्मकांड के अंतर्गत सर्वप्रथम तीर्थ के देवता, ऋषि मंडल, पितृ एवं द्विय मनुष्य के निमित्त श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करें। उत्तर तथा दक्षिण दिशा में क्रमशः देव, ऋषि, यम, पितृ आदि का तर्पण वैदिक पद्धति से शांत चित्त से करना चाहिए।कैसे समझें पितृ अतृप्त हैं :—

कभी परिवार में अस्थिरता का वातावरण हो, परिवारजन मानसिक तनाव के दौर से गुजर रहे हों तो मत्स्यपुराण का संकेत है कि उस घर के पितृ अतृप्त हैं, अतः वैदिक रीति से श्राद्ध करें। श्राद्घ ज्येष्ठ या कनिष्ठ पुत्र को करना चाहिए। इनकी अनुपस्थिति या श्रद्धारहित होने पर मंझला पुत्र श्राद्ध करने का अधिकारी है।तो प्रसन्न होंगे पितृ :—

तीर्थ पर तर्पण, सुपिंडि श्राद्ध तथा पितृ दोष होने पर नारायण बल्ली कर्म द्वारा सुपिंडि श्राद्ध, अनवष्टका श्राद्ध, दर्श श्राद्ध तथा इन सबके निमित्त ब्राह्मण भोजन, बटुक, कन्या को भोजन करा यथेष्ठ वस्तुदान करने से पितृ प्रसन्न होकर शुभाशीष देते हैं। अन्त में एक बात, कि श्राद्ध में भोजन के समय मौन रहना चाहिए. माँगने या प्रतिषेद करने का इशारा हाथ से करना चाहिए. खाना खाते हुए पंडित जी से यह नहीं पूछना चाहिए कि “खाना कैसा है ?”, अन्यथा पितर निराश होकर लौट जाते हैं.

इन बातों/चीजों  भी रखें ध्यान——• श्राद्ध के दिन पवित्र भाव से पितरों के लिए भोजन बनवाएं और श्राद्ध कर्म करें।
• मध्याह्न में कुश के आसन पर स्वयं बैठें और ब्राह्मण को बिठाऐं। एक थाली में गौं, कुत्ता और कौवे के भोजन रखें। दूसरी थाली में पितरों के लिये भोजन रखें। इन दोनों थाली में भोजन समान ही रहेगा। सबसे पहले एक-एक करके गौ, कुत्ता और कौवे के लिए अंशदान करें और उसक बाद अपने पितरों का स्मरण करते हुए निम्न मंत्र का तीन बार जाप करें।

“”ॐ देवाभ्य: पितृभ्यश्च
महायोगिभ्य एव च।
नम: स्वधायै स्वाहायै
नित्यमेव भवन्तु ते।।””

• यदि उक्त विधि को करना आपके लिए संभव न हो, वो जलपात्र में काले तिल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके तर्पण कर सकते है।

• यदि घर में कोई भोजन बनाने वाला न हो, तो फलों और मिष्ठान का दान कर सकते हैं।

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जानिए श्राद्ध क्या है और क्यों करना चाहिए श्राद्ध
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