अगर आप पत्रकार हैं तो डॉन बनने की कोशिश ना करें

अगर आप पत्रकार हैं तो डॉन बनने की कोशिश ना करें


नदीम अख्तर 
एक बात याद रखिएगा। अगर आप पत्रकार हैं तो डॉन बनने की कोशिश ना करिए। पत्रकार हैं तो पहले विनम्र बनिए। आपका आव-ताव दफ्तर का जूनियर सहेगा, मुहल्ले का चाय वाला चीकू भी नहीं। और अगर आप वरिष्ठ पत्रकार हैं, तो situation को handle करना आना चाहिए। बतौर पत्रकार मेरा पाला कोर्ट के जज और पुलिस से पड़ चुका है। एक अखबार का संपादक था। मेरी गाड़ी चेकिंग में पुलिस ने रोक ली। पर मैंने हेकड़ी नहीं दिखाई। ना ही थानेदार या किसी और को बुलवाया या हड़काया। अपना परिचय भी किसी को नहीं दिया। चाहता तो सीधे एसपी या कलक्टर से बात कर सकता था पर उसमें मेरी ही बेइज़्ज़ती होती।
सो अपने क्राइम रिपोर्टर को फोन लगाया और कहा कि थाने वाले यहां मेरी आवभगत कर रहे हैं। गाड़ी रोक ली है। बाकी जनता भी हलकान है। तुम्हारी बीट के अफसर बहुत ईमानदारी से चेकिंग कर रहे हैं। क्या ख्याल है, पैदल आ जाऊं? मेरा रिपोर्टर बेचारा झेंप गया। कहा, सर आप रुकिए, अभी पहुंचता हूँ। थानेदार को टाइट करता हूँ। हमने मना कर दिया कि नहीं। पहले तुम आओ। फिर देखते हैं। रिपोर्टर भागा-भागा आया। ना जाने क्यों, वो बेचारा शर्मिंदा हो रहा था। हमने कहा-किसी को कुछ नहीं कहना है, बस मैं यहां से जाना चाहता हूँ।
रिपोर्टर दौड़कर थाने में गया। साथ में थाना प्रभारी भी आया। आते ही मुआफी मांगने लगा कि सर आपने बताया क्यों नहीं! आप बाहर खड़े रहे ये तो मेरे लिए शर्म की बात है। हमने कहा कि कोई बात नहीं। जो कागज पत्तर चाहिए घर से मंगवा देता हूँ, आप कहें तो। वह और शर्मिंदा हो गया। बोला सर आप इस शहर के सम्मानित नागरिक हैं, आप जाइए। आप तो दूसरों की खबर लेते हैं। आपका लिखा अखबार में पढ़ता हूँ। आइए चाय तो पी लीजिए। हमने कहा कि कलक्टर साहब भी बुलाते हैं चाय पीने। कभी गया नहीं, आपके साथ पी लूंगा, पर आज नहीं। फिर कभी।
दफ्तर आया तो शाम की मीटिंग में रिपोर्टर को कहा कि इस।पुलिस चेकिंग पर खबर लिख देना। उसने जनता की परेशानी का ज़िक्र करते हुए पुलिस की नेगेटिव खबर लिख दी। हमने कहा, ये नहीं चलेगा। ये बताओ कि पुलिस ये सीजनल चेकिंग क्यों करती है? और उगाही भी होती है क्या? टारगेट पूरा करना होता है क्या? कोई दीर्घकालिक रणनीति क्यों नहीं है प्रशसन के पास? सारे एंगल डालो। तब जाकर खबर पूरी होगी।
इसी तरह दिल्ली के करोलबाग में पोलिस से सामना हुआ। तब पत्रकारिता में नया था और दिल्ली के गफ्फार मार्किट में मोबाइल खरीदने जाना हुआ। बस से उतरते ही किसी ने मेरा बटुवा उड़ा लिया। पत्रकार था तो थाने जाकर FIR का निवेदन किया। पुलिस वाले हंसने लगे।
बोले कि क्या सबूत है कि बटुवा बस में ही मारा गया। कहीं गिरा दिए होंगे। कोई एनसीआर काट देते हैं। हमने बहुत कहा पर वे FIR दर्ज करने को राजी नहीं थे। फिर हम SHO के पास गए और अपना परिचय देते हुए कहा कि FIR करानी है। एसएचओ बोले कि नहीं होगी। खोया-पाया की रसीद ले लो। हमने कहा कि FIR तो आपको दर्ज करनी ही होगी। बाहर आकर हमने अखबार के चीफ रिपोर्टर को फोन किया और सारी बात बताई। उन्होंने कहा कि क्या करना है।
हमने कहा कि इज़्ज़त की बात है। FIR से नीचे नहीं मानूंगा क्योंकि मेरा पर्स चोरों के गैंग ने उड़ाया है। उन्होंने कहा, रुकिए। डीसीपी का फोन आएगा, आप SHO के पास बैठो। मैं एसएचओ के पास जाकर इधर उधर की बात करने लगा। तभी डीसीपी का फोन आ गया। एसएचओ जय हिंद सर बोलकर उठ गया। जी सर, जी सर बोलते हुए हांफने लगा। फिर कातर निगाह से मेरी तरफ देखकर बोला कि आप मानेंगे नहीं। साहब का फोन आ गया है। उसने एक पुलिस वाले को बुलाकर FIR का आदेश दिया।
मैंने दफ्तर आकर सारी बात अपने चीफ रिपोर्टर को बताई। उन्होंने कहा-खबर लिखिए। हमने आंखों देखा हाल लिख डाला और ये भी बताया कि थाने में फोटो कॉपी मशीन तक नहीं है। बुरा हाल है दिल्ली पुलिस का। नवभारत टाइम्स के सिटी पेज पर मेरी खबर लगभग 40 फीसद हिस्से में बड़ी सी ज्यों की त्यों छपी। ये दिल्ली पुलिस की कार्यशैली का आँखोदेखा काला चिट्ठा था। एकदम सीन दर सीन।
अगले दिन एसएचओ का फोन मेरे पास आया। कहने लगा कि आपका काम भी कर दिया और आपने खबर भी छाप दी। ये अच्छा नहीं किया। पुलिस हेड क्वार्टर ने संज्ञान ले लिया है। अब तो जांच होगी और आपको बार-बार थाने आना पड़ेगा। हमने भी मज़ा लिया कि भाई साब! अबकी बार थाने पुलिस कमिश्नर को साथ लेकर आऊंगा। आप भी तैयारी रखना। उसने झट फोन रख दिया। इसके बाद फिर कभी उसका फोन नहीं आया। बस नाक की लड़ाई थी। FIR दर्ज करवा लिया था।
एक बार बतौर संपादक अखबार की तरफ से जज के सामने पेश हुए। अखबार में कोई विज्ञापन गलत जगह छप गया था, वो भी पिछले संपादक के दौर में। पर कोर्ट में हाज़िर मुझे होना पड़ा। जज साहब पूरी अकड़ में थे। मुझे कोर्ट रूम में बीच में खड़ा कर दिया गया। जज ने पूछा कि क्या करते हैं अखबार में? हमने कहा कि संपादक की ज़िम्मेदारी निभाते हैं। जज बोले-क्या होता है ये संपादक? लगा जैसे वो मुझे ज़लील करना चाह रहे हैं।
उनकी टोन मुझे अच्छी नहीं लगी और मेरा पारा चढ़ गया। पर खुद पर काबू रखते हुए जज साहब को अखबार में संपादक होने का मतलब समझाया। जज ने फिर तुनककर बोला-तो फिर ये विज्ञापन गलत कैसे छप गया? दोनों पक्षों के वकील मेरी तरफ मुखातिब थे। मुझे जज साहब के ज्ञान पे हंसी आयी और सोचा कि मेरा काम ही दुनिया को समझाना रह गया है। इनको भी बोधिसत्व का ज्ञान दिए देता हूँ। फिर उनको अखबार के विज्ञापन विभाग, संपादकीय टीम, विज्ञापन छपाई की प्रक्रिया सब समझाई और कहा कि वैसे भी ये पुराने वाले संपादक के दौर का मामला है। मेरे काल की घटना नहीं।
अखबार के वकील ने मुझे इशारा किया और मैं वहां से हट गया। जज कुछ लिखने लगा। बाहर आकर मैंने वकील को कहा कि आइंदा जबतक ज़रूरत ना हो, इस तरह के चिन्दी चोर मामलों में मुझे ना बुलायेगा। ये तो अखबार के मैनेजमेंट के एक बड़े अधिकारी ने रिक्वेस्ट की थी, तो मैं आ गया वरना आपको फीस किस बात के मिलते हैं कि एक छोटा सा मामला आप टैकल नहीं कर पा रहे! संपादक की हाजिरी लगवा दी! कमाल हो यार वकील साब! वकील खींसे निपोरने लगा। हे हे हे सर, क्या करिएगा, ये सब छोटे जज पागल होते हैं। हमने कहा कि आगे से ख्याल रखना, कम से कम मैं तो दुबारा नहीं आने वाला।
कहने का मतलब ये है कि परिस्थितियों को अपने हिसाब से tackle करना भी पत्रकारिता की ट्रेनिंग का अहम हिस्सा होता है। कहाँ गरम होना है, कहाँ नरम होना है, कहाँ अपनी इज़्ज़त बचानी है, ये सब आपको खुद जज करना पड़ता है। एक दफा स्पेशल इंटरव्यू में कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी और दूसरी दफा ज्योतिरादित्य सिंधिया भी फैल गए थे। हमने साफ कह दिया कि इंटरव्यू होगा तो जैसा मैं चाहता हूँ। जो सवाल मेरे हैं, आपको उनका जवाब देना होगा। वरना मैं अपने संपादक को बता दूंगा कि वे मुझे क्लर्क समझकर नोट्स लिखवा रहे थे, इंटरव्यू नहीं दिया। तब जाकर दोनों लाइन पे आए थे। वो किस्सा फिर कभी।

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