विवाह या लिव इन!

विवाह या लिव इन!

शादाब सलीम
विवाह पर बात चल रही थी तो श्री संजय वर्मा ने नित गंभीर बात कह दी। उन्होंने कहा- विवाह कोई आदिम युग का औजार मालूम होता है पर आज तक विवाह से बेहतर कुछ नहीं आया।
यह बहुत गहरी और सार्थक बात है, कोई बहुत जीवन का अनुभव लिया आदमी ही ऐसी बात कह सकता है, कोई नकली आदमी ऐसी बात नहीं कह सकता।
मैं कुछ प्रश्नों में ज़माने भर से मथा रहा। कुछ फेमिनिस्ट मेरे मित्र रहे उन्होंने कहा विवाह बड़ी बुरी संस्था है। मैंने लोगों को देखा उन्होंने कहा विवाह से ज़्यादा नीरस और मूर्खता वाला काम धरती पर कुछ नहीं है, यह बहुत नीरस प्रथा है।
अनेक विचारकों को इस पर देखा, धर्म टटोलो, सब के अपने अपने मत थे। उन लोगो को भी देखा जो विवाह नाम की संस्था पर चुटकले बनाते है।
जो प्रश्न मुझे मथते रहे उनमे सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि विवाह नहीं तो फिर क्या?
मैं मान लेता हूँ- विवाह स्त्री विरोधी है, विवाह नीरस प्रथा है, विवाह मज़ाक बनाने लायक ही है पर प्रश्न फिर वही है कि विवाह नहीं तो फिर क्या?
उसके बदल में इंसानो के पास क्या व्यवस्था है। बच्चे कैसे पैदा किये जाएंगे? यह दुनिया कैसे किस तरह मैंटेन की जाएगी? सेक्स का क्या होगा लोग कैसे सेक्चुअल रिलेशन मैंटेन करेंगे?
इसके जवाब में बहुत सारी चीज़ें आती है पर सबसे ज्यादा निकट जो है वह लिव इन है। शादी के बाद कोई व्यवस्था है तो लिव इन।
एक व्यक्ति था। कुछ दिन मेरी उससे मित्रता रही। दो एक दफा इंदौर भी आया। वह नगर नगर घूमा करता था। वह स्वयं को फ्री सेक्स का हिमायती कहता था। कभी दिल्ली कभी बम्बई कभी बेंगलुरु चला करता था। मैंने उससे कहा तुम क्यों घूमा करते हो? उसने कहा मेरी मस्ती है, मैं संत स्वभाव का आदमी हूँ।
कुछ समय बाद खबर आई कि वह नगर नगर घूम कर औरतें फांसा करता था और उनके साथ सेक्स करता, उनकी नंगी तस्वीरे मांगता था। बहुत औरतों ने उसके खिलाफ शिकायत करी, फिर भाग गया और कभी नज़र नहीं आया। वह औरतें फ्री सेक्स और लिव इन के नाम पर फांसता था।
शादी के जितने दुष्परिणाम सामने नहीं आते है उससे चार गुना अधिक दुष्परिणाम लिव इन के नज़र आते है। लिव इन में कभी भी कोई भी मुँह उठाकर चल देता है। आप उसे रोक नहीं सकते। शादी से अधिक स्त्री विरोधी मुझे लिव इन मालूम हुआ। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो औरतें पुरुष के मुकाबले जल्दी नहीं जाती है, जुड़ती देर से और जाती भी देर से है, औरतों का मनोविज्ञान अलग है। पुरुष बहुत जल्दी आता है और बहुत जल्दी जाता है।
सेक्स के मामले में भी औरतें पुरुष से भिन्न होती है वरना जिस तरह औरतों के इनबॉक्स पुरुषों के मैसेज से भरे होते है वैसे ही पुरुषों के औरतों के मैसेज से भरे होते। दुनिया भर में औरतों के वेश्यालय चलते है पुरुषों के नहीं है और यदि है भी तो पिटा गए है। पश्चिम ने सब कुछ बेच लिया पर औरतों को सेक्स नहीं बेच पाया क्योंकि सेक्स औरतों के लिए केवल आनंद नहीं है जिस तरह पुरुष के लिए केवल आनंद भी हो सकता है वह कचरा बिनने वाली औरतें के साथ सेक्स कर लेता है, इंदौर मंदसौर हाइवे के बांछड़ा डेरो पर भी पुरुष सेक्स कर लेते है। इसलिए फ्री सेक्स की थ्योरी भी पिटा गयी और इसके सारे समर्थक भी पिटा गए। रजनीश के जीवन की सबसे बड़ी भूल फ्री सेक्स का समर्थन करना रहा है अन्यथा वह बेहद तार्किक और सार्थक बातों के जनक है।
शादी सार्वभौमिक है। विश्व की लगभग हर एक व्यवस्था शादी को अपना सकती है, पश्चिम से लेकर दक्षिण तक, पर लिव इन सार्वभौमिक नहीं है। यह केवल उन्नत और संपन्न समाज के लिए रहा है, भारत जैसे गरीब देश में तो इसकी कल्पना भी व्यर्थ है। श्रेष्ठ वर्ग के भारतीय पहले लिव इन में रहते है फिर पक्का हो जाता तो शादी करते है, यह अजीब मूर्खता है, विवाह का मटेरियल ही चेंज कर दिया।
एक दफा मैं भारत के उच्चतम न्यायालय में था वहां लिव इन की वैधानिकता पर बहस हो रही थी। प्रश्न चल रहा था कि लिव इन में लंबे समय तक रहने वाली औरत निर्वसीयती मरने वाले पुरुष की संपत्ति में अधिकार रख सकती है या नहीं? इस पर उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि समाज में यह प्रचारित हो कि वह औरत उस मरने वाले कि पत्नी है तो अधिकार मिल सकता है। इस पर तर्क यह आता है कि जब पत्नी होकर ही अधिकार लेना है तो लिव इन कैसा और यदि लिव इन मे रहने वाली औरत को पुरुष की संपत्ति और पुरुष को औरत की संपत्ति दी जाने लगे तो फिर यह कैसा लिव इन क्योंकि लिव इन के अर्थ ही समाप्त हो गए।
यह बात सच है कि विवाह आदिम युग की पहचान है पर विवाह से बेहतर व्यवस्था आज भी इंसानो के पास नहीं है, श्रेष्ठ वही है। हम इसकी कितनी बुराई कर ले और रात दिन इसे नीरस कहे पर सार्थक और सर्वोत्तम तथा सर्वोच्च यही है।
हमने प्रथा को कुप्रथा बनाया है। विवाह बनाया तो औरतों के लिए सुसराल नाम का पिंजरा बना दिया, उनका अस्तित्व खत्म कर दिया, यहां तक उनका नाम तक बदल डाला, उनसे कहा अब अपने पिता या मां का नाम लगाना बंद करो हम तुम्हारे स्वामी है हमारा नाम लगाओ हमारी जाति लिखो। विवाह कुप्रथा हमने बनाया, हमने बच्चो तक के विवाह कर डाले।
आज शहरी कामकाजी युवाओं के विवाह मुझे आदर्श विवाह नज़र आते है। वहां कितनी समानता और कितना सुधार हुआ है। किसी भी जाति और लिंग के प्रति असमानता और क्रुरता के विचार हमारे भीतर पनपते है और फिर यह बाहर निकल कर आते है और हमारी व्यवस्था में शामिल हो जाते है जैसे औरतों के प्रति क्रुरता के विचार विवाह में शामिल हो गए।

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