भारत में हर 15 मिनट में दलितों के साथ एक अपराध होता है, जानिए दलितों पर हो रहे जुल्म की कहानी


Soumitra Roy
मध्यप्रदेश के गुना में दलित किसान परिवार पर पुलिसिया जुल्म की कहानी कोई नई नहीं है। भारत में हर 15 मिनट में दलितों के साथ एक अपराध होता है। हर रोज 6 दलित महिलाओं का रेप और 56 हजार दलित बच्चों की हर साल कुपोषण से मौत होती है। गुना जिला अगर राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ में नहीं होता तो शायद इतना बड़ा राजनीतिक तूफान नहीं खड़ा होता।
कोरोना की सोशल डिस्टेंसिंग के नियम ने दलितों और अगड़ों के बीच की खाई और चौड़ी कर दी है। छुआछूत और जातिवाद हमारी नस्लों और नसों में किस कदर गहरे पैठ बना चुका है, इसकी मिसाल है ऐसी घटनाएं। लॉकडाउन के दौरान यूपी और उत्तराखंड के नैनीताल समेत कई राज्यों में अगड़ी जाति के कोविड मरीजों ने दलितों के पकाए भोजन को खाने से इनकार कर दिया था। खबर नहीं बनी।
एम सुधाकर राव जब लॉकडाउन के बाद चेन्नई से अपने गांव पहुंचे तो उनके ससुर ने दामाद की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि बेटी अगड़ी जाति की थी। यह भी बड़ी खबर नहीं बनी। डॉ. पायल तडवी का मामला भी राजनीतिक रंग नहीं ले सका। कोरोना ने दलितों को जितना किनारे किया है, शायद ही किसी और महामारी ने किया होगा। इस बारे में अभी तक कोई शोध नहीं हुआ है। एक मेरे वरिष्ठ पत्रकार मित्र और चिंतक जब भी दलित मुद्दों पर चर्चा करते, वे दलित समुदाय के ताकत की बात करते। सही भी है। दलित समुदाय की अपनी ताकत है।
देश के 90 फीसदी सफाई कर्मी दलित हैं। वे अगर एक हफ्ते की हड़ताल कर दें तो कोरोना छोड़िए, देश की आधी आबादी बदबू से मर जाए। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब चुनाव से पहले दलितों के पैर धोते हुए फोटो खिंचवाते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन ऐसे किसी भी ढोंग से 1950 में कागजों पर खत्म हुए जातिगत भेदभाव को उस सोच से नहीं निकाला जा सकता, जो 2014 के बाद समाज से होते हुए तंत्र में पसर चुकी है।
आपने कोरोना से लड़ रहे डॉक्टरों, नर्सों के लिए ताली-थाली, घंटी बजाई। दीये जलाए। लेकिन अस्पतालों में सफाई करने वाले उन दलित कर्मचारियों का क्या हुआ ? कभी सोचा है आपने ? मोदी सरकार ने ऐसे दलित सफाई कर्मचारियों के लिए 50 लाख रुपए के बीमे का ऐलान तो कर दिया, लेकिन शायद ही किसी को पता हो कि 22 फीसदी कर्मचारियों के पास 12 अंकों का आईडी नंबर ही नहीं है। इसमें सिर पर मैला ढोने वाले और कूड़ा बीनने वाले दलित भी शामिल हैं।
एनसीआरबी 2017 का डेटा उठाकर देखिए, उत्पीड़न के मामलों में मध्यप्रदेश आगे दिखेगा। सवाल दलितों के भूमि अधिकार को लेकर भी है। 2013 तक के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि देश में 60 प्रतिशत दलितों के पास जमीन नहीं है। 70 प्रतिशत दलित किसान असल में दूसरों के खेतों में मजदूर हैं। संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर ने 1941 की रैली में दलितों से सार्वजनिक भूमि पर खेती करने का आह्वान किया था।
लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच कहता है कि देश के 13 राज्यों में जमीन विवाद के 31 मामलों में 90 हजार से ज्यादा दलितों की जिंदगी दांव पर लगी है। बिहार, गुजरात और महाराष्ट्र में दलितों को जमीन के पट्टे तो मिले, लेकिन अगड़ी जातियों ने जमीन ही नहीं छोड़ी। साफ है कि नौकरशाहों पर निजाम हावी है। निजाम के अपने राजनीतिक स्वार्थ हैं, जो अगड़ी जातियों से पूरे होते हैं। दलित तो केवल वोट देने और बाद में पिटने-मरने के लिए हैं।

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