कट्टरता का पहला शिकार महिला ही होती हैं?


हफीज किदवई 
कट्टरता का पहला शिकार महिला ही होती हैं । बंटवारें में लड़कियाँ ऐसे उठा ली जाती थीं, जैसे चील किसी गोश्त के लोथड़े को छीन ले जाए । लड़कियों के हाथों पर बलात्कारी अपना नाम गुदवा देते थे । लड़कियां लूट के माल की तरह एक हाथ से दूसरे हाथ होते हुए घरों के चूल्हों में झोंक दी जाती थीं । यही सब तो हो रहा था,जिसे रोकने के लिए भी औरते बाहर आई । बंटवारे में मज़हब सनक बनकर इंसानियत से हैवानियत पर उतर आया था । हर इंसान हैरत में था कि इंसान की बोटियाँ नोचने वाले इंसान ही है ?
तराज़ू लेकर बैठिएगा तो किसी का भी पाप कम या ज़्यादा नही निकलेगा ।
जिस तरह सभी धर्म के लोग हैवान हो रहे थे,उसी तरह हर धर्म के लोग आगे बढ़कर इंसानियत की भी मिसाल दे रहे थे । हमें इन इंसानों को पढ़ना चाहिए जो  ज़ुल्म की ताप सहकर उनसे मुकाबला करके इंसानियत को रोज़ जिला रहे थे ।
पढ़ना भी भला कौन चाहता है ।कहते हैं अगर आपने माटी की ख़िदमत की है, तो एक न एक रोज़ उसकी महक दुनिया महसूस करेगी ।मेरे पास लिखने को हज़ार पन्ने हैं, लाखो शब्द हैं मगर मैं उनकी शख्सियत पर क्या क्या लिखूँ ।
साहित्य अकादमी सम्मान से नवाज़ी,दो बार राज्य सभा सांसद, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और सबसे बढ़कर बंटवारे में शरणार्थी कैम्प में जीजान से ख़िदमत करने वाली बेग़म अनीस क़िदवई ।
शायद वह इकलौती औरत जिसने कैम्प में लाशो को नहलाया,कफ़न दफ़्न किया,यहाँ तक कब्रें भी खोदी,तब जाकर बंटवारे से उपजा ज़ख्म हम पाट पाए थे ।हज़ारों लड़कियों को जो बेच दी गई,जो उठा ले जाइ गई,जिन्हें भीड़ ने काफिलों से लूटकर छीन लिया,अपने घरों में बांध लिया ।चुन चुन कर एक एक लड़की को वापिस उसके परिवार में पहुँचाने वाली बेग़म अनीस क़िदवई ।
आज उनकी पुण्यतिथि है ।खोजिए,इन्हें पढ़िए,इनके दिलों को हौसले को महसूस कीजिये ।यह जो सत्तर साल हम मिल बाँटकर साथ वक़्त गुज़ार लिए,उसकी बुनियाद हैं बेग़म अनीस क़िदवई ।
"आज़ादी की छाँव में" उनकी लिखी किताब पढ़िए और रोइये ।देखिये ज़मीन को मज़हब के नाम से फाड़ने पर कितने दिल टूटे थे ।इस सबसे इतर उस वक़्त के हालात देखिये,वह कौन लोग थे जो तब भी भीड़ बनकर डरा रहे थे ।सैकड़ो साल से साथ रह रहे अपने भाइयों को खींचकर गाँव से बाहर कर रहे थे और कितनी हो बेंटियों को गले में रस्सी डालकर,बिना कपड़ों के घर में जानवरों की तरह बाँधे रखे थे ।यह सारे दर्द,यह सारी नाइंसाफी,यह सारे ज़ख्म को बेग़म अनीस क़िदवई और मृदुला साराभाई ने साथ साथ भरकर हमारे देश की बुनियाद रखी है ।
शरणार्थियों की सेवा के साथ साथ सैकड़ों लड़कियों को खोजा । खोजी हुई लड़कियों को जब उनके ही सगो ने लेने से इनकार किया,तो उन्हें पाला । बेग़म अनीस और सुभद्रा,दो औरतें भयँकर दंगो से झुलस रहे गाँव मे अकेले निकल गईं,लड़कियों को खोजने,लोगों ने घेरकर उनकी गाड़ी तोड़ फोड़ दी,उन्हें गालियाँ दीं, उनपर झपटने को दौड़े मगर न यह डरी और न पीछे हटीं । गांव के सबसे खूँखार वहशी के खूंटे में बंधी लड़की को खींचकर निकाल लाईं और उसको आज़ाद ज़िन्दगी दी ।
आपको क्या लगता है कि बंटवारें से उपजा ज़ख्म यूहीं भर गया । इसके लिए अथक मेहनत की गई,दिन रात बिना फर्क किये काम किया गया । सवालों और बदले की आग पर ठंडा पानी डालकर सेवा की गई,लोगों को भड़काने की जगह बनाने पर ज़ोर दिया गया । रोने की जगह उठ खड़े होने की बातें की गईं । बेग़म अनीस क़िदवई को पढ़िए,रोइये की अपने सारे ग़म भुलाकर वह मुल्क की बुनावट में लग गईं । दंगो में अपने पति की लाश के टुकड़े देख बदले के लिए नही दौड़ी बल्कि दूसरे परेशान हाल सताए हुए लोगों के आँसू पोछने निकल पड़ी ।
आज,हाँ आज तो उन्हें याद ही करलें...हम तो रो रोकर पलट कर देखते हैं, की काश इनके रत्ती भर सेवा और समर्पण आ जाए,तो इस माटी की ख़िदमत में मर मिटूँ...

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