राहुल गाँधी तब पप्पू नही, क्राउन प्रिंस थे?


मनीष सिंह 
तब ये शहर इतना अजीब न था। 2009 का वक्त था जब कांग्रेस दोबारा जीतकर आयी थी, बढ़े हुए बहुमत के साथ। देश ने साथ दिया था, यहां तक उत्तर प्रदेश में भी 22 सीटें आयी थी।राहुल तब पप्पू नही, क्राउन प्रिंस थे।
ये जीत जितनी कांग्रेस की थी, उतनी मनमोहन की भी। उनका लिहाज रखा गया, दोबारा शपथ ली। राहुल को उनकी कैबिनेट में होना था, मगर नही गए। गए भट्टा परसौल, मायावती की मांद में घुसकर किसानों से मिले। उनके साथ धरने पर बैठे। पुलिस रास्ता रोकती रह गयी, मोटरसाइकिल की वो सवारी के दिन थे।
गए नियामगिरी, उड़ीसा में आदिवासियों के बीच हुंकार लगाई - आई एम योर सोल्जर एट डेल्ही। वेदांता के कार्पोरेट चक्की में पिस रहे आदिवासियों की ओर से बीजेडी-बीजेपी सरकार को ललकारा। मुंबई में प्रकट हुए, शिवसेना के चैलेंज को धता बताकर, लोकल ट्रेन में सफर किया। उस दौर में मुंबई में घुसकर शिवसेना को ललकारने वाला राहुल ही मैंने पहली बार नोटिस किया था।
दुश्मनों की छोड़िये, जब दोस्त लालू को बचाने का अनैतिक अध्यादेश आया, फाड़ने वाले राहुल थे। यूथ कांग्रेस ने सांगठनिक चुनाव शुरू किए। यह हजारों साल बाद हो रहा था। टीम राहुल तैयार की जानी थी। और यही वो गलती हुई, जो एक डायनेस्टी से जन्मा राजनीतिक करता है। दूसरी डायनेस्टी को मान्यता।
________________________
टीम राहुल जो बनी, क्लब ऑफ प्रिंस था। नाम लेते जाइये, बाप का स्मरण होगा।  सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, रणदीप सुरजेवाला, अजय माकन, संदीप दीक्षित... याद करना मुश्किल है।
यह एक किस्म की सदाशयता है, मृत नेता के प्रति सम्मान, और अगली पीढ़ी की अंग्रेजीदां बौद्धिकता पर विश्वास। गर जनता भी एक बार मुहर लगा दे, तो बात बन गयी। इसका नतीजा यह, कि दूसरी पंक्ति ने जिंदा नेताओ ने भी अपने नूरे चश्म लाइन में लगा दिए। एक भी अपने दम पर जीतने वाला नही, सांगठनिक कौशल नही। यह परजीवियों का झुंड था।
एक ऑनरेबल एक्सेप्शन, सचिन पायलट को छोड़ किसी ने एक लाठी न खाई। मगर मलाई.. हर किसी ने। 2014 तक..
________________________
और फिर एक एक कर चूहे की तरह कूद गए। इन्हें इज्जत चहिए, देशसेवा का फटाफट  अवसर चाहिए। पांच साल के बाद जो राज्यो में सत्ता मिली, भूखे भन्नाए सेकेंडग्रेड डायनेस्ट, छोटी से मटकी में पहले मुंह घुसाने के लिए मटकी फोड़ने को उतारू है।
मजबूरी कहिये, या मौके का फायदा उठाना- यही वक्त है, एक सिरे से इन्हें साफ करने का। पानी ऊपर से नीचे बहता है, जहर भी और गंगाजल भी। डायनेस्टी का जहर ऊपर से साफ होगा, तो नीचे हर चीज ऑटो मॉड में होगी। देश को जिंदा काग्रेस चाहिए, राहुल के मुर्दा दोस्त नही। वैसे भी जनाब, राजनीति का शहर अजीब है।
आपका जो दोस्त है, देखिये वही रकीब है।

Comments

Popular posts from this blog

Bollywood Celebrities Phone Numbers | Actors, Actresses, Directors Personal Mobile Numbers & Whatsapp Numbers

जौनपुर: मुंगराबादशाहपुर के BJP चेयरमैन ने युवती के साथ कई महीने तक किया बलात्कार, देखें वायरल वीडियो

किन्नर बोले- अगर BJP से सरकार नहीं चल रही है तो हमें दे दे कुर्सी, हम सरकार चलाकर दिखा देंगे