जम्मू-कश्मीर में आसान नहीं सत्ता के रास्ते


केवल कृष्ण पनगोत्रा
जनता की सेहत और सत्ता पर कब्जे की दृष्टि से अगर देखें तो करोना संकट देश के स्वास्थ्य पर तो प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है मगर देश की राजनीति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाता नजर नहीं आता. मध्य प्रदेश और राजस्थान की सियासी उठापटक इस अभिमत के जीवित उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. क्या जम्मू-कश्मीर में भी धारा 370 का उद्देश्य राज्य की सत्ता हथियाना था या राज्य की भलाई थी?
जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली भारतीय संविधान की धारा 370 पांच अगस्त 2019 को जब निरस्त हो गई. देश भर में कहीं सरकार के इस निर्णय का स्वागत हुआ तो कहीं विरोध के स्वर भी उठे.
प्रदेश के कश्मीर सूबा में इस बदलाव का खासा विरोध देखने को मिला. जम्मू क्षेत्र में इसका खुल कर स्वागत हुआ. 370 के स्वागत का प्रमुख कारण सालों से चला आ रहा राजनैतिक भेदभाव रहा जिसकी भुक्तभोगी जम्मू सूबा की जनता रही है. लेकिन अब जबकि राज्य में बेरोजगारी, आतंकवाद और भ्रष्टाचार पूर्व की भांति ही है तो जनता इसी सवाल में उलझी नजर आ रही है कि आखिर 370 को निरस्त करने का उद्देश्य क्या था?
यहां यह बता देना जरूरी है कि अगर कश्मीर केंद्रित सियासत विशेष दर्जा प्रदान करने वाले संवैधानिक प्रावधान का न्यायपूर्ण सदुपयोग करती तो जम्मू संभाग की जनता को शायद ही धारा 370 से कोई आपत्ति होती.  राज्य की बड़ी सियासी पार्टी  नैशनल कांफ्रैंस के लीडर सत्ता लोलुपता के लिए जम्मू सूबा की सियासी अपेक्षाओं को दरकिनार करते रहे.
स्थिति यह रही कि फारूख अब्दुल्ला जम्मू में होने वाली किसी भी चुनावी सभा में बड़े दावे से यह कहते सुने जाते कि फंला तारीख़ को वह मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे. भले ही जम्मू की जनता नैशनल कांफ्रैंस को वोट दें या न दें.
नि:संदेह धारा 370 से प्रदेश की उतनी क्षुब्ध नहीं होती जितनी कि इसके दुरुपयोग से आहत रही.  आज भी प्रदेश का एक राजनैतिक और सामाजिक हलका यह मानता है कि यदि नेशनल कांफ्रैंस के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला राज्य के भारत में विलय के बाद जम्मू से सौतेला व्यवहार न करते तो प्रदेश के मसीहा कहलाते.
मौटे तौर पर देखा जाए तो जो भूमि सुधार भारत के किसी भी राज्य में नहीं हुए वो जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला के शासनकाल में हो चुके हैं.
कोई दो राय नहीं कि धारा 370 के जरिए राज्य को ऐसी सुविधाएं प्राप्त थी जिनके होते अविभाजित जम्मू-कश्मीर राजनैतिक तौर पर एकजुट रहता मगर कश्मीर केंद्रित सियासत की स्वार्थपरक मानसिकता और जम्मू संभाग की अनदेखी से प्रदेश को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित होना पड़ा.
प्रदेश के कुछ नेता अब भी धारा 370 की वापसी के हिमायती हैं. वैसे धारा 370 के निरस्तीकरण के बाद का रास्ता भी इतना आसान नहीं. कश्मीर घाटी में चुनौतियां बड़ी हैं और जम्मू की अपेक्षाओं पर खरा उतरना भी इतना आसान नहीं.
चूंकि जम्मू सूबा ने सियासी भेदभाव सहा है. इस लिहाज़ से उसकी अपेक्षाएं भी बड़ी ही होंगी. समूचा प्रदेश वो सब चाहेगा जो धारा 370 के निरस्त होने से चला गया है.
जम्मू की जनता ख़ासकर यह सोचने लगी है कि केंद्र की भाजपा सरकार जम्मू सूबा के उस नुक्सान की भरपाई करे जो उन्होंने मुफ्तियों और अब्दुलाओं के शासनकाल में उठाया है. जम्मू सूबा सात दशकों के आर्थिक और राजनैतिक नुक्सान की भरपाई चाहता है.
यहां तक कि धारा 370 की समाप्ति के बड़े पैरोकार कहने लगे हैं कि उन्हें आत्मसम्मान के साथ विकास और राजनैतिक हिस्सेदारी भी चाहिए. जम्मू सूबा के लोग साफ और न्यायपूर्ण प्रशासन की मांग भी कर रहे हैं जो उन्हें ज़मीन पर दिखाई नहीं दे रहा.
भाजपा 370 के निरस्तीकरण के बाद प्रदेश में सत्ता के रास्ते तलाश कर रही है. कश्मीर घाटी में नेशनल कान्फ्रेंस और पिपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का तोड़ तलाश करने के लिए प्रयास जारी हैं.
कहा यह भी जा रहा है कि नयी जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी (जेकेएपी)  भाजपा की सलाह पर बनाई गई है.
बेशक धारा 370 हटा ली गई है मगर राज्य, खासकर कश्मीरी नेतृत्व पूर्व की तरह 370 जैसी स्थिति तैयार करने की कोशिश करता रहेगा.आठ मार्च को जेकेएपी के नव नियुक्त अध्यक्ष पूर्व वित्त मंत्री अल्ताफ बुखारी के बयान को समझना जरूरी है. बुखारी ने कहा कि पार्टी का मुख्य एजेंडा केंद्र शासित प्रदेश के लिए राज्य का दर्जा दिलाना, जमीन और नौकरियों में मूल निवासियों के तौर पर विशेषाधिकार को सुरक्षित रखना है. बुखारी यह भी कहते हैं कि दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के बीच अविश्वास है.
कहने का मतलब यह है कि केंद्र की किसी भी सरकार को राज्य की कश्मीरियत का अनुसरण करना ही पड़ेगा.
हालांकि नयी पार्टी के गठन को कांग्रेस, नेशनल कांफ्रैंस और पिपुल्स पार्टी को कमज़ोर करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. लेकिन इसे केंद्र सरकार द्वारा एक नया शेख अब्दुल्ला पैदा करने की कोशिश भी माना जा रहा है.
कश्मीर में भाजपा की जमीन कमजोर है. अकेले जम्मू के बलबूते सत्ता पर काबिज होना आसान नहीं. फिर चाहे परिसीमन के द्वारा प्रदेश के दोनों सूबों की विधानसभा सीटें बराबर ही न कर ली जाएं. •

0/Post a Comment/Comments

Previous Post Next Post
loading...