क्या आपने कभी सोचा है कि लोग नरेंद्र मोदी जैसे नेता के पीछे कैसे खड़े हो जाते हैं?


शिवांग कुमार 
क्या आपने कभी सोचा है कि लोग नरेंद्र मोदी जैसे नेता के पीछे कैसे खड़े हो जाते हैं? ऐसे नेता के हजार उल्टे सीधे फैसले के बाद कैसे उस से संतुष्ट रहते हैं? क्या यें लोग बेवकूफ हैं?
असल में यें लोग भी बिल्कुल सामान्य लोग हैं जो एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव से ग्रसित हैं जिसका नाम है Choice Paralysis हिंदी में ज़बरदस्ती अनुवाद करें तो "चुनाव जड़ता" ऐसा नहीं है कि सिर्फ यें लोग ही इस प्रभाव में जकड़े हुए हैं, बल्कि हर इंसान अलग अलग मौके पर Choice Paralysis से जूझते हैं। लेकिन ये चीज़ आखिर है क्या?
आप रेस्टोरेंट जाने की सोच रहे हैं। आपके पास तीन ऑप्शन हैं। एक रेस्टोरेंट में 100 डिश मिलती हैं, दूसरे में 5, तीसरे में सिर्फ एक। आप किसमें जा कर ज़्यादा संतुष्ट महसूस करेंगे? 100 डिश वाले में? लेकिन ऐसा नहीं होगा। आप 100 डिश वाले होटल में जा कर 3-4 डिश ऑर्डर कर देते हैं। पेट भरने के बाद आपको लगता है कि आपको वो वाली डिश भी ऑर्डर करनी चाहिए थी, वो वाली भी और वो वाली भी। आप आखिरकार असंतुष्ट रह जाते हैं। अगले दिन आप 5 डिश वाले में जाते हैं और 3 डिश ऑर्डर करते हैं। पेट भरने के बाद आपको लगता है कि एक डिश छूट गई है, लेकिन फिर भी आप 100 डिश वाले रेस्टोरेंट से ज़्यादा संतुष्ट 5 डिश वाले में रहते हैं। अगले दिन आप 1 डिश वाले रेस्टोरेंट में जाते हैं और वही डिश खा कर हंसी खुशी बिना शिकायत के घर आ जाते हैं, पूरी संतुष्टि के साथ।
ये कोई हवाई किला नहीं है जो मैं आपके सामने बांध रहा हूं, नरेंद्र मोदी जी की तरह। बल्कि ये बात रिसर्च में सिद्ध हो चुकी है।
एक रिसर्च में 50-50 लोगों के दो ग्रुप बनाए गए। पहले ग्रुप में सभी 50 लोगों को चाय या कॉफी में से एक चुनने को बोला गया। दूसरे ग्रुप के 25 लोगों को चाय और 25 लोगों को कॉफी परोसी गई, बिना उनकी मर्ज़ी पूछे। इस ग्रुप के सभी लोग अपनी चाय या कॉफी से बिल्कुल संतुष्ट थे लेकिन पहले ग्रुप के ज़्यादातर लोगों का मानना था कि उन्होंने गलत चीज़ चुनी है, जिन्होने कॉफी पसंद की थी वें बोले कि उनको चाय पीनी चाहिए थी, और जिन्होने चाय चुनी थी वें कॉफी को बेहतर बता रहे थे।
एक दूसरी रिसर्च में कुछ लोगों को 100 कैंडी फ्लेवर में से 1 चुनने को चुनने को कहा गया, दूसरे लोगों को 2 फ्लेवर में से एक। 100 कैंडी फ्लेवर में से एक चुनने वालों ने बताया कि 100 फ्लेवर देख कर वें डिसाइड नहीं कर पाए कि उनको कौनसा चुनना चाहिए और उन्होंने रैंडम ही एक कैंडी उठा ली। इसलिए वें अपनी पसंद से बिल्कुल खुश नहीं हैं। दूसरी तरफ 2 कैंडी में से एक चुनने वाले ज़्यादा खुश थे। उन्होंने सोच समझ कर कैंडी चुनी थी।
इसका कारण क्या है? इसका कारण है कि हमारा दिमाग ज़्यादा मेहनत नहीं करना चाहता। ज़्यादा Choice
होने पर हमारा दिमाग सारी सूचनाओं को प्रोसेस नहीं कर पाता और Choice Paralysis से ग्रसित हो कर कुछ भी चुन लेता है और फिर भी असंतुष्ट रहता है। दूसरी तरफ कम से कम Choice होने पर दिमाग को ज़्यादा सूचना प्रोसेस नहीं करनी पड़ती है और दिमाग संतुष्ट रहता है।
तो इस Choice Paralysis का नरेंद्र मोदी से क्या लेना देना? नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग इस तरह से की गई है कि जनता को लगता है कि इस नेता का कोई विकल्प नहीं है, और विकल्पहीनता की स्थिति में दिमाग ज़्यादा संतुष्ट रहता है, क्योंकि फिर उसको अलग अलग विकल्पों के ऊपर नहीं सोचना पड़ता। ये सिर्फ नरेंद्र मोदी की बात नहीं है। विभिन्न सर्वों के अनुसार ज़्यादातर देशों की जनता का एक बड़ा हिस्सा तानाशाही को लोकतंत्र से अच्छा मानता है, और जिन देशों में तानाशाही है वहां की जनता अपनी सरकार से लोकतांत्रिक देशों की जनता के मुकाबले में ज़्यादा संतुष्ट रहती है।
विपक्ष कितनी भी कोशिश कर ले, वो इस प्रभाव को तब तक खत्म नहीं कर सकता जब तक किसी दूसरे नेता की ब्रांडिंग नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर नहीं करता। अगर जनता को नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प दिख जाए तो जनता Choice Paralysis में चली जाएगी और नरेंद्र मोदी से असंतुष्ट हो जाएगी। लेकिन निकट भविष्य में ऐसी स्थिति नहीं दिखाई देती। 2024 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद छोड़ने की घोषणा करते रहे हैं। उनकी जगह दूसरे नेता की ब्रांडिंग जल्द ही शुरू हो सकती है तो विपक्ष को उस नेता पर फोकस करके किसी नेता की ब्रांडिंग करनी चाहिए

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