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हमारे देश को दुनिया का नया डम्पयार्ड बनाने की पूरी तैयारी है पर अफ़सोस मेनस्ट्रीम मीडिया से ये खबर गायब है.....

हमारे देश को दुनिया का नया डम्पयार्ड बनाने की पूरी तैयारी है पर अफ़सोस मेनस्ट्रीम मीडिया से ये खबर गायब है.....


 मयंक उनियाल 
आपने दशकों पहले भोपाल गैस त्रासदी या अभी हाल में ही विशाखापत्तनम के कैमिकल प्लांट में गैस लीक (11 मौतें हज़ारों लोग संक्रमित ) और बागजन, आसाम में ऑयल फील्ड में आग और गैस रिसाव के बारे में सुना ही होगा । इन मानवीय आपदाओं की जांच के बाद पता चला कि ये गैरकानूनी रूप से पर्यावरणीय नियमों के खिलाफ संचालित किये जा रहे थे ,इसके लिए कोई अनुमति EIA के मानकों की हिसाब से नहीं ली गयी थी जिसका खामियाजा बड़े संकट के रूप में लोगों को भुगतना पड़ा। हम लोग किसी दुर्घटना के बाद अफसोस जताते हैं ,मरने वालों का शोक मानते हैं सोशल मीडिया पर शेयर कर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं पर जब इनकी नींव पड़ती है तब हम चुपचाप बैठे रहते हैं । कुछ ऐसी ही नीवं एक नए क़ानून के रूप में पड़ने वाली है ।........
23 मार्च 2020 को केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने environment impact assessment notification ( EIA- पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट ) के नियम बदलने के लिए EIA Draft 2020 जनता के सुझावों/आपत्तियों के लिए सार्वजनिक किया है ताकि इसमें किये जा रहे बदलावों के विषय में आम लोग अपनी राय/सुझाव दे सकें पहले यह 10 जून तक दिया जा सकता था पर दिल्ली हाइकोर्ट की पहल पर जनता अब 12 अगस्त तक अपने सुझाव भेज सकती है ।
इससे पहले की हम जानें कि कैसे पर्यावरण कानूनों को कमज़ोर किया जा रहा है थोड़ा इसके बारे में जान लेते हैं ।वर्ष 1986 में भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण कानून ,EPA बनाया जिसके तहत EIA - environment impact assesment का प्रावधान किया गया जिसका मतलब था कि किसी भी तरह के प्रोजेक्ट ( डैम ,हाईवे निर्माण ,उद्योग ,किसी भी तरह की माइनिंग ,कैमिकल प्लांट इत्यादि) के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया जाएगा और अगर जांच में पाया जाता है कि इनसे किसी क्षेत्र के पर्यावरण पर गलत प्रभाव पड़ेगा तो उसे एनवायरमेंट क्लीयरेंस नहीं दी जाएगी मतलब उसे शुरू नहीं किया जाएगा ।इसकी एक पूरी प्रक्रिया होती है जिसमें स्थानीय लोगों से लेकर विशेषज्ञों तक को शामिल कर रिपोर्ट तैयार की जाती है जिसपर पर पर्यावरण मंत्रालय अंतिम रूप से फसल लेता है ।
वर्ष 2006 में इसमें पहली बार संशोधन किया था और अब पुनः 2020 में फिर से बदलाव किया जा रहा है जिसे जाहिर तौर पर पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील और कड़े नियमों वाला होना चाहिए था किंतु इसके कुछ प्रावधान इतने कमजोर किये गए हैं कि आप भी हैरान रह जाएंगे,तमाम पर्यावरणविद भी कह रहे हैं कि यह पहले वाले कानून से भी कमजोर किया जा रहा है। यह 80 पेज का ड्राफ्ट है
इसके कुछ बिंदु मैं यहां उल्लेखित कर रहा हूँ जो शायद कानून बन गए तो पर्यावरण पर इसका निश्चित रूप से खतरनाक प्रभाव पड़ेगा । गौर करने वाली बात है एक तरफ हम केरल में एक हथिनी की मौत पर दुखी होते हैं पर जब कि एलिफेंट रिजर्व में कोयला निकालने की अनुमति देकर संस्थात्मक रूप से जीव-जंतुओं को हत्या की जाती है तो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता ,हम चुपचाप इसे देखते जाते हैं । खैर देखते हैं इसके कुछ बिंदु :-
1. रक्षा सम्बन्धी शक्तियां
इससे पहले 2006 वाले ड्राफ्ट में यह प्रावधान था कि रक्षा/सुरक्षा सम्बन्धी कार्यों में किसी तरह की अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती थी और जनता इसपर कोई सवाल भी नहीं कर सकती जो कुछ हद तक सही भी था पर इस नए ड्राफ्ट में सरकार को यह शक्ति मिल गयी है कि वो किसी भी प्रोजेक्ट को रक्षा महत्व का घोषित कर सकती है चाहे वह किसी भी तरह का हो और फिर उसपर किसी भी तरह के नियम कानून लागू नहीं होंगे ,उसे किसी तरह की पर्यावरणीय मंज़ूरी लेने की भी जरूरत नहीं होगी । सोचिए इस बदलाव का सरकार किस तरह से दुरुपयोग कर सकती है और अपने चहेते लोगों के प्रोजेक्ट पर रक्षा मामलों का ठप्पा लगाकर उन्हें इस निगरानी तंत्र से बचा सकती है ।
2. पोस्ट -फैक्टो क्लीयरेंस
-इसका मतलब है कि कोई भी प्रोजेक्ट /कार्य चाहे शुरू हो जाये तो भी वह बाद में भी आसानी से पर्यावरण सम्बन्धी क्लीयरेंस ले सकता है और अगर वह यह अनुमति नहीं लेने के लिए दोषी भी पाया गया तो मामूली फाइन देकर आसानी से अपना काम जारी रख सकता है ,जुर्माना भी मामूली रूप से 2 से 10 हज़ार तक ही रखा गया है,जो किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के एवज में कुछ भी नहीं है । इस पर 1अपैल 2020 को खुद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश देते हुए कहा था कि सरकार कार्योत्तर( post pacto) अनुमति नहीं दे सकती इसके वावजूद नए ड्राफ्ट में इसे शामिल किया गया है ।
3. सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए नियम
- इसका यह नियम कहता कि बॉर्डर से 100 किमी क्षेत्र में किसी भी तरह के प्रॉजेक्ट के लिए भी अनुमति लेने की जरूरत नहीं है मतलब कि वहां कितने भी पेड़ काटे जा सकते हैं ,नदियों को दूषित किया जा सकता है और प्राकृतिक संसाधनों का नाश बिना किसी रोकटोक के किया जा सकता है। अब आप पूर्वोत्तर भारत का नक्शा देखेंगे तो पूरा क्षेत्र इसके हिसाब से इस सीमा में आता है जो बेहद संवेदनशील क्षेत्र है और इससे निश्चित रूप से उन्हें गंभीर संकटों का सामना करना पड़ेगा ।
4.जनता के अधिकार खत्म
-यह इस नए ड्राफ्ट का सबसे खतरनाक बदलाव है कि अगर कहीं पर्यावरण और पारिस्थितिकी के खिलाफ भी काम हो रहा है और लोगों को परेशानी हो रही है तब भी स्थानीय या सामान्य जनता इसके खिलाफ शिकायत नहीं सकती है बल्कि इसमें या सरकारी विभाग या फिर उस अवैध कार्य करने वाला खुद ही स्वप्रेरणा से अपने खिलाफ (suomotu application )पर्यावरण क्षरण की शिकायत कर सकता है ,मतलब चोर को खुद अपनी चोरी बतानी होगी। अब आप सोचिए जो इस तरह से पर्यावरण का नुकसान करेगा वो खुद कभी अपने ही खिलाफ शिकायत कर सकता है
5. इसमें सड़कों का विस्तार,अन्तः देशीय पाइपलाइन जैसे निर्माण कार्यों को भी तमाम नियम-कानूनों से मुक्त रखा गया है ,अतः इसमें भी पर्यावरण को किया गया नुकसान जांच के दायरे में नहीं आएगा औऱ किसी तरह की अनुमति की भी आवश्यकता नहीं होगी ।
6. पहले जनता को शिकायत करने के लिए 30 दिन का समय दिया जाता था उसे भी कम कर 20 दिन किया गया है ,जो कई लिहाजों से काफी कम है ।
7 .पहले 20,000 sq.m. भूमि पर निर्माण कार्यों के लिए किसी तरह की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती थी इसको भी बढ़ाकर 1,50,000 sq.m. कर दिया गया है मतलब इतना बड़ा प्रोजेक्ट भी बिना अनुमति के अब नए नियमों के हिसाब से बनाया जा सकता है ।
अभी अच्छी बात यह है कि अभी इसमें कानून की शक्ल नहीं ली है और अगर सभी लोग अपने सुझाव सरकार /मंत्रालय को भेजे तो उन्हें इस तरह के प्रावधानों में बदलाव करना होगा  आप खुद ईमेल के माध्यम से अपने सुझाव/आपत्ति सीधे मंत्रालय को इस पर भेज सकते हैं
या आप पत्र के माध्यम से भी अपनी आपत्तियां/सुझाव निम्न भेज सकते हैं पता है
Secretary Ministry of Environment ,Forest and Climate Change ,Indira Paryavaran Bhawan ,Jor Bagh Rao Aliganj ,New Delhi
-110003
इसे अधिक से अधिक शेयर करें और पर्यावरण संरक्षण की इस मुहिम में अपना योगदान दें

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