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जम्मू-कश्मीर : मुस्लिम खतरे का प्रचार

जम्मू-कश्मीर : मुस्लिम खतरे का प्रचार


केवल कृष्ण पनगोत्रा
पांच अगस्त 2019 को भारत की संसद द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 खारिज कर दी गई. राज्य दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित हो गया है. लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की वहां के लोगों की पुरानी मांग रही थी. इसलिए इस हिस्से में शासन-प्रशासन केंद्र शासित प्रदेश की भांति ही होगा. लगता तो यही है कि केंद्र सरकार विधानसभा और लोकसभा सीटों की हदबंदी करवाएगी. लद्दाख में वैसे भी विधानसभा सीटों पर कोई विवाद की स्तिथि नहीं थी.
370 के निरस्तीकरण पर खुशी जताई जा रही है. भारत के किसी भी हिस्से का नागरिक प्रदेश में रह सकेगा. जमीन-जायेदाद खरीद सकेगा. कश्मीर घाटी के मुस्लिमों का दबदबा समाप्त हो जाएगा. ऐसा प्रचार सुनने को मिल रहा है. फिर भी मुस्लिम खतरा जिंदा है!
उधर जनता की अपेक्षाओं के मद्देनज़र जम्मू-कश्मीर में विधानसभा और लोकसभा सीटों का परिसीमन एक बड़ा मुद्दा रहा है. केंद्र सरकार भी परिसीमन के लिए तैयार है. लेकिन बड़ा सवाल यह उभर रहा है कि परिसीमन का आधार कैसा हो?
विधानसभा या लोकसभा क्षेत्रों की हदबंदी का पैमाना प्रमुखता से जनसंख्या रहा है. इसके अलावा अन्य कारकों को भी ध्यान में रखा जाता है.
जम्मू-कश्मीर में विधानसभा और लोकसभा सीटों का परिसीमन केंद्रीय परिसीमन विधेयक 2002 के प्रावधानों के अनुसार किया जाना है. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक 2019 की सेक्शन 62(2) में इसका उल्लेख मिलता है.
परिसीमन विधेयक की सेक्शन 4(2) के अनुसार विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार होना चाहिए.
ऐसे में ज़ाहिर है कि जम्मू-कश्मीर में लोकसभा और विधानसभा सीटों की हदबंदी का काम 2011की जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार होना है. जनसंख्या आधारित आंकड़े ही परिसीमन का प्रमुख कारक होंगे. दूसरे कारक एक तरह से सहायक कारकों होंगे. अन्यत्र कारकों में भौतिक संरचना, जन सुविधाएं, संचार, सड़कें आदि को मद्देनज़र रखा जाता है, पर प्रमुखता जनसंख्या आंकड़ों को ही दी जाती है. जनसंख्या के कारक को 75 प्रतिशत और अन्यत्र कारकों को 25 प्रतिशत प्रभाव यानि महत्व दिया जाता है. परिसीमन आयोग को विधानसभा या लोकसभा क्षेत्रों की हदबंदी करते समय इन्हीं निर्देशों का पालन करना होता है.

2011की जनगणना पर विवाद :

इसी साल 2021 की जनगणना शुरू करने की तैयारी हो रही थी मगर करोना संकट के चलते प्रक्रिया अटक चुकी है. ऐसे में जम्मू-कश्मीर के हिन्दू बहुल जम्मू सूबा के कुछ सियासी और सामाजिक हलके 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार विधानसभा और लोकसभा सीटों की हदबंदी का विरोध करते दुख रहे हैं. मुस्लिम बहुल कश्मीर सूबा से कोई विरोध नहीं है.
हिन्दू-मुस्लिम सियासत से लबरेज लोगों का कहना है कि 2011 की जनगणना एक धोखा था.
इन तत्वों का तर्क है कि
1. 2002 के चुनाव के समय जम्मू सूबा के मतदाताओं की संख्या कश्मीर के मुकाबले 1.41 लाख ज्यादा थी. 2001 से 20011के बीच सरकारी स्तर पर इसे 14,11,000 दिखाया गया.
2. 1971-2001 के बीच जम्मू सूबा की औसत जनसंख्या वृद्धि 31 प्रतिशत थी. 2011तक यह गिर कर 21प्रतिशत हो गई.
हिन्दू समर्थक इस सियासी हलके का मानना है कि 2011 को आधार मान कर किया गया परिसीमन राष्ट्रीय हितों के पक्ष में नहीं. इससे जम्मू-कश्मीर मुस्लिम बहुल शासन क्षेत्र हो जाएगा.
राज्य का यह सियासी हलका सरकार से यह उम्मीद करता है कि 2021 की जनगणना के अनुसार परिसीमन किया जाए. मतलब 2011 की जनगणना के सरकारी आंकड़ों को भी मुस्लिम बहुल खतरे के चश्मे से देखा जा रहा है.
यहां सवाल यह है कि 370 के खारिज होने के बाद भी जम्मू-कश्मीर में धर्माधारित राजनीति होती रहेगी?
राज्य के डोडा या भद्रवाह जिला का खानाबदोश गुज्जर-बकरवाल मुस्लिम समुदाय आतंकवाद और जीवन की दूसरी कठिनाइयों के चलते कठुआ जिला के हिन्दू बहुल क्षेत्र में रहता है तो इसे मुसलमानों का जनसांख्यिकीय हमला बताया जाता है. जेहादी चाल बता कर हिन्दू समुदाय में इस्लामी खतरे का डर पैदा करने की कोशिश की जाती है.

मुस्लिम खतरे को जिंदा रखने की कोशिश :-

जम्मू-कश्मीर को भारत का ताज़ कहा गया है. इसलिए कि इस राज्य में भी भारत जैसी विविधता के दर्शन होते हैं. यहां भौगोलिक, सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक विविधता की खुशबू है. होना तो यह चाहिए था कि राज्य की विविधता का सम्मान होता. मगर धर्म के नाम पर सियासत करने वाले तत्व धारा 370 के खारिज होने के बाद भी जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम खतरे को जिंदा रखने की कोशिश में हैं.
यह ठीक उसी तरह है जैसे पाकिस्तान के जनरल जिया-उल-हक़ ने 1977 में किया था. पाकिस्तान एक इस्लामिक मुल्क है. हिन्दुओं की संख्या बहुत कम है. इसलिए वहां पर अहमदिया मुस्लिमों को पाकिस्तान के लिए खतरे के रूप में जिंदा रखने की कोशिश की गई.
1977 से पहले पाकिस्तान एक उदार इस्लामिक देश की पहचान रखता था. 1977 के बाद ही पाकिस्तान ने कश्मीर में धर्म की राजनीति का दुर्भाग्यपूर्ण खूनी खेल शुरू किया. 1990 तक कश्मीर में हिंसा चरम पर पहुंच गई. धर्मनिरपेक्ष मानसिकता के लोगों को यह कभी भी गवारा नहीं रहा. भारत की तरह जम्मू-कश्मीर में भी इस्लाम को खतरे के रूप में देखा जा रहा है. ज़मीन की सच्चाई परेशान करती है.  जमीनी आलम यह है कि राज्य के हिन्दू बहुल आबादी वाले गांव-कस्बों में मुसलमानों को खतरे के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. 1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के बाद मुस्लिम विरोधी मानसिकता को ज्यादा हवा मिल रही है. प्रचार यह है कि जैसे पंडितों को कश्मीर सूबा से खदेड़ दिया गया, वैसे ही जम्मू सूबा से हिन्दुओं को खदेड़ दिया जाएगा.
सवाल तो यह है कि क्या जम्मू-कश्मीर की मानसिकता भी पाकिस्तान जैसी हो गई है. 1990 के बाद यहां किसी भी सियासी-समाजी घटना को हिन्दू-मुस्लिम चश्मे से देखा जा रहा है.
कश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या ज्यादा है और जम्मू में हिन्दू, सिक्ख आदि। कश्मीर से विस्थापित पंडितों का जम्मू सूबा में बसना किसी मुसलमान को खतरा नहीं लगता. जम्मू सूबा के ही दो-चार जिलों के गुज्जरों का जम्मू के हिन्दू बहुल जिलों में इस्लामिक खतरा बताया जाता है.
जब धारा 370 के निरस्तीकरण को आतंकवाद के खात्मे और कश्मीर समस्या के समाधान के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है तो फिर मुस्लिम खतरे को जिंदा रखने की कोशिश के क्या निहितार्थ हो सकते हैं?
जम्मू-कश्मीर जैसे विविधतापूर्ण प्रदेश में धर्म को राजनीति के साथ मिलाने के भविष्य में बेहद घातक परिणाम हो सकते हैं. जहां भी यह खेल नियंत्रण से बाहिर हो जाता है तो समाज रहने के योग्य नहीं रहता. •
लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं
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