तो फिर क़ानून व्यवस्था को खुद पर रासुका लगा देना चाहिए?


रवीश कुमार 
डॉ कफ़ील ख़ान ने राजनीतिक भाषण ही तो दिया था। क्या वो इतना बड़ा गुनाह था कि एक डॉक्टर को जेल की सडांध में धकेल दिया जाए। क्या सिस्टम ऐसे होना चाहिए? दो बार रासुका लगाई गई ताकि ज़मानत न मिले। क्या ये डॉक्टर क़ानून व्यवस्था के लिए इतना बड़ा ख़तरा हो सकता है? तो फिर क़ानून व्यवस्था को खुद पर रासुका लगा देना चाहिए।
कहाँ ले जाएँगे इतना अपराध बोध। ग़लत को ग़लत तो बोलिए। आप फ़ैसला नहीं कर पा रहे हैं तो डॉ कफ़ील ख़ान पर कई रिपोर्ट छपी है। वही पढ़ लें। आख़िर किस बात की आप ख़ुद को चुप रहने की सज़ा दे रहे हैं। सिस्टम को इस तरह ध्वस्त करते चले जाने से आपको मिला क्या, इसी की सूची बना लीजिए।


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