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फ़िल्म थ्री इडियट्स में वैचारिक मिस्टेक

फ़िल्म थ्री इडियट्स में वैचारिक मिस्टेक


श्याम मीरा सिंह 
फिल्म थ्री इडियट्स अंत में अपने उन्हीं मूल्यों पर उस्तरा चला देती है जिन्हें वह शुरुआत में स्थापित करने का प्रयास करती है. दुनिया में सक्सेज के जिन फिट पैमानों का फिल्म विरोध करती है अंत होते-होते उन्हीं की पिच पर खेलने लगती है. एक तरफ फिल्म किताबी ज्ञान का विरोध करती है, ग्रेडिंग सिस्टम को कूड़ेदान में पटक देना चाहती है, वहीं फिल्म अपने नायक को क्लास में फर्स्ट नंबर पर रखने के लालच से भी बच नहीं पाती. यही हिंदी सिनेमा का रोमांटिसिज्म है. जिसके अंत में नायक को ही हर बार फर्स्ट दिखाना होता है।
हर बार अंत में नायक को ही सबसे अमीर, सबसे साहसी, सबसे बुद्धिमान दिखाना एक तरह की अनिवार्यता है. यही चलचित्र सिनेमा का भारतीयवाद है. फिल्म की कहानी क्या है इसे बताने की प्रक्रिया को यहां अंग्रेजी के "सो ऑन सो ऑन" वर्ड से खत्म करना चाहता हूं, क्योंकि ऑलरेडी ये फ़िल्म इतनी चर्चित रही है कि लगभग सभी ने देखी होगी. लेकिन इस फ़िल्म के अंतिम सीन को एक बार फिर से याद करिए. जहां दस साल बाद सभी क्लासमेट्स मिल रहे होते हैं, ये देखने के लिए कि किसने कितनी तरक्की की, किसने कितना कमाया, कितने साइज का फ्लैट खरीदा, कितनी लंबी गाड़ी खरीदी. जैसा कि स्वभविक था अंततः रैंचो की ही जीत होती है और चतुर की हार. रैंचों यानी आमिर खान।
एक तरह से थ्री इडियट्स फ़िल्म का ये सीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था का दशहरा है जहां "रटने वाली सोच" पर "प्रक्टिकल सोच" की जीत होती है लेकिन इस अच्छे और प्यारे से मैसेज को देने में खुद फ़िल्म ने भी परम्परागत मानकों का ही उपयोग किया है. जीत-हार का पैमाना यहां भी वही रहा जिसका विरोध फ़िल्म शुरू से ही करती आ रही थी. अंततः जीत-हार का फैसला यहां भी सैलरी स्लिप में दर्ज मिलियन-बिलियन की संख्या के आधार पर ही हुआ.
ये सम्भव है कि दुनियाबी भाषा में जीत हार का शायद यही एक अंतिम पैमाना रहता होगा. लेकिन सबसे अधिक धन कमाने वाले को ही विजयी क्यों माना जाए? डॉलर की कमाई ही हार-जीत का फैसला तय करेगी क्या यही मैसेज थ्री इडियट्स शुरुआत में देना चाहती थी?
नहीं, बिल्कुल नहीं! लेकिन फ़िल्म के अंत में कोंल्यूजन लगभग इसी प्रकार का रहा. फ़िल्म ये बात साबित करने में तो सफल रही कि आदमी को अपने मन का करना चाहिए, उसी से उसे सफलता मिल जाएगी. लेकिन फ़िल्म यह साबित करने में असफल रही कि उस सक्सेज का अंतिम मानक पैसा नहीं है, सादा शब्दों में कहा जाए तो फ़िल्म आपको अपनी मर्जी के फैसले लेने की स्वतंत्रता तो देती है लेकिन अंत में एक ऐसी इच्छा भी पैदा करती है कि मनमर्जी वाला वो फैसला तभी सही माना जाएगा जब अंत में खूब सारा धन कमाया होगा. बड़ा सा नाम होगा, रेपुटेशन होगी. इसे और अधिक सादा शब्दों में कहा जाए तो फ़िल्म क्रिकेट को करियर के रूप में चुनने का साहस तो पैदा करती है लेकिन इस अंतर्निहित इच्छा के साथ कि फैसला सही साबित तभी माना जाएगा जब आप नेशनल टीम के टॉप इलेवन में सेलेक्ट हो जाओगे, अन्यथा आपको सफल नहीं माना जाएगा। सफलता की यह प्रवृत्ति ही खतरनाक है। ये एक अंतहीन दौड़ है जिसका कोई अंत नहीं है। ये प्रवृत्ति भी उतनी ही निर्मम है जितनी कि अपने बच्चे को जन्म लेते ही इंजीनियर तय कर देने की प्रवृत्ति थी.
मेरे हिसाब से फ़िल्म का सार फरहान कुरैशी की उन बातों से होकर गुजरना चाहिए था जो उसने अपने पिता से कहीं थीं, जब फरहान अपने पिता से फोटोग्राफी में करियर बनाने की रिक्वेस्ट करता है. तब फरहान अपने पिता से कहता है  'ठीक है, फोटोग्राफी से कम ही कमा लेंगे, अगर मैं फोटोग्राफर हो गया, तो कम पैसे ही कमाऊंगा न, छोटी गाड़ी होगी, छोटा घर होगा पर अब्बा मैं खुश रहूँगा, I will be really happy'
यहां फोटोग्राफी चुनने के बाद ये नहीं सोचा गया है कि सबसे अच्छा फोटोग्राफर बनना ही बनना है, फोटोग्राफी करनी है अपने लिए, अपने मन के किए, पैशन के लिए। अंतहीन दौड़ में दौड़ने के लिए नहीं। यदि सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर बनने की शर्त पर फोटोग्राफी चुनने की आजादी मिलती है तब ऐसी फोटोग्राफी, थोपी गई इंजीनियरिंग से कैसे अलग है?
अगर नायक चुनने की आजादी मेरे हिस्से होती तो मैं फरहान कुरैशी द्वारा अपने पिता से कही गई इन्हीं पंक्तियों के आसपास ही नायक-अधिनायक का फैसला करने की सलाह देता. यहां एक खुले आसमान में उड़ने के लिए इंजीनियरिंग की डिग्री छोड़ी जा रही है. इस उम्मीद के साथ कि कम भी मिलेगा तो खुश हुआ जाएगा. यहां फरहान की इच्छा टॉप का फोटोग्राफर बनने की नहीं है. बल्कि अपने मन की इच्छा से सिर्फ फोटोग्राफी करने की है. बाकी होना जाना क्या है इससे ज्यादा मतलब नहीं. इस चक्कर में सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर बन गए तो ठीक, न बने तो ठीक, फरहान का यह फैसला ही उसे विशेष बनाता है.
वो फिल्म जो आदमी की मनमर्जियों की पक्षधरिता करती हो, उसके नायक होने का पैमाना 'मर्जी के फैसले' ही होने चाहिए, हार-जीत उसके नायक का सही पैमाना नहीं हो सकती. सच कहूं तो सफलता-असफलता नायक माने जाने के सबसे ओछे पैमानें हैं. सैलरी स्लिप और मिलियन-बिलियन के कारोबार नायक नापने के मानक नहीं हो सकते. आखिर एक फोटोग्राफर का, मूर्तिकार का, एक कवि का मुकाबला उद्योगपति से कैसे किया जा सकता है? सफलता असफलता के लिए आर्थिक आधार पर तय किया गया पैमाना, आदमी की स्वच्छंदता पर हमेशा भारी रहेगा. अंत में धन कमाने की इच्छा आदमी की स्वच्छंदता को ही खत्म कर देगी।
इसलिए "मर्जी के फैसलों" की सफलता का मानक धन संपत्ति नहीं हो सकता. फर्स्ट ग्रेड भी नहीं. टॉप रैंक भी नहीं. बड़ा साइंटिस्ट होना भी नहीं. बड़ा डाक्टर होना भी नहीं. ऐसी फिल्मों का नायक झारखंड के किसी जंगल में ताड़ी मारकर रेडियो पर मिथुन के गाने सुनने वाला शख्स भी हो सकता है. या एक सनक भर के लिए पहाड़ की छाती पर हथोड़े से निशान खींच देने वाला मांझी भी हो सकता है. मन के डिसीजन लेने की भी अपनी एक कीमत होती है. ऐसे कोई भी निर्णय सफलता और असफलता के दबाव से परे होते हैं. इन निर्णयों का मौद्रिक मूल्य किसी भी सैलरी स्लिप से ऊंचा होता है. जिसे दुनिया की किसी भी केंद्रीय बैंक की मुद्रा या समानांतर बाजार के बिटकॉइन से भी न मापा जा सकता है. न खरीदा जा सकता है.
किस फिल्म में किस व्यक्ति को किस पैमाने के आधार पर नायक घोषित करना है इस बात का निर्णय तो सिनेमाई स्वतंत्रता के तहत अंततः डायरेक्टर के हाथ में सुरक्षित है और मैं इसका पूरा सम्मान करता हूँ. लेकिन कामना करता हूं कि भविष्य में हिंदी सिनेमा शायद इतना मैच्योर बने कि दस साल बाद तयशुदा जगह पर दोबारा मिलने पर भले ही चतुर सिंह की सैलरी स्लिप तीनों इडियट्स से ज्यादा हो. उसका घर, उसकी गाड़ी भी तीनों से ज्यादा बड़ी हो. लेकिन उस फ़िल्म में अपनी स्वतंत्रता बेचकर कमाई गई सैलरी स्लिप के ऊपर एक अच्छे फोटो, एक अच्छी किताब, एक अच्छे अविष्कार की विजय दिखाई जाए.
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