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'नो कास्ट, नो रिलिजन' की व्यवस्था क्यों नहीं?

'नो कास्ट, नो रिलिजन' की व्यवस्था क्यों नहीं?


केवल कृष्ण पनगोत्रा
हमारे देश में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो धर्म और जाति के दायरे से ऊपर उठ कर बतौर इन्सान रहना चाहते हैं। सरकार को ऐसे लोगों को उत्साहित करना चाहिए। क्यों कि देश धर्म और जाति से ऊपर है। मगर नीयतन ऐसा नहीं होता। धर्म और जाति का राजनीतिकरण एक रुकावट के रूप में प्रतिस्थापित हो चुका है।
तमिलनाडु की एक महिला 9 साल की लंबी लड़ाई के बाद 'नो कास्ट, नो रिलिजन' सर्टिफिकेट पाने वाली पहली भारतीय बनी। वेल्लोर की एक 35 वर्षीय वकील स्नेहा पार्थिबाराजा आधिकारिक तौर पर 'कोई धर्म, कोई जाति नहीं' प्रमाणपत्र पाने वाली पहली महिला बनीं। 16 फरवरी, 2019, को News18.com के हवाले से जानकारी प्राप्त हुई थी कि तमिलनाडु महिला 9 साल की लंबी लड़ाई के बाद 'नो कास्ट, नो रिलिजन' सर्टिफिकेट पाने वाली पहली भारतीय बनी।
समाचार के अनुसार स्नेहा का पालन-पोषण एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे न तो किसी जाति पर विश्वास था और न ही धर्म में। जन्म और स्कूल प्रमाण पत्र सहित उसके सभी प्रमाणपत्रों में "जाति" और "धर्म" कॉलम के खिलाफ शून्य या रिक्त हैं। "उन्होंने मुझे एक भारतीय के रूप में उल्लेख किया," उसने द हिंदू को बताया ।
स्नेहा का उल्लेख है कि उनके द्वारा भरे गए हर फॉर्म के साथ, सामुदायिक प्रमाण पत्र के अनिवार्य संलग्नक ने उन्हें एहसास दिलाया कि उन्हें एक पहचान प्राप्त करनी थी 'जो जाति और धर्म के आधार पर थी।'
पार्थिबाराजा ने 2010 में अपनी लड़ाई शुरू की, लेकिन उनके सभी प्रयास निरर्थक रहे, क्योंकि अधिकारी आमतौर पर देश में कोई मिसाल नहीं होने के आधार पर ठुकरा देते थे ।
अंत में, 2017 में स्नेहा ने अपना अंतिम आवेदन प्रस्तुत किया और अधिकारियों को अपना पक्ष समझाया। उसने कहा कि वह किसी भी सरकारी योजना या प्रतिबंध का लाभ नहीं उठाना चाहती थी, और इसलिए, उसके अनुरोध को मंजूर किया जाना चाहिए।
5 फरवरी को, तिरुपत्तूर के उप-कलेक्टर, बी प्रियंका पंकजम ने आखिरकार उन्हें 'कोई जाति, कोई धर्म नहीं' पहचान प्रमाण पत्र देने का फैसला किया। "हालांकि हमें कोई मिसाल नहीं मिली, लेकिन हमने आगे बढ़ने और उसे प्रमाणित करने का फैसला किया क्योंकि यह किसी को प्रभावित नहीं करेगा या किसी अन्य व्यक्ति के अवसर को दूर नहीं करेगा।"
अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्यत्र पिछड़ा वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों और सरकारी संस्थानों आदि में आरक्षण नि:संदेह एक बड़ा और पुराना मुद्दा है। जितनी राजनैतिक दिमागी कसरत इस मुद्दे पर हुई है उतनी शायद ही किसी अन्य पर हुई हो। हालांकि 1950 में संवैधानिक तौर पर जात-पात को निरस्त कर दिया गया है मगर जाति आधारित छुआछूत आज भी भारत, विशेषत: ग्रामीण भारत में, चल रहा है। आश्चर्य यह है कि कानूनी रूप से समाप्त होने के बाद भी सरकारी स्तर पर जाति और धर्म की मौजूदगी देखी जा सकती है। अभी भी बहुत सारे रूपों में 'जाति' और 'धर्म' के बाक्स को भरना पड़ता है। जब भी आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करने का मुद्दा उठता है तो यही बात आड़े आती है। आरक्षण के पैरोकार मानते हैं कि यदि हर स्तर पर जाति और धर्म के झमेलों को सरकारी और सामाजिक तौर पर दफन कर दिया जाए तो वे कभी इस व्यवस्था की पैरवी नहीं करेंगे। अगर इस मुद्दे को समीचीन परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक न्याय है। आरक्षण व्यवस्था में कहीं भी आर्थिक लाभ की परिकल्पना नहीं है। कई बार आरक्षित वर्ग से संबंधित लोग तर्क रखते हैं कि स्वर्ण हिन्दू समाज हमारे साथ रोटी-बेटी का रिश्ता क्यों नहीं रखता?
आरक्षण का विरोध करने वालों का मत रहता है कि इससे सरकारी नौकरियों, पदोन्नति आदि के होते अयोग्य लोगों की प्रविष्टि शासन-प्रशासन में होती है। अयोग्य व्यक्ति अागे निकल जाते हैं जब कि योग्य पीछे रह जाते हैं। आरक्षण विरोधी लोगों की यह दलील दमदार तो है मगर इसे सामाजिक विडम्बनाओं और सरोकारों के आलोक में नहीं देखा जा रहा।
रोटी-बेटी के तर्क को इस समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी स्वीकार करता दिखाई देता है। मगर क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं बन रही जहां न तो सामाजिक ऊंच-नीच रहे और न ही आरक्षण का सामाजिक विखंडन पैदा करने वाला ज्वलंत मुद्दा।
25 सितम्बर 2018 को आरएसएस वैचारिकता युक्त 'पांचजन्य' पत्रिका के किसी कार्यक्रम में  तृतीय दिवस को सरसंघचासक डॉ. मोहन भागवत देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोगों को प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे। इनमें एक प्रश्न रोटी-बेटी को लेकर भी था। यहां उक्त प्रश्न और उत्तर को अक्षरशः प्रस्तुत करना जरूरी है
प्रश्न: पूरे हिन्दू समाज में समरसता के लिए रोटी-बेटी का संबंध होना चाहिए। संघ इसके लिए क्या करेगा? अंतरजातीय विवाह तथा अंतरपांथिक विवाह के संबंध में संघ क्या सोचता है? क्या यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि हिन्दू समाज जातियों में बैठेगा?
उत्तर: "रोटी-बेटी व्यवहार का हम पूरा समर्थन करते हैं। लेकिन जब इसको करने जाते हैं तो रोटी व्यवहार तो आसान है और बहुत लोग आजकल कर भी रहे हैं। यह मन से होना चाहिए इसकी आवश्यकता है। इसलिए समझदारी ठीक करनी पड़ेगी। बेटी व्यवहार थोड़ा कठिन इसलिए है कि उसमें केवल सामाजिक समरसता का विचार नहीं, दो परिवारों के मिलन का भी विचार है। वर-वधू के भी मिलने का विचार है। ये सब देख कर हम उसका समर्थन करते हैं। महाराष्ट्र में पहला अंतरजातीय विवाह 1942 में हुआ। अच्छे सुशिक्षित लोगों का था इसलिए उसकी प्रसिद्धि हुई। उस समय उसके लिए जो शुभ संदेश आए थे, उसमें पूजनीय डॉ़ बाबा साहब आम्बेडकर का भी संदेश था और पूजनीय श्री गुरुजी का भी संदेश था। गुरुजी ने उस संदेश में कहा था कि आपके विवाह का कारण केवल शारीरिक आकर्षण नहीं है। आप ये भी बताना चाह रहे हैं कि समाज में सब एक हैं, इसलिए आप विवाह कर रहे हैं। मैं आपका इस बात के लिए अभिनंदन करता हूं और आपको दाम्पत्य जीवन की सब प्रकार की शुभकामनाएं देता हूं। इसलिए मानव, मानव में भेद नहीं करना। प्रत्येक की अपनी रुचि और अरुचि होती है। पूरा जीवन साथ में चलाना है। यह ठीक से चल सकता है कि नहीं, इतना देखना चाहिए। तो बेटी व्यवहार के लिए भी हमारा समर्थन है। मैं तो कभी-कभी कहता हूं कि अंतरजातीय विवाहों की गणना करके प्रतिशत निकाला जाए तो ऐसा करने वाले शायद सबसे ज्यादा प्रतिशत संघ के स्वयंसेवकों का मिलेगा। इस रोटी-बेटी व्यवहार का चलन बढ़ाने से, यानी केवल विवाह और केवल साथ बैठकर खाने की बात नहीं। जीवन की हर व्यवस्था में उसको अभेद दृष्टि से देखना। ये जब करते हैं तो हिन्दू समाज जातियों में नहीं बंटेगा। इसको हम सुनिश्चित कर सकते हैं। वह बंटेगा नहीं ये मैं जानता हूं, इसलिए कि प्रत्येक हिन्दू की जो आत्मा है वो आत्मा एकता में ही विश्वास करती है और मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि आत्मा से अलग होकर ज्यादा चल नहीं सकता।"
बकौल मोहन भागवत अगर "प्रत्येक हिन्दू की जो आत्मा है वो आत्मा एकता में ही विश्वास करती है और मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि आत्मा से अलग होकर ज्यादा चल नहीं सकता", तो फिर धर्मों और जातियों का झंझट किसका पाला-पोसा है? तो फिर ऐसी व्यवस्था बनाने में क्या रुकावट हो सकती है जहां किसी भी चाहने वाले को 'नो कास्ट, नो रिलिजन' सर्टिफिकेट आसानी से मिल जाए। जो लोग जाति और धर्म का ठप्पा उतार कर एक भारतीय और इन्सान की पहचान के साथ जीना चाहें, उन्हें आसानी से सरकारी प्रमाणपत्र क्यों नहीं मिलना चाहिए?
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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