एक भक्त दफ्तर गया और वहां उसने आत्महत्या कर ली, परिवार से इतना प्यार था कि वो अपनी पत्नी और बेटे को नहीं मार सका?

दिलीप मिश्रा 
“क्या करें? इस जिंदगी का अब क्या फ़ायदा? मैंने तो देश के लिए ज़िन्दगी कुर्बान करने की कसमें खाई थी लेकिन जिसके भरोसे ये कसम खाई थी उसने देश को ख़ुद ही बर्बाद कर दिया. अब मैं जी नहीं सकता. इस जीवन को समाप्त कर दूंगा लेकिन मैं तुमसे और अपने प्यारे बेटे से बहुत प्यार करता हूँ, तुम्हारी जिंदगी कैसे ले सकता हूँ?”
यह कहकर वो अपनी पत्नी के सामने रोने लगा.
ये कहानी उस भक्त की है जिसने अपना तन-मन-धन एक इंसान की भक्ति में लगा दिया क्योंकि उसे लगता था वो इंसान नहीं भगवान का अवतार है जो उसके देश का उद्धार करेगा, हर संकट से उबार देगा लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं और देश ओर ज़्यादा बर्बादी की कगार पर जा पहुंचा.
सामाजिक, आर्थिक हर मोर्चे पर देश को शिकस्त खानी पड़ी. उसने देशवासियों को भरोसा दिया था कि देश के सम्मान की रक्षा करेगा, देश को बंटने नहीं देगा लेकिन नौबत ऐसी आयी कि देश के बीच में ही दीवार खड़ी हो गयी. भक्त की मन-स्थिति पर इसका ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने पत्नी-बच्चे समेत अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय ले लिया. वो आत्मग्लानि से भर चुका था और यह सब अपनी पत्नी से बता रहा था लेकिन अपने मां-बाप की सारी बातें 11 साल के बेटे ने चुपके से सुन ली थी.
अगले दिन भक्त अपने बेटे के साथ उसके पसन्दीदा बाग़ में गया, उसके साथ ख़ूब खेला, पुराने गीत गाये, मस्ती की, पुरानी यादें ताजा की और शाम को थक-हार कर अपने बेटे को ख़ुद से लिपटा कर सो गया.
अगले दिन भक्त दफ्तर गया और वहां उसने आत्महत्या कर ली. परिवार से इतना प्यार था कि वो अपनी पत्नी और बेटे को नहीं मार सका.
भक्त के बच्चे के मन पर इसका इसका ऐसा प्रभाव पड़ा कि अगले कई सालों तक उसने मां का दिया हुआ खाना नहीं खाया, डर था कि कहीं उसकी माँ उसे मार न दे.
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अब बात भक्त के भगवान की बात...
था तो वो इंसान ही लेकिन अपने इर्द-गिर्द उसने ऐसा माहौल तैयार कर लिया था कि लोगों को लगता था कि वो कोई अवतार पुरुष हैं. लोग उसकी किसी भगवान की तरह ही पूजा करते थे. उसके हर फैसले को मास्टरस्ट्रोक समझते थे. वो ज़बरदस्त वक्ता था. ऐसा कि अपनी भाषण शैली से लोगों मंत्र-मुग्ध कर लेने की अद्भुत शक्ति उसके पास थी. उसके भाषणों में राष्ट्र को सम्मान लौटाने की स्वप्नगाथाएँ होती थीं. वो लोगों को रोजगार, नौजवानों को बेहतर भविष्य का सपना दिखाता था. पड़ोसी देशों का डर दिखाता था और विदेशी साजिशों को मुहंतोड़ जवाब का भरोसा देता था.
वो बड़ी बड़ी रैलियों, सभाओं को संबोधित करता था जहॉं भक्तों की बड़ी फौज अग्रिम पंक्तियों में बैठकर ताली बजाने और शोर मंचन के लिए होती थी. इन रैलियों में ऐसा माहौल तैयार किया जाता था कि मानो सब उसके मुरीद हैं.
प्रचार-प्रसार उसे ख़ूब पसंद था.उसके भक्त ऐसा प्रचार करते थे कि मुल्क की तबाही के दौर में उनके लिए किसी फरिश्ते ने अवतार लिया है. उसके आकर्षण का ऐसा ताना-बना रचा गया कि उसकी भव्य रैलियों में लाखों की भीड़ होती थी.
बात गुज़रे दौर की है इसलिए इधर वाले भक्त दिल छोटा न करें. बच्चे का नाम हेलमुट था और उस महान भगवान का नाम एडोल्फ़ हिटलर (जर्मनी वाले)

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