कोरोना का दौर है तो वैक्सीन लॉबी आपदा में अवसर तलाश रही है?


दिलीप खान 
वैक्सीन लॉबी अपने-अपने तरीक़े से ख़बर प्लांट कराती रहती है. मेडिकल जर्नल्स में रोज़-रोज़ दर्जनों शोध छपते हैं. उनमें से ज़्यादातर ‘शोध’ स्पॉनसर्ड होते हैं. इन जर्नल्स में स्पॉन्सर करने वाली कंपनियों का नाम छपा रहता है, ताकि 'कॉनफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट' को लोग समझ सकें.
वहां से लपककर हमारे मीडिया वाले स्पॉन्सर कंपनी का नाम ग़ायब कर उसे अंतिम सत्य की तरह फ्रंट पेज स्टोरी बना देते हैं. ये सब ज़माने से चल रहा है. कोरोना का दौर है तो वैक्सीन लॉबी आपदा में अवसर तलाश रही है. लेकिन इसे ‘षडयंत्रकारी विद्वान’ ऐसे पेश कर रहे हैं कि कोरोनावायरस वैक्सीन लॉबी द्वारा लोगों के जेहन में काल्पनिक तौर पर डाल दिया गया वायरस है.
मुकेश अंबानी कोरोना काल में धनी हो रहा है. इसको ऐसे बताया जा रहा है जैसे मुकेश अंबानी को धनी होने देने के लिए ही दुनिया में कोरोना का हौव्वा खड़ा किया गया. जैसे, इससे पहले मुकेश अंबानी लगातार ग़रीब हो रहा था. कोरोना नहीं आता तो डीयू में बंटा का ठेला लगाकर वो खड़ा हो जाता.
कोरोना नहीं था तो ड्रग्स लॉबी क्या इससे अलग काम कर रही थी? मुकेश अंबानी क्या इससे अलग काम कर रहा था? ये लोग जैसे तब थे, वैसे अब हैं. इससे ‘कोरोनावायरस मनोवैज्ञानिक बीमारी है’ का निष्कर्ष निकालने वालों को जब तक कोरोना नहीं पकड़ेगा, तब तक ये लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझेंगे. कोरोना के दौर में सरकार और संस्थाओं की नीतियों पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन मिसगाइडेड मिसाइल की तरह ये लोग कहीं भी फट जा रहे हैं.

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