इससे पहले कि मोदी जी इकोनॉमी पर कोई प्रवचन दें, उन्हें पहले यह बताना होगा कि देश इस स्थिति तक पहुंचा कैसे ?


Soumitra Roy
भारतीय अर्थव्यवस्था की दौड़ में बहुत लंबे समय के बाद अरबों की दौलत समेटे शहर हार रहे हैं। गांव जीत रहे हैं। मेहनतकश किसानों का पसीना काम आ रहा है। आप किसान नहीं बन सकते और न ही उसके श्रम को महसूस कर सकते हैं। मार्च में कोरोना के कारण लॉकडाउन लगने के बाद मेरे कई मित्र अपना बिजनेस छोड़कर गांव चले गए। किसानी कर रहे हैं। शहर से उन्हें ऊब हो रही है।
हालांकि, इकोनॉमी शहरों से धड़कती है। यह धड़कन धीमी पड़ गई है, क्योंकि खपत नहीं है। यकीन मानिए, आर्थिक विकास लक्जरी कारों और महंगे स्मार्टफोन पर टिकी है। भारत के इतिहास में तीन बार मंदी आई और तीनों बार प्रमुख वजह कृषि क्षेत्र की नाकामी रही। ग्रामीण अर्थव्यवस्था देश की जीडीपी का 49 फीसदी है। शहरों में कारें नहीं बिक रही हैं, लेकिन ट्रैक्टर की खरीद 12 फीसदी बढ़ी है। इसी तरह खाद की खपत भी 71 प्रतिशत बढ़ी है।
मनरेगा में 4 करोड़ परिवारों ने काम मांगा और अभी तक 3.3 करोड परिवारों को काम मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मनरेगा को कांग्रेस सरकार की नाकामियों का स्मारक बताया था- इसे हमेशा याद रखिएगा। यही देश को बचाए हुए है।
यह तो सभी समझ रहे हैं कि मार्च से लॉकडाउन का फैसला गलत था। इसने देश की इकोनॉमी को अभी तक 150 बिलियन डॉलर यानी लगभग 11 लाख करोड़ से ज्यादा की चपत लगाई है। यह रिलांयस इंडस्ट्री के मार्केट कैप के बराबर है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था से इस साल 17 बिलियन डॉलर कमाकर देने की उम्मीद है, यानी तकरीबन 15 लाख करोड़। देश का भविष्य किसानों पर टिका है। 
मोदी ने इकोनॉमी को लेकर 12 पूर्व नौकरशाहों से आज चर्चा की है। वे इस खबर पर खुश हो सकते हैं कि दुनिया की 15 नामी कंपनियां भारत में 20 बिलियन डॉलर का निवेश करने जा रही हैं। लेकिन इससे मेरी-आपकी जिंदगी नहीं बदलेगी और न ही खपत बढ़ेगी। हां, कुछ चीजें आसान जरूर होंगी।
मोदी सरकार के पास पैसा नहीं आ रहा है। वित्तीय घाटा 4.66 लाख करोड़ पहुंच चुका है। यह मई का आंकड़ा है। अभी जुलाई चल रहा है। अगर यह बजट के 7.96 लाख करोड़ रुपए के लक्ष्य से ज्यादा हो जाता है तो बड़ी दिक्कत होने वाली है। केवल उर्वरक को छोड़ दें तो बाकी के 7 कोर सेक्टर्स में उत्पादन तकरीबन 23 फीसदी कम है।
कोरोना का ग्राफ जिस तेजी से ऊपर जा रहा है, एक बार फिर देशव्यापी लॉकडाउन की नौबत आ सकती है। एक हफ्ते का लॉकडाउन भी लोगों को और निराश करने वाला होगा। इससे पहले कि मोदी इकोनॉमी पर कोई प्रवचन दें, उन्हें पहले यह बताना होगा कि देश इस स्थिति तक पहुंचा कैसे ? आज नहीं तो कल उन्हें इसका जवाब देना ही होगा, जब बैंक डूबने लगेंगे।

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