आखिर ईमानदार मोदी, बेईमान तंत्र की स्थापना में क्यों लगे हुए हैं?


कृष्णकांत 
क्या आपको याद है कि सूचना अधिकार कानून के साथ क्या हुआ था? सूचना आयोग को भी सीबीआई की तरह 'पिंजड़े का तोता' बना दिया गया. आरटीआई कानून भ्रष्टाचार रोकने और पार​दर्शिता बढ़ाने के लिए आया था. लेकिन संसद के अंदर इसे कमजोर करके भ्रष्टाचार की राह प्रशस्त की गई. आरटीआई कानून में पिछले साल संशोधन करके इसे कमजोर कर दिया गया.
इस क़ानून को आज़ाद भारत में अब तक के सब से कामयाब क़ानूनों में से एक माना जाता है. इस क़ानून के तहत नागरिक हर साल 60 लाख से अधिक आवेदन देते हैं. इसके जरिये कई घोटाले सामने आए थे.
आरटीआई कानून इस सिद्धांत पर बना था कि जनता को यह जानने का अधिकार रखती है कि देश कैसे चलता है. इसके लिए सूचना आयोग को स्वायत्तता दी गई कि वह सरकारी नियंत्रण से मुक्त होगा. सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, वेतन, भत्ते, और कार्यकाल यह सब सुप्रीम कोर्ट के जज और चुनाव आयुक्तों के समान होगा. यानी सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त.
अब चूंकि मोदी जी ईमानदार हैं, इसलिये उन्होंने कानून बदल दिया. अब सूचना आयोग स्वायत्त नहीं होगा. सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन, भत्ते आदि सब केंद्र सरकार निर्धारित करेगी. यानी वह जब जिसे चाहे, जितने समय के लिए चाहे, रखेगी. चाहेगी तो हटा देगी. यानी आरटीआई कानून अब दुनिया के सबसे बेहतर नागरिक अधिकार कानूनों में से एक नहीं रहेगा.
नए बिल में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग संवैधानिक पद है. सूचना आयोग एक कानूनी विभाग है. दोनों की स्थिति जस्टिफाइड होनी चाहिए. यानी अब सूचना आयोग के अधिकारी का पद जज के समान अधिकार सम्पन्न नहीं होगा, तो वह कमजोर माना जायेगा. वह उच्च अधिकारियों को निर्देश दे सकने की स्थिति में नहीं होगा.
प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के साथ भी यही किया गया जो आरटीआई एक्ट के साथ हुआ. भारत की जनता ने आंदोलन करके लोकपाल पास कराया था. मोदी जी ने ऐसा लोकपाल बनाया जो सरकार की अनुमति के बिना कोई हैसियत नहीं रखता. एक और पिजड़े का तोता.
आरटीआई कानून में अगर संशोधन करना हो तो ​इसके लिए सार्वजनिक सुझाव मांगे जाने का प्रावधान है, लेकिन सरकार चुपके से बदलाव कर दिया. किसी से परामर्श नहीं लिया.
नये कानून में कहा गया है कि केंद्र सरकार के पास किसी भी वर्ग या व्यक्तियों के संबंध में नियमों में किसी भी तरह के बदलाव का अधिकार है. सरकार इस आधार पर नियुक्ति के समय अलग-अलग आयुक्तों के लिए अलग-अलग कार्यकाल निर्धारित करने के लिए इन शक्तियों का संभावित रूप से इस्तेमाल कर सकती है.
अब सूचना विभाग किसी लिजबिज सरकारी विभाग जैसा सरकार का कठपुतली बन जाएगा. ऐसा करके मोदी जी ने भ्रष्टाचारियों के हाथ काफी मजबूत कर दिए हैं.
आप खुद ही सोचिए कि जिस सरकार को भ्रष्ट कहा गया उसने नागरिकों के हाथ में अपने खिलाफ 'सूचना का अधिकार' थमा दिया. अब जिस पार्टी और नेता पर जनता का अपार ​भरोसा है, जिसे ईमानदार कहकर प्रचारित किया जाता है, वह एक एक कानून को कमजोर करके जनतंत्र की जड़ को कमजोर कर रहा है. आखिर ईमानदार मोदी, बेईमान तंत्र की स्थापना में क्यों लगे हुए हैं?

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