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रवीश की रिपोर्ट: सोचिए जहां ये तीन चीज़ें ठीक नहीं होंगी वहां कोरोना से इंसान किस तरह से मर रहा होगा?

रवीश की रिपोर्ट: सोचिए जहां ये तीन चीज़ें ठीक नहीं होंगी वहां कोरोना से इंसान किस तरह से मर रहा होगा?


रवीश कुमार 
“दिल्ली में मौत के आंकड़े काफी कम हो गए हैं।जून के महीने में 101 मौत हुई थी।अब रोजाना 30 से 35 मौत हो रही हैं हालांकि यह भी नहीं होनी चाहिए हम इसको भी कम करेंगे।हमें देखा की मौत क्यों हो रही है तो पाया की पहली वजह है टेस्टिंग। टेस्ट होने में समय लग रहा था इसलिए दे रही हो जा रही थी। एंबुलेंस की कमी थी लेकिन हमने आज इतनी एंबुलेंस का इंतजाम कर लिया है कि सभी लोगों को जो फोन करते हैं उनको एंबुलेंस दी जाती है।
पहले 2 घंटे लग जाते थे आज आधे घंटे में एंबुलेंस आ रही है। पहले अस्पताल में औपचारिकताएं पूरी करने में 2 से 4 घंटे लग जाया करते थे और एंबुलेंस में मरीज की मौत हो जाए करती थी अब हमने इंतजाम कर दिया है कि सबसे पहले मरीज अस्पताल के होल्डिंग एरिया में जाएगा और पहले उसको ऑक्सीजन दी जाएगी और कागजी कार्रवाई बाद में की जाएगी।“
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की इस बात को ध्यान से देखिए। यही कि टेस्ट होने में देरी से, एंबुलेंस आने में देरी से और अस्पताल में भर्ती की देरी से लोगों की मौत हो रही थी। उन्होंने खुद माना है। बता रहे है कि इसे ठीक करने के कारण जून के महीने में जहां हर दिन 100 लोग मर रहे थे अब 30-35 लोगों की मौत हो रही है। सिर्फ इन तीन चीज़ों को ठीक करने से अगर हर दिन 70 लोगों की जान बचाई जा सकती थी तो सोचिए जहां ये तीन चीज़ें ठीक नहीं होंगी वहां इंसान किस तरह से मर रहा होगा।
केजरीवाल की इस बात से एक चीज़ साफ है कि टेस्टिंग होने से अस्पताल और मरीज़ को समय मिलता है। समय पर पता चलने से मरीज़ की जान बच सकती है। तबीयत बिगड़ गई और बाद में ही टेस्ट हुआ तो बीमारी के मैनेजमेंट में काफी देरी हो जाती है। टेस्टिंग के इस पहलू पर किसी ने बात नहीं की थी। अब सोचिए जहां टेस्ट कम हो रहे हैं। देरी से हो रहे हैं। वहां मरीज़ की मौत इस वजह से हो तो कौन जवाबदेह है? मेरी राय में थाली बजाने वाली जनता ही जवाबदेह है?
अगर उसने ढंग के सवालों को लेकर दबाव बनाया होता तो ये नौबत न आती। ख़ुद केजरीवाल ने माना है कि मीडिया ने सवाल उठाया। तो पत्रकारों को फोन किया और कमियां पूछीं और उसे ठीक किया। आप याद करें अप्रैल और मई के महीने में अचानक दिल्ली से खबरें आने लगी थीं। ज़रूर केजरीवाल को लगा होगा कि मीडिया किसी के प्रभाव में उन्हें निशाना बना रहा है। लेकिन यह अच्छी बात है कि उन्होंने इसे चुनौती के रूप में लिया और सिस्टम को ठीक किया। बिहार में कोरोना को लेकर कुछ भी बोलिए, सरकार वहां मस्त है कि वोट तो मिलेगा ही। अभी से वह जीत की अपनी अंतिम खुशी में मगन है।
केजरीवाल की इस बात को आसानी से आप नहीं छोड़ सकते हैं। इस देश को पता होना चाहिए कि 24,000 से अधिक मौतें हुई हैं उनमें से कितनी मौतें इन तीन देरियों के कारण हुई हैं। क्या समय पर टेस्ट कर, समय पर अस्पताल पहुंचा कर मरीज़ को बचाया जा सकता था?
मुझे पता है कि इस देश में ईमानदार सर्वे और ईमानदार जवाब की उम्मीद बेकार है फिर भी यह सवाल हमें जवाबदेही के उस छोर तक ले जाएगी कि सरारें अगर मुस्तैद होतीं, इंतज़ाम से पहले विश्व बन गए, विश्व गुरु बन गए टाइप के प्रोपेगैंडा में न लगती हैं तो आज कई लोग ज़िंदा होते। इसलिए स्वास्थ्य एक्टिविस्ट की टीम बनाकर एक एक मौत की जांच होनी चाहिए कि किसी मरीज़ के मरने में टेस्टिंग में देरी, एंबुलेंस में देरी और भर्ती में देरी का क्या रोल था? दिल्ली के अलावा किन-किन राज्यों ने इन देरियों को ठीक किया है? मरने वालों की संख्या और इन तीन देरियों में क्या संबंध हैं? 
भारत ने मार्च में तालाबंदी की। उस वक्त इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। न ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ऐसा कहा था। चीन का देखा और नकल कर ली। लगा कि राष्ट्र के नाम संदेश देने का अच्छा मौका है। आप उस समय प्रधानंमत्री के भाषण का विश्लेषण निकाल कर देखिए। कभी-कभी पुराने लेखों को पढ़ना चाहिए। सिर्फ भाषण से उनकी वाहवाही होने लगी थी।जबकि यही सरकार कोरोना को नकारती रही। ट्रंप के लिए अहमदाबाद में रैली हुई। संसद चली। संसद में मास्क को लेकर कितनी बातें हुईं। मध्य प्रदेश में सरकार गिराने का खेल हुआ। तब तक स्थिति हाथ से निकल गई।
इस दौरान सरकार अगर विदेशों से आए चंद लाख लोगों की कांटेक्ट ट्रेसिंग तेज़ी से होती तो तालाबंदी की नौबत नहीं आती। जो विदेश से आए थे, किससे मिले कहां गए, उनकी तबीयत कैसी है, पता लगाना बेहद आसान था। ज़िंदगियां बर्बाद हुई हैं। खुद से पूछना होगा कि तबलीग जमात की खबरों की चपेट में आए थे या नहीं आए थे?
क्या हुआ तब तो सब्ज़ी वाले का धर्म पूछ रहे थे, इतनी ताकत थी तो सरकार से दो सवाल कर लेते? खुद  केजरीवाल तबलीग को लेकर हुए प्रोपेगैंडा की चपेट में आए और प्रेस कांफ्रेंस में अलग से जानकारी देने लगे कि तबलीग के कितने संक्रमित हुए हैं। आप मीडिया के प्रोपेगैंडा के शोर से इस कड़वे सच से भाग नहीं सकते। इसी पर लौट कर आना होगा। पूछना पड़ेगा। वर्ना अपनी बर्बादी को लेकर सिसकते रहिए।
इस आपराधिक लापरवाही की सज़ा आज अनगिनत लोग भुगत रहे हैं। लोगों के रोज़गार छिन गए। अफसोस कि वे भी भुगत रहे हैं जो 6 साल से व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में मुस्लिम विरोधी नफ़रत के नशे में थे। ऐसे लोगों को अलग से भत्ता मिलना चाहिए था मगर इन्हें भी छोड़ दिया गया है। नफ़रत का नशा इतना था कि जब नफ़रत करने के लिए मुसलमान कम पड़ गए तो नेहरु को मुसलमान बना लाए।
आज उस नफरत से क्या मिला, आप जाकर इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ने वाले लाखों नौजवानों से पूछें। सब नहीं होंगे चपेट में लेकिन बिना देश का इतिहास जाने, इतिहास को इतिहास की तरह पढ़े नफ़रत की ये आंधी कैसे चल रही थी, अगर इसमें युवा शामिल नहीं थे। जिन युवाओं पर देश को बनाने की ज़िम्मेदारी थी उन्होंने ही बेड़ा गर्क़ कर दिया। अब दिन भर पत्र लिखते रहते हैं कि किराये का पैसा नहीं है। कालेज वाला ज़्यादा फीस मांग रहा है। कोई सुन नहीं रहा है। पर आप ही तो थे जो बोलने वाले को चुप करा रहे थे।
आपने देखा नहीं कि मीडिया कैसा हो गया है। उस पर सिर्फ एक आदमी की तस्वीर और भाषण चलता है। जब आपको उससे एतराज़ नहीं था तो फिर शिकायत क्यों कर रहे हैं कि आपकी कोई नहीं सुन रहा। क्या व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में नेहरू को मुसलमान बताने वाले मीम की सप्लाई इनदिनों कम हो गई है? मीम ही आज का अफीम है।
बिहार में अफीम का ही तो अहंकार है। वर्ना इन चार महीनों में कोरोना से लड़ने की व्यवस्था ठीक हो गई होती। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मीडिया से इस महामारी पर बात तक नहीं की है। यह आत्मविश्वास कहां से आ रहा है कि जनता मर जाए, हम किसी से बात नहीं करेंगे और मरी हुई जनता भी हमें ही वोट देकर जाएगी। गुजरात में सूरत, राजकोट और अहमदाबाद का हाल देखिए। पता चल रहा है कि वहां कोई मॉडल नहीं था। कितने लोग मर गए। नकली वेंटिलेटर की कहानी उसी मॉडल वाले राज्य से आई। क्या प्रधानमंत्री ने एक शब्द बोला, पूछा किसी ने उनसे, क्या गृहमंत्री ने एक शब्द बोला?
जनता मीम के अफीम के नशे में है। उसमें सवाल करने की ताकत समाप्त हो गई। जो बची हुई है वो इन दिनों ट्विटर पर ट्रेंड कराने में ख़र्च हो रही है। सोशल मीडिया मीडिया का विकल्प नहीं हो सकता। और मीडिया को लोगों ने इस देश में बीजेपी बना दिया। मोदी बना दिया। जबकि इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। आप आराम से बीजेपी को वोट कर सकते थे लेकिन नागरिक बनकर स्वतंत्र मीडिया की भी मांग कर सकते थे।
आपमें इतनी भी ताकत नहीं बची है कि आप आनंद तेलतुंबडे, डॉ कफ़ील ख़ान, गोतम नवलखा, वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, महेश राउत की गिरफ्तारी के डिटेल को पढ़ें औऱ उस पर बात करें। आप अब मीडिया से बात न करें। समस्या है तो मीम का अफीम लें। व्हाट्स एप में नेहरू की मीम देख लें। समस्या दूर नहीं होगी लेकिन आप समस्या से दूर हो जाएंगे। 
अगर जनता अफीम के नशे में नहीं होती तो कोई सरकार इस तरह का फैसला करती कि बिना सैलरी के पांच साल के लिए छुट्टी पर भेज देंगे? क्या इसके लिए राहुल गांधी ज़िम्मेदार है? क्या नौकरी निकालने और पांच साल बिना वेतन के छुट्टी पर भेजने में कोई फर्क नहीं होता? एयर इंडिया की ख़बर पढ़िए। उनके कर्मचारी पांच साल की छुट्टी पर भेजे जाएंगे। एयर इंडिया पांच साल रहेगा?
रिलायंस में गूगल ने 33 हज़ार करोड़ का निवेश किया है। इसकी घोषणा गूगल प्रधानमंत्री से पहले करता है। मोदी सरकार के मंत्री कहते हैं कि बड़ी कामयाबी है। उसके अगले दिन खबर आती है कि गूगल ने रिलायंस में निवेश किया है। क्या रिलायंस में निवेश की खबर भी सरकार की उपलब्धि है? और उसकी घोषणा रिलायंस से पहले अब सरकार करेगी ?
यह समय निर्गुण भाव से रहने का है। जब जनता ही जनता नहीं है तो किससे और क्या बात करें। इंजीनियरिंग कालेज के छात्रों को मीम की सप्लाई दिन में दो बार होनी चाहिए। वहां से काफी लोग समर्थक बनते हैं। छह साल से उनके तेवर देख रहा था। आज उनकी आक्रामकता महज़ फीस की मांग के सामने ढीली पड़ गई है। वे अकेले पड़ गए हैं। जबकि उनके साथ नाइंसाफी हो रही है। लेकिन वे किससे इंसाफ मांगे, अब तो इंसाफ़ का सिस्टम भी समाप्त हो चुका है।
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