तो पीएम नरेंद्र मोदी पद पर रहते हुए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन को क्यों नहीं जा सकते?


नदीम एस. अख्तर 
जब भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पद पर रहते हुए अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर वहां मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त कर सकते थे तो मौजूदा पीएम नरेंद्र मोदी पद पर रहते हुए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन को क्यों नहीं जा सकते?
इसमें देश के संविधान की पंथनिरपेक्षता कहां से आड़े आ गई? कांग्रेसी पीएम करे तो रासलीला और भाजपाई पीएम करे तो कंगाली में आटा गीला! ये नहीं चलेगा। सभी दलों के पीएम को मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने में बराबर हक मिलना चाहिए।
इसमें सुप्रीम कोर्ट और उसके पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई जी ने भी योगदान दिया और लगभग महीने भर की त्वरित सुनवाई कर तूफानी फैसला भी दे दिया। रिटायरमेंट से पहले। इसी पुनीत कार्य को अंजाम देने के लिए वे जज बने थे।
संविधान की पंथनिरपेक्षता का रोना रोके कृपया रंग में भंग मत डालिए। चीन हमारी ज़मीन कब्ज़ा चुका है बॉर्डर पे, इसका गम करना ठीक नहीं। देश को अब ताली-थाली के बाद फिर से सेलिब्रेशन मूड में आने की ज़रूरत है। अयोध्या में मंदिर भूमि।पूजन में पीएम मोदी की शिरकत एक बार फिर देश को रिचार्ज कर देगा। सारे टीभी न्यूज़ चैनल दो-तीन दिन के लिए आस्था चैनल में परिवर्तित हो जाएंगे। भक्ति की बयार होगी। चीन के जख्म को मत देखो, सब भली करेंगे राम।
सो जो लोग माननीय पीएम मोदी जी की अयोध्या स्थित राममंदिर भूमिपूजन में शिरकत करने की खबर से भन्नाए बैठे हैं, उनको जादू की झप्पी दीजिए और कहिए- Get well soon my dear! संविधान को मारो गोली और सुनो दिल की।
 एक कांग्रेसी पीएम राजीव गांधी के आदेश से बाबरी मस्जिद का ताला खोलकर वहां पूजा की अनुमति मिली, दूसरे कांग्रेसी पीएम नरसिम्हा राव के राज में बाबरी मस्जिद गिराई गई और तीसरे भाजपाई पीएम नरेंद्र मोदी के राज में वहां राम मंदिर निर्माण का मार्ग सुप्रीम कोर्ट ने प्रशस्त किया और अब वे वहां मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में व्यक्तिगत तौर पे शिरकत करेंगे।  एक नेक काम के लिए किसी देश में इतनी एकता और ऐसा team work दुनिया के किसी और देश में देखा है आपने? It happens only in India.
इन देश में संविधान की पंथनिरपेक्षता का मतलब मुहम्मद अली जिन्ना और पंडत नेहरू/ सरदार पटेल 1947 में ही समझ चुके थे। और देखिए, आज वही हो रहा है। संविधान जनता के लिए होता है और उसे जनता बनाती है। देश का राज चलाने के लिए पीएम भी जनता ही चुनती है। सो जनता के चुने हुए पीएम को देश चलाने के लिए संविधान में फेर-बदल का भी अधिकार है। जनता के हितों के मद्देनजर। संविधान में लिखा एक शब्द "पंथनिरपेक्ष" जनता के हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। जनता का चुना पीएम उसकी भावनाओं की अभिव्यक्ति होता है। और पीएम के कार्य जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होते हैं। इसमें संविधान कहाँ से आ गया?
इस देश में पीएम दर पीएम और हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने अयोध्या मामले में जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए राम मंदिर निर्माण की अनुमति दी है। बाबरी मस्जिद इतिहास थी, राम मंदिर वर्तमान है। ये वर्तमान पर है कि वह इतिहास को अपनी गोद में जगह देता है या नहीं। अगर राजशाही में बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्ज़िद बनाई थी (जैसा दावा है) तो लोकशाही में भी मस्ज़िद तोड़कर मंदिर बनाया जा सकता है। ये जनता का शासन है और लोकशाही में होगा वही, जो जनता का बहुमत चाहता है।
सो कल को जनता का बहुमत प्रधानमंत्री का पद हटाकर सीधे राष्ट्रपति के पद में सारी विधायी और कार्यकारी शक्तियां निहित कर दे, संविधान में इसके माफिक संशोधन हो जाए तो आश्चर्य मत करिएगा। जनता के बहुमत से चुनी हुई सरकार और जनता के बहुमत की आकांक्षाओं से दबा हुआ कोर्ट, जनता के भले के लिए कोई भी निर्णय ले सकता है। यही लोकतंत्र है, यही लोकशाही है, यही प्रजातंत्र है, यही डेमोक्रेसी है, यही गणतंत्र है, यही जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता का खुद अपना शासन है।
संविधान में लिखा शब्द " पंथनिरपेक्ष" अगर जनभावनाओं की राह में रोड़े अटकाएगा, तो उसे भी हटा दिया जाएगा। जनता की सुनिए, संविधान की नहीं। संविधान जनता के लिए ही बनाया गया है और अगर उसमें पंथनिरपेक्ष जैसे शब्द की त्रुटियां रह गई हैं, तो उसे जल्द हटाया जाएगा। थोड़ा सब्र करिए। सब्र का फल मीठा होता है। आम बोए थे, तो सेब कहाँ से मिलेगा? गुठली तो मिलेगी ही मिलेगी। कुछ बीज बड़े होते हैं और कुछ छोटे। ये तो क़ुदरत का नियम है। बीज, बीज की बात है।

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