इन दोनों सवालों का सही जवाब न भारत के पास है और न ही नेपाल के पास?


Soumitra Roy
कोर्ट भी ग़ज़ब है। क्या इत्तेफाक़ है। 10 जुलाई को नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए ओली सरकार से पूछा कि भारत में काम कर रहे नेपाली कामगारों को वो तमाम सुविधाएँ और सुरक्षा क्यों नहीं दी जाए, जो दूसरे देशों में काम कर रहे नेपाली कामगारों को मिलती हैं।
भारत की सुप्रीम कोर्ट ने आज पूछा है कि भारत में कितने नेपाली प्रवासी लोग काम कर रहे हैं और कितने भारतीय प्रवासी इस वक़्त नेपाल में काम कर रहे हैं?
इन दोनों सवालों का सटीक जवाब देना आसान नहीं है, क्योंकि भारत और नेपाल सदियों पुराने रिश्ते में बंधे हैं और ख़ासकर 1950 के शांति और मैत्री संधि के कारण दोनों देशों में बिना किसी रोक-टोक के लोगों का आना जाना होता रहा है।
दोनों सवालों का सही जवाब न भारत के पास है और न ही नेपाल के पास।
वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान विदेशों में रह रहे नेपाली नागरिकों ने केवल आधिकारिक स्रोतों के ज़रिए आठ अरब 80 लाख अमरीकी डॉलर नेपाल भेजे थे। ये बता पाना मुश्किल है कि इसी दौरान हुंडी और हवाला जैसे अनाधिकारिक चैनलों से कितने पैसे नेपाल आए थे।
विश्व बैंक के अनुसार भारत में काम कर रहे नेपाली कामगारों ने पिछले साल एक अरब अमरीकी डॉलर से ज़्यादा रक़म नेपाल भेजा था, जबकि नेपाल में काम कर रहे भारतीय कामगारों ने क़रीब पाँच अरब अमरीकी डॉलर भारत भेजा था। इस तरह से देखा जाए तो नेपाल भारत में आने वाले कैश फ़्लो (रेमिटेन्स) का एक बड़ा ज़रिया है।
भारत-नेपाल के बीच श्रम-संबंधों को देखते हुए ये कहना मुश्किल है कि नेपाल की सरकार सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का कुछ ही दिनों में कैसे और क्या जवाब देगी। और मोदी सरकार क्या जवाब देगी?

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