सबको सत्ता चाहिए, ताक़त चाहिए, पैसा चाहिए और अधिकार चाहिए


Soumitra Roy
सचिन पायलट को सत्ता चाहिए, ज्योतिरादित्य को सत्ता चाहिए, अमित शाह सत्ता में ही हैं, फिर भी उन्हें सत्ता चाहिए, सबको सत्ता चाहिए। ताक़त चाहिए। पैसा चाहिए। अधिकार चाहिए।
अगर कोई, किसी से अपनी मर्ज़ी के आधार पर कुछ ऐसे काम करवा सकता है जो वह अन्यथा नहीं करता, तो इसे एक व्यक्ति की दूसरे पर सत्ता (Power) की संज्ञा दी जाएगी। सत्ता की यह सहज लगने वाली परिभाषा रॉबर्ट डाह्ल की देन है।
सत्ता से जुड़े अहम सवालों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि सत्ता समाज में व्यापक और समान रूप से वितरित है या किसी शासक वर्ग या किसी ‘पॉवर इलीट’ के हाथों में केंद्रित है? स्टीवन ल्यूक्स ने सत्ता के तीन आयामों की चर्चा करके उसके कई पहलुओं को समेटने की कोशिश की है।
उनके अनुसार सत्ता का मतलब है निर्णय लेने का अधिकार अपनी मुट्ठी में रखने की क्षमता, सत्ता का मतलब है राजनीतिक एजेंडे को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए निर्णयों के सार को बदल देने की क्षमता और सत्ता का मतलब है लोगों की समझ और प्राथमिकताओं से खेलते हुए उनके विचारों को अपने हिसाब से नियंत्रित करने की क्षमता।
हरबर्ट मारक्यूज़ अपनी विख्यात रचना वन- डायमेंशनल मैन (1964) में लिखते हैं कि हिटलर के नाज़ी जर्मनी में या स्टालिन के रूस में सत्ता के आतंक का प्रयोग करके सर्वसत्तावादी राज्य कायम किया गया था, पर औद्योगिक समाजों में यही काम आधुनिक प्रौद्योगिकी के ज़रिये बिना किसी प्रत्यक्ष क्रूरता के लोगों की आवश्यकताओं को बदल कर किया जाता है। ऐसे समाजों में टकराव ऊपर से नहीं दिखता।
भारत में यही हो रहा है। जो दिख रहा है, वह गहराई में चल रही खलबली से बिल्कुल अलग है। कहीं न कहीं, कांग्रेस से बड़ी चूक हो रही है। बार-बार। लगातार। पार्टी को नेतृत्व का विकेंद्रीकरण करने की ज़रूरत है। परिवारवाद से निकलने की।
2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद सियासत को करवट लिए 6 लंबे साल गुजर गए। लेकिन कांग्रेस बदलाव का रास्ता नहीं ढूंढ सकी है। इससे बीजेपी को ही ताकत मिली है। संसदीय लोकतंत्र की लगातार धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
आज सूचना-तकनीक से जुड़ी संसदीय समिति की डेटा प्रोटेक्शन बिल को लेकर बैठक महज़ 3 दिन के नोटिस पर हुई। फिर वह हुआ, जो होना था। बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। सत्ता बदलने पर सियासत बदलती है, समीकरण बदल जाते हैं, आम जनता को कोई नहीं पूछता।
इस हफ़्ते भारत में कोरोना के 10 लाख मरीज़ हो जाएंगे। पूरा साल महामारी के नाम जा रहा है। तीज़-त्योहार से लेकर रोटी और रोजगार तक के लिए रोज़ की जंग लोगों को तोड़ने लगी है।
देश के 80 करोड़ से ज़्यादा लोग रोज़ सिर्फ जीने के लिए जद्दोजहद में जुटे हैं। ऊपर सत्ता की लड़ाई है। उधर देश तबाह हो रहा है। गनीमत है यह सशस्त्र उलटफेर नहीं है, वरना हमें सूडान या सीरिया में होने का अहसास होता।
बीते 20 साल में हमने अपने लोकतंत्र को किस कदर सत्ता केंद्रित कर लिया है कि हमारा ही वज़ूद खो चुका है। देश की सियासत में एक ब्लैक होल उभर रहा है। आस-पास की सभी छोटी चीजों को निगलने के लिए बेताब। कोई नहीं जानता कि ब्लैक होल के फटने पर क्या होता है? साइंस भी हैरान है।

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