मुस्लिम मुद्दों पर तो सब बोलतें हैं लेकिन उनके हक़ के लिए कोई नहीं बोलता.....


Shakeeb Rahman
मुस्लिम मुद्दों पर बोलने वालों की न ही राजनीति और समाज और न ही सोशल मीडिया में लोगों की कमी है। जैसे ही तीन तलाक़ की बात होती है , कॉमन सिविल कोड की बात होती है या फिर किसी मुसलमान की मोब लॉन्चिंग होती है तो पूरा बुद्दिजीवी वर्ग और सोशल मीडिया मुसलमानों के पक्ष में गनगना उठता है।अच्छा लगता है लेकिन क्या सिर्फ तब ही मुसलमानों पर बोला जाना चाहिए जब उपरोक्त बातें होती है ?
उनके हक की बात कभी सुनी है आपने ?
आप कहेंगे कि उपर्युक्त बातें भी तो मुसलमानों के हित की हैं......हाँ है .....लेकिन उसमें मुसलमानों के हक़ की बात पूरी नहीं होती है।
मुसलमानों की हक़ की बातों की लिस्ट बनाए तो वो बहुत ही लम्बी हो जाएगी .....सच्चर कमेटी को उसे बताने के लिए 403 पेज लगे।
हम सिर्फ तीन पर ही बात करें तो .....शिक्षा , रोजगार और विधायिका में प्रतिनिधित्व.....
सच्चर कमेटी के अनुसार..... सिर्फ 6 % मुसलमान स्नातक तक की शिक्षा पूरी करते हैं और तकनीकी शिक्षा की तो पूछिये ही मत नाममात्र  0.4 %। सरकारी नौकरियों में 4.9 % , सिविल सेवा में 2.4 प्रतिशत । और जहाँ तक विधायिका में प्रतिनिधित्व की बात की जाए तो केवल 5 %।( आंकड़े सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार)
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट एक सरकारी दस्तावेज है उससे कोई भी सरकार मुँह नहीं मोड़ सकती है। बीजेपी कहती है कि सच्चर कमेटी मुस्लिम तुष्टिकरण था....तो आपको बता दें कि सच्चर कमेटी उन्ही बातों का वर्णन है जो फरवरी 2000 में गठित संविधान समीक्षा आयोग की रिपोर्ट में कहा जा चुका है। मतलब बीजेपी का विरोध ढोंग मात्र है।
किसी भी पिछड़े वर्ग के उत्थान की बात करना देश की उन्नति के लिए परम् आवश्यक है। चाहे वो मण्डल कमीशन की बात हो या एससी / एसटी के उद्धार की बात।
मुसलमानों की बात छोड़ भी दें तो ज़रा सोंचिए ...…क्या बीजेपी कभी मण्डल कमीशन की बात करती है ? जिसके 22 में से सिर्फ 2 अनुशंसा लागू हुई है। साथ ही इसके 22 वे अनुशंसा में कहा गया है कि 20 वर्षों के बाद इसकी समीक्षा की जानी चाहिए।
संविधान समीक्षा आयोग ( वाजपेयी द्वारा बनाई गई ) कहता है कि अल्पसख्यकों के शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने से राष्ट्रीय एकीकरण में मदद मिलेगी साथ ही यह प्रक्रिया राष्ट्रीय सामंजस्य का उच्च मार्ग है। मतलब ऐसा करना राष्ट्र को मजबूत करना हुआ , वास्तव में यही राष्ट्रवाद है न कि घृणा और हिंसा फैलाना।
सुनो संघियो....सच्चर कमेटी मुसलमानों के लिए किसी विशेष दर्ज़े की मांग नहीं करता है सिर्फ उनकी मुफ़लिसी और बदहाली को बयां कर उसमे सुधार के लिए कुछ अनुशंसाएं करता है वो भी संवैधानिक दायरे के अंदर रहते हुए।
सोंचिए .....किसी देश के 20 करोड़ लोग अगर रसातल में चले जाएं तो क्या देश विश्व गुरु बन सकता है ?
इसलिए मुसलमानों के बारे में सिर्फ तब बोलना काफ़ी नहीं है जब उन पर अत्याचार हो बल्कि उनके हक के लिए भी आवाज़ उठाना पूरे सभ्य समाज का काम है और ऐसा कर आप राष्ट्रवाद में ही अपना योगदान देंगें क्योंकि देश विश्व गुरु तब ही बन पाएगा।

0/Post a Comment/Comments

Previous Post Next Post
loading...