सरकार देश का संसाधन बेच रही है, जनता गरीबी में पिसकर अपने बच्चे बेच रही है?


कृष्णकांत 
लॉकडाउन में आई भयानक तंगी में पिता ने 4 माह की बेटी को बेच दिया. असम के कोकराझार का रहने वाला दीपक गुजरात में मजदूरी करता है. कोरोना में वह असम लौट आया था. लॉकडाउन में रोजगार छिन गया. परिवार तंगी में चला गया. खाने के लाले पड़ गए. अंत में पिता ने अपनी बच्ची को बेच दिया. 45000 रुपये में.
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. हम अपने देश की कल्पना भारत माता के रूप में करते हैं. भारत माता की गोद में खेलने वाली एक बच्ची की कीमत 45000 रुपये आंकी गई है.
मध्य प्रदेश के गुना में जिला अस्पताल के सामने एक आदमी तड़प कर मर गया. पत्नी उसे अस्पताल लेकर आई थी, मगर उसके पास अस्पताल में पर्ची कटवाने तक के पैसे नहीं थे. पर्ची नहीं कटी तो इलाज नहीं दिया गया. मरीज रात भर अस्पताल के बाहर पड़ा रहा और सुबह उसकी मौत हो गई.
सरकारी अस्पताल में पर्ची कितने रुपये में कटती है? इस देश में मनुष्य के जीवन की कीमत एक रुपये, पांच रुपये या दस रुपये भी नहीं है. उधर सरकार कहती है कि सब बेच दो. स्कूल और अस्पताल बेच दो. परिवहन और उड्डयन बेच दो. तेल और कोयला बेच दो. विभाग और कंपनियां बेच दो. जनता के पास जहर खाने के भी पैसे नहीं हैं.
सरकार देश का संसाधन बेच रही है. जनता गरीबी में पिसकर अपने बच्चे बेच रही है. कोई पार्टी लोकतंत्र बेच रही है. कोई अपने विधायक बेच रही है. कोई देश बेच रहा है. कोई जमीर बेच रहा है. मंत्री जी को कुछ नहीं मिला तो 'पापड़' बेच रहे हैं. यहां अब सबकुछ बिकाऊ है. सिर्फ इंसान का खून ही है जो माटी के मोल भी नहीं बिकता, बाकी हर चीज का बहुत अच्छा दाम मिलता है.

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