Uttar pradesh

अब समझ आया कि प्रधान सेवक चीन का नाम क्यों नहीं ले पा रहे हैं?

अब समझ आया कि प्रधान सेवक चीन का नाम क्यों नहीं ले पा रहे हैं?


नदीम एस. अख्तर 
अगर धूर्त माउंटबेटन की चाल में पंडत नेहरू और जिन्ना नहीं फंसते, अखंड भारत को बांटने की रियासत और राजा/नवाब की मर्जी वाली चालों में ना उलझते, चीन ने चिरकुटई कर भारत के साथ सीमा विवाद का जंग ना किया होता और भारत, पाकिस्तान व चीन तीनों देश दोस्ताना माहौल में शांति के साथ रह रहे होते तो
रूस का साथ लेकर हम अमरीका और यूरोप की दादागीरी को कब का उखाड़ फेंक चुके होते। शक्ति संतुलन का आलम ये होता कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत और पाकिस्तान, दोनों के पास स्थायी सीट होती। लेकिन देखिए, ये हो नहीं पाया।
पहले भारत और पाकिस्तान को लड़ाया। फिर चीन से भारत को लड़ाया। अमरीकी षड्यंत्र ने बहुत चालाकी से पाकिस्तान को गोद में बिठा लिया। चीन भी पाकिस्तान संग हो लिया। भारत, रूस के साथ था, अब अकेला रह गया। ना अमरीका उसका दोस्त है और ना रूस। मौजूदा भारतीय हुक्मरानों की मूर्खता से अब रूस, चीन के ज्यादा करीब है। और देखिये, थूक के चाटना इसी को कहते हैं कि अहमदाबाद में ट्रम्प की रैली होती है पर जब चीन लद्दाख में चढ़ जाता है तो भारत के हुक्मरान रूस से मदद मांगने पहुंचते हैं। अगर चीन पे कोरोना फैलाने का आरोप ना लगा होता तो आज अमरीका, अपने पुराने दोस्त पाकिस्तान के बगल में खड़े होकर चीन से यारी ही जता रहा होता और कड़े शब्दों में भारत को हड़का रहा होता। और आने वाले समय में अगर ट्रम्प चुनाव हारे तो अमरीका और चीन के रिश्ते फिर पुरानी ज़मीन पे आ जाएंगे। अमरीका को रूस के मद्देनजर चीन का साथ चाहिए और चीन को अपना माल दुनियाभर में बेचने के लिए अमरीका का साथ।
फिर इन सारे समीकरणों में भारत कहां ठहरता है? कहीं नहीं। बिल्कुल तन्हा खड़ा है हमारा देश, चारों तरफ से दुश्मन मुल्कों से घिरा हुआ। भले ही दलाल भारतीय मीडिया आपको 24 घण्टे ये बताए कि चीन हमसे डर गया, कांप गया और सू-सू कर गया। ये वही दलाल टीभी एंकर्स हैं, जो कल तक टीभी पर ये ज्ञान दे रहे थे कि चीन में परिवारों के पास एक ही बेटा है। इसलिए वहां के सैनिक युद्ध का खतरा मोल नहीं लेंगे। फिर खबर आई कि चीन ने हमारे सैनिक मार दिए। उसके बाद भी खबर दबाई जाती रही। अब जब चीन रोज़ सीमा पर ललकार रहा है तो यही दलाल टीभी एंकर कह रहे हैं कि चीन हमारे हथियारों से कांप रहा है। ये वही लोग हैं, जो कोरोना पे ज्ञान देते-देते खुद अपने न्यूज़रूम को कोरोना का हॉटस्पॉट बना देते हैं। फिर भी भगत जनता इनकी बात को सच मानती है। खैर!
ईमानदारी से विश्लेषण करेंगे तो कागज़ पे चीन युद्ध की तकनीक और साजोसामान में हिंदुस्तान से मीलों आगे है। एटमी हथियार से लेकर जल और नभ ताकत तक। लेकिन जंग हिम्मत से जीती जाती है। और हममें वो भी नहीं दिख रही। अभी तक हमारा शीर्ष नेतृत्व चीन का नाम लेकर उसे चेतावनी भी नहीं दे पाया है, सीमित युद्ध में वह निर्णय क्या लेगा और सेना को आगे क्या बढ़ाएगा? उधर चीन का नेतृत्व आक्रामक, खूंखार और बर्बर है। एक बार वह आगे बढ़ गया, तो पीछे नहीं हटेगा। इधर खबर तो ये भी आई है कि रूस के एक पुराने शहर को भी चीन अपना सदियों पुराना इलाका बता रहा है पर फिलहाल वह रूस से भिड़ने के मूड में नहीं है। कह रहा है, संधि हो गई थी, तो फिलहाल आप ही रखो। पर उसने अपनी नीयत बता दी है।
तो समझिए जो चीन, रूस को उसकी औकात बता रहा है, वह भारत को क्या समझेगा? अब समझ आया कि प्रधानसेवक चीन का नाम क्यों नहीं ले पा रहे हैं? असलियत उनको भी पता है। चीन से सीधी भिड़ंत का मतलब क्या है! बहरहाल, भारत, पाकिस्तान और चीन की एकता में एक बड़ी बाधा है, जो निकट भविष्य में तो दूर होती नहीं दिखती। और ये बाधा ऊपरी नहीं है, जड़ों में है। चीन का आक्रामक वामपंथ, भारत का आक्रामक दक्षिणपंथ और पाकिस्तान का आक्रामक चरमपंथ जब तक अस्तित्व में रहेगा, इन तीनों देशों में एका नहीं हो पाएगा। और देखिए, तीनों ही देशों के बीच दुश्मनी सिर्फ और सिर्फ ज़मीन को लेकर हुई है। ये किसकी साजिश है? ये दुश्मनी क्यों बनी या बनने दी गई?
ये एक अलग खेल है। ठीक वैसे ही, जैसे भारत के कुछ हिस्से जब नेपाली पीएम ओली ने अपने देश के नक्शे में शामिल करा लिए तो उनके खिलाफ वहां विद्रोह हो गया। ओली इस विद्रोह को भारत की साजिश बता रहा है। पर रुकिए। चीन तो सबका बाप है। क्या वह इतनी आसानी से अपने मोहरे, नेपाली पीएम ओली की सत्ता जाने देगा? तो अगर नेपाली पीएम मोहरा बन सकता है तो दुनिया के कई देशों के हुक्मरान और राजनीतिक पार्टियां भी मोहरा बन सकती हैं। ये राजा/महाराजा काल से होता आया है। जिन्होंने अपनी रियासत से गद्दारी की और अंग्रेजों का साथ दिया, उस इलाके को जीतने के बाद कुछ समय के लिए अंग्रेजों ने उस गद्दार को वहां का शासक बना दिया। फिर उसे रास्ते से हटाकर पूरी तरह अपना राज कायम कर लिया।
दलाल भारतीय मीडिया और बनियों के स्वामित्व/अनुदानों पर निर्भर विश्व मीडिया जो आपको बताता है, वह सच नहीं होता। अभी पुतिन ने संविधान संशोधन करके अपनी सत्ता कई और सालों के लिए सुरक्षित कर ली। दुनिया में कहीं इसका विरोध नहीं हुआ। तो क्या भारत और पाकिस्तान में भी ऐसा हो सकता है। सत्ता अनंतकाल तक अपने पास रखी जा सकती है? आप समझदार हैं, समझ गए होंगे। चीन में भी ऐसा हो सकता है। जिनपिंग, पुतिन से कम हैं क्या? काफी अरसा हो गया, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एक नया World Order नहीं बना है। चीन बहुत जल्दी में है, पुतिन स्थायी हो चुके हैं, अमरीका डाँवाडोल है, चुनाव के नाम पे आपस में ही लड़ रहा है, यूरोप कन्फ्यूज्ड है, इस्लामी मुल्कों में फिर से खिलाफत बनाने की सुगबुगाहट है, यहूदी इज़रायल की फलस्तीनियों पर ज्यादतियां चरम पर हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्वसनीयता संकट में है और कोरोना का सैलाब है। नार्थ कोरिया का तानाशाह चौड़े होकर ट्रम्प से उलझता है, पर पुतिन को कुछ नहीं कहता। सो गोटियां सेट होने दीजिए।
दुनिया बदलने को है। अबकी बार वो हाल नहीं होगा, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की स्थिति में हुआ था। अब दुनिया अलग तरह से गढ़ी जाएगी। लेकिन अफसोसनाक ये है कि new world order में भारत कहीं नहीं दिखता। वह बिल्कुल अकेला खड़ा है। पाकिस्तान को तिहरा साथ मिलेगा। एक चीन का, दूसरा इस्लामी देशों का और तीसरा उसके पुराने खैरख्वाह अमरीका का। भारत के साथ कौन है? रूस? वह तो चीन के साथ रहेगा। अमरीका और यूरोप पर काबू पाने के लिए अकेला चीन काफी है। भारत का दक्षिणपंथ और शासकों की मूर्खतापूर्ण विदेश नीति इसे ले डूबा। या तो रूस को चुन लो, या अमरीका को। दो नाव की सवारी की है, तो डूबना तय है। अतिउत्साही और अदूरदर्शी शीर्ष नेतृत्व ने देश को अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है।

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