सोने की तस्करी का मुख्य अभियुक्त देश छोड़कर हुआ फरार, देश का चौकीदार सोता ही रह गया?


संजय कुमार सिंह 
अगर आप मामले को फॉलो नहीं कर रहे हैं तो बता दूं कि तिरुअनंतपुरम में तैनात संयुक्त अरब के एक राजनयिक के नाम आए एक सामान को शक होने पर रोका गया तो उसमें अवैध सोना निकला। मामले की जांच चल रही थी।
द टेलीग्राफ में आज छपी खबर के अनुसार, केरल सरकार ने इस मामले में आईएसएस अधिकारी एम शिवशंकर को निलंबित कर दिया है। शिवशंकर मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव थे पर इस मामले में नाम आने के बाद उन्हें सचिव पद से हटा दिया गया था। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रवक्ता के ट्विटर हैंडल से किए गए एक ट्वीट के अनुसार, एमएचए एनआईए को इस तस्करी के मामले की जांच की इजाजत देता है (आदेश होना चाहिए पर अंग्रेजी में इजाजत या परमिट ही लिखा था)।
इसके मुताबिक, एक संगठित तस्करी अभियान का राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव हो सकता है। अभी मुझे यह समझ नहीं आया है कि एनआईए से जांच की अनुमति मांगी गई थी ये केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर आदेश दिया है जिसे इजाजत लिखा गया है। बेशक अपराध के किसी भी मामले की जांच कायदे से होनी चाहिए पर ऐसा होता नहीं है। सरकारें बदलती रहें. दिलचस्प यह है कि 1993 में सामने आए 64 करोड़ रुपए के जैन हवाला कांड में   देश के 115 वरिष्ठ राजनेताओं और नौकरशाहों का नाम था और इन्हें दुबई तथा लंदन के हवाला स्रोतों से पैसे दिए जाने का आरोप था। 
अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी थी कि एनआईए के सूत्रों ने कहा है कि गृहमंत्रालय के आदेश के परीक्षण के बाद ही मामला दर्ज किया जाएगा। एनआईए सिर्फ खास किस्म के मामलों की जांच करता है और ये वो मामले होते हैं जो विशेष कानून के तहत आते हैं न कि आईपीसी के तहत। सीमा शुल्क उल्लंघन या तस्करी इसका भाग नहीं है।
दरअसल एनआईए ने सोने की तस्करी के किसी मामले की जांच अभी तक नहीं की है। इससे पहले केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिखा था कि इस मामले की प्रभावी और समन्वित जांच कराई जाए। कहने की जरूरत नहीं है कि इसके बाद मामले  की एनआईए कर रहा था पर आज द टेलीग्राफ में खबर छपी है यह सामानसंयुक्त अरब अमीरात के जिस राजनयिक के लिए था, वह चुप-चाप भारत से निकल गया। इसका पता तब चला जब पत्रकार उसके घर गए। अब आप सोचिए कि एनआईए क्या जांच कर रहा था? 
अब याद कीजिए कि 1984 के भोपाल गैस कांड के दोषी के विदेश भाग जाने पर भाजपा सरकार बनने के बाद कैसी-कैसी टिप्पणियां की गईं। ठीक है कि वह बड़े अपराध का जिम्मेदार था और उसे भागने में सहयोग करने के सबूत नजर आ रहे होंगे पर भागने के वर्षों बाद हल्ला और हाल में इस भागे अपराधी के संबंध में मीडिया का रुख देखिएगा।
1984 में वारेन एंडरसनके भागने के बाद नियम भी दुरुसत किए गए होंगे और सतरकता भी बढ़ाई गई होगी। अपराधी को रोकने का तरीका अपराध से गंभीर या अगंभीर नहीं होगा। इसलिए संयुक्त अरब अमीरात के इस राजनयिक का भाग निकलना निश्चित रूप से एनआईए और उसके आकाओं की चूक है। ध्यान रखिए अब कौन उसके भागने के लिए एनआईए को या सरकार को दोषी ठहराने की हिम्मत करता है।

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