'हर कोई' से सावधान रहिए. ये 'हर कोई' बहुत ख़तरनाक होते हैं?


दिलीप खान 
राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्यों को लेकर तरह-तरह की बयानबाज़ी हो रही है. आदतन दिग्वजिय सिंह भी दो दिन पहले इसमें कूद गए. अब्दुल्ला की शादी में वे शंकराचार्य को ट्रस्ट में शामिल करने की बेगानी मांग करने लगे.
कांग्रेस आलू की तरह हर सब्ज़ी में घुसना चाहती है. इतनी पड़ी थी तो राजीव गांधी को ही अपने दौर में ट्रस्ट बना लेना चाहिए था. फाटक खुलवाकर विहिप, संघ पर उर्वरक छिड़क ही दिए थे, मंदिर भी बनवा लेते. कुर्ता फाड़ के हिंदू-हिंदू भी चिल्लाएंगे और मुस्लिमों को वोट के तौर पर ध्यान कर धर्मनिरपेक्षता का भी जाप कर लेंगे.
दिग्विजय सिंह ने किसके हवाले से कह दिया कि हर कोई अयोध्या में भव्य राम मंदिर देखना चाहता है? ये ‘हर कोई’ कौन है? असल में इस देश में बहुत ‘हर कोई’ है.
एक ‘हर कोई’ हैं हर पाले में भागीदारी मापने वाले तराज़ूबाज़. उस ज़हरीले खेमे में भी, जिसकी संरचना जितनी बहुरंगी होगी, समाज में उसकी स्वीकार्यता उतनी मज़बूत होगी. राम मंदिर ट्रस्ट में दलित-ओबीसी की तादाद गिनने वाले कई लोग यहीं फ़ेसबुक पर मिले.
बीजेपी-संघ को जब ज़रूरत पड़ेगी, वे लोग ख़ुद दो-चार शामिल कर लेंगे. आप क्यों चिंता कर रहे हैं? कारसेवा के दौर में ‘राम मंदिर’ में पहली ईंट लगाने वाले कामेश्वर चौपाल का नाम याद है न? बिहारी हैं. दलित हैं. मेरे पड़ोसी ज़िले के हैं. 1991 से ही चुनाव लड़ रहे हैं. आज तक नहीं जीते. बीच में दशक भर विधान परिषद में रहे.
2009 के चुनाव में ‘रोटी के साथ राम’ का नारा दिया था. हारे. 2014 भी हारे. हर बार हारे. लेकिन बीजेपी ने उन्हें स्टार कैंपेनर बनाए रखा. बीजेपी के लिए इससे बढ़िया क्या होगा कि एक दलित उग्र हिंदुत्व की उस विचारधारा की पैरोकारी करे, जिसकी मलाई सवर्ण खाते हैं.
नरेन्द्र मोदी जब 2014 में PM बने, तो कई लोगों को उनके भीतर OBC दिखा था. कुछ प्रशंसात्मक लेख भी लिखे गए थे कि देश बदल रहा है. 6 साल में सच में बहुत बदल गया. राम मंदिर ट्रस्ट आपका घर नहीं है. जिसका घर है, वो संभाले. मुझे उसकी कोई चिंता नहीं है. आप लोग उसमें भागीदारी तलाशिए.

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