रोते हुए बच्चों को देख क्या डंडे रुक नहीं सकते?


श्रुति अग्रवाल 
बच्चों के रोने की तेज आवजों को सुन-सुनकर कान में नहीं कलेजे में दर्द हो रहा है। इन आवाजों के  बीच कहीं दूर से आ रही गूंज भी सुनाई दे रही है...गूंज दूर किसी गुफा से आ रही है या खंडहर से....आवाज शायद गले में रुंध गई है....आपको सुनाई दी क्या....वो एक दुबले-पतले, खादी टोपी पहने इंसान की आवाज....
"जय जवान जय किसान"
शर्म...हिकारत...खुद से नफरत नहीं हो रही तो एक बार अपना मन टटोल लीजिए। राष्ट्रवाद की चाशनी में डूबे यह हमारे देश की नई तस्वीरें हैं...नई या कुछ पुरानी...अकसर आती रहती हैं इसलिए ध्यान नहीं जााता....तो ध्यान दीजिए। आंखों को साफ करके ध्यान दीजिए। चश्मों को पोंछ कर सबक लीजिए। किसी वाद का चश्मा पहन रखा है तो उसे तोड़ दीजिए। वक्त निंरकुशता के विरोध का है।
BLACK LIVES MATTER की जगह चिल्लाकर कहिए POORS LIVES MATTER ...EVERYONE LIFE MATTER ....और इन सबसे कहीं ज्यादा हर एक बच्चे की मुस्कान ...मुस्कुराता चेहरा जरुरी है, सबसे ज्यादा जरुरी।
अभी लॉकडाउन के समय सुखद तस्वीरें....टीवी में लगातार दिखाईं जा रहीं थीं। खाकी ने खाना खिलाया, खाकी ने जन्मदिन मनाया। सच कहती हूं, गर्व से सीना फूल रहा था। अंग्रेजों की दी खाकी पर भारतीयता का गहरा रंग चढ़ गया है यह महसूस हो रहा था। फिर एक खबर आई तमिलनाडु के तूतीकोरम में पिता-पुत्र की पुलिस कस्टडी में मौत। मन कड़वा हो गया....कल से वायरल गुना की तस्वीरें देखने के बाद यह कसैलापन मन में घर कर चुका है। खाकी के हाथ में डंडे थे....शामिल स्त्री-पुरुष दोनों थे।
बच्चे बिलख रहे थे...किसी ने उन्हें पुचकारा नहीं। क्यों???? बच्चे सबके सांझा होते हैं ना! कीटनाशक पी चुके पिता के निश्चेत हो रहे शरीर को थामे, बालक बिलख रहा था। उसके रोने पर किसी का ध्यान ना गया। यूं देखूं तो उम्र उसकी दसवीं की परीक्षा के लायक ही होगी। उसने दसवीं का इम्तिहान ना दिया होगा, उसे 90-99 प्रतिशत ना मिले होंगे लेकिन जिंदगी उसका सबसे बड़ा इम्तिहान ले रही है....वो पिता को सीने से लगाए बिलख रहा है, साथ में उससे छोटे बच्चे बिलख रही हैं। एक बार और ध्यान से देखिए, बालक की तस्वीर...शायद दसवीं क्लास के लायक उम्र भी नहीं है, पर जिंदगी के सबसे बड़े इम्तिहान का पर्चा दे चुका है।
बाकी इस परिवार का कसूर क्या है। एक रसूखदार गुंडा शासकीय जमीन पर कब्जा करता है। इस परिवार को दो लाख  रुपय लेकर खेती के लिए  देता है। पुलिस इन मजलूमों को मारती है...खेती को जेसीबी से तबाह कर देती है। बर्बरता के वीडियो-फोटो वायरल होने के बाद कलेक्टर औऱ एसपी को हटाया जाता है लेकिन क्या आप इन बच्चों के मन-मस्तिष्क पर छप चुकी कड़वी यादों को हटा पाएंगें। इसलिए अभी भी थोड़ा समय बचा है, जाग जाइए, क्विक-फिक्स न्याय की सराहना करने से पहले सोचिए। भारतीय संविधान-कानून-न्याय प्रणाली लंबी जरुर है लेकिन शार्ट कर्ट अकसर बड़ी परेशानी लाते हैं।
बच्चों की तस्वीरें देख अभी तो बार-बार यही सोच रही हूं...क्या फर्क है 1947 से पहले के भारत में...आज के भारत में....बर्बर तब भी थे...बर्बर अब भी हैं...

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