दिल्ली के दो भवनों के नाम हैं सावन-भादों, आइये जानते इनके बारे में...

अमिताभ स. 
सावन खत्म होने को है,अगला महीना भादों है।यही श्रावण और भाद्रपद भी कहलाते हैं।1970 के दशक की एक सुपरहिट फ़िल्म का नाम भी ‘सावन भादों’ है।इसे रेखा,नवीन निश्चल और रंजीत को रूपहले पर्दे पर उतारने का श्रेय जाता है।मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में ‘कान में झुमका,चाल में ठुमका..’इसी फ़िल्म का सुपर-डुपर हिट गाना तो आज भी गुनगुनाया जाता है।

कहां हैं सावन और भादों 

लेकिन कम ही दिल्लीवाले जानते होंगे कि दिल्ली में सावन और भादों नाम के दो भवन हैं।हैं कहां?लाल किले के अंदर मोती मस्जिद के बग़ल में हयात बख्श नाम का मुगल बाग है।इसी की दक्षिण और उत्तर दिशाओं में दो संगमरमर के मंडप हैं,जो शुरू से सावन और भादों के नाम से जाने जाते हैं।हेरिटेज वॉक ग्रुप ‘गो इन द सिटी’ के चीफ एक्सप्लोरर गौरव शर्मा बताते हैं कि हयात बख्श समेत सावन-भादों मंडपों का निर्माण 1638 से 1648 के बीच मुग़ल बादशाह शाहजहां ने करवाया था।दोनों का नामकरण हिन्दू पंचांग में वर्षा ऋतु के महीनों के नाम पर हुआ है।देखने में दोनों एक जैसे लगते हैं।आज सादे-से हैं,किसी ज़माने में ख़ूबसूरत अलंकृत हुआ करते थे।
जानी-मानी हेरिटेज जानकार स्वप्ना लिड्डल अपनी किताब ‘दिल्ली 14 हिस्टोरिक वॉक्स’ में लिखती हैं कि नॉर्थ साइड का मंडप सावन हैं और साउथ का भादों।दोनों के डिज़ाइन में पानी को अहमियत दी गई है।पानी की नहर सामने मंडप के थड़े तक आलेदार दीवार पर झालर की तरह कल-कल बहती थी।बादशाही जमाने में,इन आलों में दिन में फूलों से लदे फूलदान शोभित होते थे और रात में जगमग दिये।दोनों मंडप आपने-सामने हैं और बीच में ख़ासा बड़ा तालाब है।इसी के बीचोंबीच 1842 में मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र द्वितीय ने लाल पत्थरों का मंडप बनवाया था,जो ज़फ़र महल कहलाता है।
अपनी किताब ‘दिल्ली अननोन टेल्स ऑफ ए सिटी’ में लेखक और हेरिटेज दिल्ली के मशहूर पारखी आर.वी.स्मिथ लिखते हैं  कि शाहजहां मॉनसूनी महीनों में अमूमन सावन-भादों मंडपों तले बैठ कर अपनी बेगम मुमताज़ महल के बिछुड़ने के ग़म भरे दिल की सुकून देते थे।कहा जाता है कि सावन के महीने में बादशाह सावन नाम के मंडप में और भादों के दौरान भादों मंडप में बारिशों का लुत्फ़ उठाते थे।इसीलिए बादशाह शाहजहां ने इन्हें हयात बख्श यानी ज़िन्दगी बख़्शने वाला बाग में जगह दी है।
मंडपों के फ़र्श,दीवारें और छत संगमरमर की बनी है।खम्भों दीवारों पर आगरा किले के मच्छी महल जैसी बेजोड़ कारीगरी हुई है।हरेक की लंबाई 14.7 मीटर और चौड़ाई 10.75 मीटर है।हालांकि दोनों मंडप बाहर से एक जैसे लगते हैं,लेकिन भीतर में थोड़ा-बहुत फ़र्क है।भादों के बीचोंबीच एक जलकुंड है और सावन से पानी की नहर-सी निकलती है।मुगल बादशाहत के दौरान मंडपों के आलों में तेल के दीये जलाए जाते थे,फ़व्वारे का पानी और दियों की झिलमिल रोशनी मिल-जुलकर सुनहरा पर्दा बनकर उभरती थी।नज़ारा देखते ही बनता था।                                                   
एक और हेरिटेज वॉक ग्रुप ‘दिल्ली कारवां’ के किस्साबखानी आसिफ़ ख़ान देहलवी का मानना है कि हरे-भरे पेड़-बूटों से घिरे इन मंडपों में बादशाह रिमझिम बारिश का मज़ा लेते ही थे,बरसात नहीं भी आती होगी,तो भी कल्पना कीजिए कि जल कुंड और नहर के झर-झर बहते पानी की आवाज़ क्या झमाझम सुरूर पैदा करती होगी।आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र तो,ख़ासतौर से बरसात के दिनों में,यहीं महफ़िल जमा कर,दिल्ली घराने की हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत परम्परा के संस्थापक और दरबारी संगीतकार उस्ताद तानरस खान के राग सुन-सुन अपना दिल बहलाते थे।किताबों में,सावन-भादों मंडपों से जुड़े इससे ज़्यादा क़िस्से नहीं मिलते।                                       
शाही झूला भी था
सावन-भादों के झूले और पेड़ों के सहारे लटकती पींगें हिंदुस्तानी संस्कृति का हिस्सा रहे हैं।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की जानकारियों के मुताबिक़ शुरुआती दौर से सावन और भादों मंडपों के बीच संगमरमर का नक़्क़ाशीदार,मेहराबनुमा और  खूबसूरत झूला बना था।शाही झूला ज़ंजीरों से लटकता था।हालांकि इस पर सभी बेगमें शौक़ से झूलती थीं,लेकिन बेगम नूर जहां के झूलने का ख़ास ज़िक्र मिलता है।भरतपुर के राजा सूरज मल (1707-1763)के नेतृत्व में जाटों ने लाल क़िले धावा बोला।इसी दौरान,साल 1754 में झूला लूट कर ले गए।और उसे ले जा कर,राजा सूरज मल अपने भरतपुर स्थित डीग महल में लगवा दिया।

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