WHO मजाक बनकर रह गया है, कौनसा मास्क कारगर है वह अब तक यह नहीं जान पाए है?


शादाब सलीम
डब्ल्यूएचओ मज़ाक हो गया है। हालांकि यह तो केवल हास्य की बात है पर यह बात भी ठीक है कि नई बीमारियों के संबंधों में कोई एक साथ तो सारी सूचनाएं नहीं आना है। धीरे धीरे ही सूचनाएं आती है। डब्ल्यूएचओ ने केवल कोरोना के लिए गाइल्ड लाइंस नहीं दी है और उस पर अपना अनुसंधान नहीं पेश किया है अपितु उसने हर एक बीमारी के लिए ऐसा ही अनुसंधान पेश किया है।
कौनसा मास्क कारगर है वह अब तक यह नहीं जान पाए है, हालांकि वह एक दिन इस ही बात पर पहुंचेंगे की कोविड को किसी भी मास्क से रोका नहीं जा सकता सिवाय मोटा प्लास्टिक आंख, नाक और मुँह पर पहनने के। कोविड इतना छोटा है कि वह किसी भी मास्क को भेद जाता है।
आप डब्ल्यू एच ओ की बतायी किसी भी बीमारी से बचने की गाइल्ड लाइंस को फॉलो कर ही नहीं सकते। आप उनकी टाइफाइड, पीलिया और टीबी और खसरा से संबंधित गाइल्ड लाइंस देखिए, क्या भारत की झुग्गियों में रहने वाले उनकी किसी गाइल्ड लाइंस को फॉलो करते है? वह कतई नहीं करते। कितने लोग बगैर हाथ धोए सीधे खाना खाते है, अनेक भारतीय तो शौच के बाद तक हाथ नहीं धोते। क्या डब्ल्यू एच ओ इन हरकतों को क्षम्य मानेगा? वह तौबा तौबा कर लेगा। बाप रे कैसे लोग है बगैर हाथ धोए खाना खा रहे है। डब्ल्यू एच ओ ऐसा ही नाज़ुक बर्तन वाली थ्योरी हर एक बीमारी में पेश करता है और करना भी चाहिए यह उसका काम है।
कोरोना पर बड़ा बवाल मचा है इसलिए डब्ल्यू एच ओ की नाज़ुक बर्तन वाली थ्योरी हैरान परेशान कर रही है। कोरोना एक बीमारी से अधिक कुछ नहीं है, हम जैसे लोग जब इससे भयभीत नहीं होने की सलाह देते है तो समझा जाता है कि अवेरनेस के खिलाफ कह रहे है पर ऐसा नहीं है हमने कोरोना से इंकार कभी नहीं किया अपितु इसके भय के खिलाफ माहौल बनाया है।
बीमारी है यदि होना होगी तो होकर रहेगी, किसी का बाप नहीं रोक सकता। वह कल मुझे भी हो सकती है और पढ़ने वालों को भी। रेबीज का टीका लगाने के बाद भी रेज़ीब हो जाता है। टीबी का टीका बन जाने के बाद भी टीबी ज्यों की त्यों है। एड्स पर सब कुछ जान लिया गया है पर फिर भी कोई एड्स मुक्त नहीं है। कोरोना ने अब तक दो ढाई प्रतिशत लोगों को मारा है फिर भी उसका भय सर पर नाचता है। कोरोना की यह राहत वाली बात है कि यदि वह आदमी को सरलता से लग जाता है तो मारता भी बहुत कम है, यदि वह कैंसर की तरह मारता तो वाकई धरती के इंसानो को दो चार साल में निगल जाता। कैंसर इतनी तगड़ी मौत मारता है पर वह होता भी बहुत मुश्किल से है यदि वह कोरोना जैसा फैलने लगे और सलरता से होने लगे तो मानव विहीन धरती कर देगा।
असल में यह बात कह देना चाहिए कि हम ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु जीसस के भरोसे ही जीते है। नास्तिक भी किसी न किसी प्रकृति के आसरे में ही जीता है। आदमी के शरीर से लगने वाली बीमारी तय नहीं है, किसी भी समय कोई भी चपेट में आ सकता है, यहां कुछ भी तय नहीं होता है असल में सारा यूनिवर्स ही ऐसा है सब कुछ भयानक अनिश्चितता वाला है। फिर भी हम सकारात्मकता के साथ मृत्यु को भूलकर जीते है, बच्चे पैदा करते है, ताज महल बनाते है, स्कूल कॉलेज खोलते हैं और मौज से जीवन जीते है जबकि कितनी भयंकर अनिश्चितता है यदि यूनिवर्स की अनिश्चितता को देख लिया जाए और समझ लिया जाए तो रोंगटे खड़े हो चलेंगे।
भारत के छोटे शहरों के अस्पतालों में कोई इलाज नहीं दिया गया है सिवाय गर्म पानी और काढ़े के फिर भी लोग ठीक हो ही गए है और हो ही रहे है।
डब्ल्यू एच ओ कोरोना से बचाव के लिए जैसी गाइल्ड लाइंस को फॉलो करने की आशा गरीब लोगों से रखता है वह बेमानी है। गरीब लोगों के पास पानी और सर्फ़ बमुश्किल होता है ऐसे में साफ मास्क और सेनेटाइजर जैसी चीज़ों की उनसे आशा करना मूर्खता तो है ही साथ में महापाप भी है, वे मुँह पर रुमाल बांध लें यही सबसे बड़ा कदम होगा अन्यथा गर्मी और साधनों के अभावों के बीच मेहनत करते लोगों के लिए रुमाल बांध लेना भी ज़हर है। फिर अभावों में जीते आदमी को जीवन से कोई विशेष प्रेम भी नहीं होता है।
भारत में जहां जहां लॉक डाउन लगाए जा रहे है उन्हें फ़ौरन बंद कर देना चाहिए। छोटे शहरों और कस्बो में लॉक डाउन मढ़ना उन पर जुल्म है। यदि हमे यह लगता है कि कस्बे में लॉक डाउन लगा देने से बीमारी चली जाएगी तो बेफिक्र रहिये लॉक डाउन खुलते से कस्बे के लोग शहरों में जाएंगे और फिर बीमारी आएगी। सावधानी के साथ देश को आबाद रहने दिया जाए।

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