हर राजनीतिक दल के लिए मुसलमान सत्ता की मछली पकड़ने का चारा है?


अमिता नीरव
'हर राजनीतिक दल के लिए देश का मुसलमान सत्ता की मछली पकड़ने का चारा है। कोई मुसलमानों का सही-गलत समर्थन करके सत्ता हासिल करना चाहता है तो कोई उनका विरोध करके। मजे की बात यह भी है कि मुसलमान दशकों से चारा बना हुआ है और चारा ही बना रहना चाहता है।
बेंगलुरू की दुर्घटना ने फिर से एक बार साबित किया कि मुसलमान अपनी जहालत से निजात पाना ही नहीं चाहता है। उसे इस्तेमाल किया जाना था, वह इस्तेमाल हो गया। वह यह देखना ही नहीं चाहता कि फिर से मुसलमान को कट्टर होने का तमगा मिल गया है। अब चाहे आप इससे कितना ही इंकार करते रहें।
इस जहालत के बीच वे लड़के उम्मीद की चमकीली किरण के तौर पर सामने आए जिन्होंने वहाँ के हनुमान मंदिर की सुरक्षा की। ये वो लड़के हैं, जिनकी आपको भविष्य में जरूरत पड़ेगी। याद रखिएगा, यही वे लड़के हैं, जिन्होंने आपको आज भी बड़ी मुश्किल से बचाया है।
कुछ महीने पहले जब मैं हिंदुओं की जहालत से बहुत निराश थी, तब एक दोस्त ने कहा था कि निराश मत होइए, एक वक्त में इन लोगों को हम जैसे लोग ही बचाएँगे। यही बात उन समझदार मुस्लिम लड़कों पर भी लागू होता है, जिन्होंने उस उकसाने वाले माहौल में भी अपनी समझ का इस्तेमाल किया औऱ संयम रखकर स्थिति को और बिगड़ने से बचा लिया।
आज हिंदुओं को यह लग रहा है कि यह वक्त उनका है, लेकिन हकीकत तो यह है कि हिंदुओं ने मात्र 6-8 साल में अपने पुरखों का सदियों से कमाया ‘धन’ गँवा दिया है। हिंदुओं को जो विरासत उनके पुरखे सदियों से देते आए हैं, वो उन्होंने एक झटके में खर्च कर दी। किसी भी व्यक्ति, परिवार, समुदाय, समाज और राज्य के लिए जो वक्त मुश्किल का होता है, वही वक्त बदलाव का भी होता है।
मैं पहले भी कहती रही हूँ कि ये वक्त मुसलमानों के लिए एक स्वर्णिम अवसर है। सदियों की जहालत से मुक्ति पाने का। हो सकता है आज यह लग रहा है कि यह मुश्किल वक्त है, लेकिन यह आपको एक अवसर दे रहा है। आगे बढ़ने का।
अपनी लिस्ट के मुस्लिम भाइयों को देखती हूँ तो उम्मीद से भर जाती हूँ। ठीक वैसे ही अपने इर्दगिर्द के हिंदुओं को देखती हूँ तो गहरी निराशा होती है। हिंदुओं ने अपनी सारी पूँजी गँवा दी है। मुसलमानों के पास पाने के लिए अब भी बहुत कुछ है।

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