वसीम अकरम त्यागी कहते हैं- समाज को आगे आकर इन जोकरों का बहिष्कार करना होगा, वरना यह समाज मनोरोगी बना देंगे


वसीम अकरम त्यागी 
प्रशासनिक सेवाओं में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व साढ़े तीन प्रतिशत ही है। कभी कभी यह आंकड़ा चार या साढ़े चार प्रतिशत तक पहुंचता है। लेकिन इसके बावजूद एक तथाकथित ‘भगवाधारी’ एंकर को इतनी मौजूदगी भी तकलीफ दे रही है। वह भारत के उस विश्विद्यालय की शिक्षा पर सवाल उठा रहा जिसने हाल ही में देश की टॉप यूनीवर्सिटी में पहला स्थान हासिल किया है।
वह यूपीएससी में चयनित मुसलमानों को #नौकरशाही_जिहाद बता रहा है, विश्विद्यालय के ख़िलाफ ज़हर उगल रहा है। कुछ बुद्धिजीवी इसे यह कहकर नज़र अंदाज़ कर देंगे कि फलां चैनल को कौन देखता है. कौन देखता है कौन नहीं देखता यह सवाल नहीं है. सवाल यह है कि एक बड़ा वर्ग उसे देख रहा है, उस पर यक़ीन भी कर रहा है, और उसे ह्वाट्स यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में अग्रेषित भी कर रहा है।
टीवी स्टूडियो के जोकरों ने इस देश का जो नुक़सान किया है उसकी भरपाई अगले बीस साल तक होना भी मुश्किल है। एक समुदाय को केन्द्र में रखकर जितना ज़हर समाज में फैलाया गया है, उसका दुष्प्रभाव समाप्त करने में एक अरसा बीत जाएगा। लेकिन यह सब हो रहा है, लोग देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, जामिया किसी समुदाय विशेष की मिल्कियत नहीं है बल्कि भारत सरकार की मिल्कियत है। लेकिन इसके बावजूद जामिया और उसके जैसे दूसरे संस्थानों के ख़िलाफ माहौल तैयार किया जा रहा है।
इस देश में नफरत की ऐसी हवा चली है कि सांस लेना तक दुश्वार हो रहा है। जिन मुद्दों पर बात होनी चाहिए थी उनका ज़िक्र तक नहीं होता, बात होती है ऐसे मुद्दों पर जो मुद्दा ही नहीं हैं। आज जामिया के उन पूर्व छात्रों को ‘जिहादी’ बताया गया जिनका चयन यूपीएससी में हुआ है। टीवी के जिस जोकर ने यह शिगूफा छोड़ा है, वह राष्ट्रवादी होने का दंभ भरता है।
लेकिन इनका राष्ट्रवाद पाकिस्तान से शुरु होकर भारत के मुसलमानों को गालियां देने तक ही बचा है। एक घटना का ज़िक्र करना यहां पर करना जरूरी हो गया है। जामिया के छात्र रहे IES सुब्हान अली लद्दाख में तैनात थे. 22 जुलई को भारत-चीन सीमा पर निर्माणाधीन सड़क का निरीक्षण कर मीना मार्ग से वापस कैंप लौटते वक़्त उनकी गाड़ी खाई मे जा गिरी, उनके ड्राईवर का शव तो मिल चुका है, लेकिन सुब्हान अली की कोई ख़बर नहीं है।
इस घटना पर भारतीय मीडिया के तथाकथित ‘राष्ट्रवादी’ जोकरों को राष्ट्रवादी की अलख जगाते हुए IES सुब्हान अली की खोज में रात दिन प्रोग्राम चलाने चाहिए थे, लेकिन अफसोस किसी भी राष्ट्रवादी चैनल ने सुब्हान के लिये एक पैकेज़ तक चलाना जरूरी नहीं समझा। किसी पत्रकार, एंकर, जोकर की यह हिम्मत तक नहीं हुई कि रक्षा मंत्रालय से सवाल किया जाए, सत्ताधारी दल के प्रवक्ता से सवाल किया जाए, एनडीआरएफ से सवाल किया जाए, कि देश के एक जांबाज़ होनहार अफसर को आज तक भी क्यों नहीं तलाशा गया.
सियासत और सहाफत का गठजोड़ एक समुदाय के लिये ज़मीन तंग कर देने पर तुला है। इस देश की तरक़्की के तमाम दरवाज़ों को बंद करने पर तुला है। हालात ऐसे बनाए जा रहे हैं, कि इसे हर चीज़ में जिहाद नज़र आने लगा है। मैं फिर वही कहुंगा कि सियासत और सहाफत के गठजोड़ ने जो सांप्रदायिक कोढ़ग्रस्त समाज तैयार कया है उसका उसी समाज के पास है जिसके बच्चों को सांप्रदायिक कोढ़ी बनाया जा रहा है। लिहाज़ा उस समाज को आगे आकर इन जोकरों का बहिष्कार करना होगा, वरना धीरे धीरे यह समाज मनोरोगी बना दिया जाएगा।

Comments

Popular posts from this blog

Bollywood Celebrities Phone Numbers | Actors, Actresses, Directors Personal Mobile Numbers & Whatsapp Numbers

जौनपुर: मुंगराबादशाहपुर के BJP चेयरमैन ने युवती के साथ कई महीने तक किया बलात्कार, देखें वायरल वीडियो

किन्नर बोले- अगर BJP से सरकार नहीं चल रही है तो हमें दे दे कुर्सी, हम सरकार चलाकर दिखा देंगे