हमने देश का सच्चा बेटा देखा है, हां हमने "राहत" को देखा है?


अब ना मैं हूँ ना बाक़ी हैं ज़माने मेरे,
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे
पिछली फरवरी फोन पर एक आवाज सुनी दिल में बेचैनी अलग थी और खुशी अलग, दोनो के बीच संतुलन करना मेरे लिए असम्भव था। एक नरम लहजे में एक सधी हुई आवाज कानो में गूंज गई। मानो यकीन नही कर पा रहा एक सपना साकार हो चुका था, कोई दो या ढाई मिनट चली एक सदी को थाम देने वाली लंबी बातचीत के बाद महसूस ही नही हुआ ये वो ही शख्शियत थी जो मुशायरों में स्टेज पर शेरो की तरह दहाड़ते हैं।
राहत साहब एक ऐसी शख्शियत एक कड़कती आवाज और शेर कहने का अंदाज़ मानो जलजलों को चुनौती देती हुई आवाज जो बिजलियों को बहरा कर दे।
"बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हम ने ख़ैरात भी माँगी है तो ख़ुद्दारी से"
एक जिंदादिल शख्शियत जो सर उठाने का हौसला सिखाती है,एक शख्सियत जिन्होंने जीवन में उतार चढ़ाव देखे मगर उनका हौसला और साहस हमेशा मुश्किलों के सामने सीना ताने खड़ा रहा।
"मेरे हुजरे में नहीं और कहीं पर रख दो
आसमां लाए हो ले आओ ज़मीं पर रख दो"
एक शख्शियत जिनके कदमो तले शौहरत और कामयाबी
दोनो रही मगर उसूलों पर डिगे रहना कोई राहत साहब से सीखे।
"शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे"
एक शख्शियत जो जुल्म से घबराती नही थी,जिसने जुल्म के सामने कभी हार नही मानी,एक ही शख्शियत जो जुल्म की आंखों में आंखे डालकर कह सकती थी "मेरी प्यास से जो उलझे तेरी धज्जियां उड़ जाएं"
"सभी का खून है यहां की मिट्टी में शामिल
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है"
एक बेबाक शख्सियत जो नाराज रहती थी सियासी दुनिया से एक शख्शियत जो हक मांगना नही छीनने का हौसला देती है।जिसका लहजा हक बात कहते हुए कभी झुका नही ऐसे थे हमारे राहत साहब।
 "हों लाख ज़ुल्म मगर बद-दुआ' नहीं देंगे
ज़मीन माँ है ज़मीं को दग़ा नहीं देंगे"
एक ऐसी शख्शियत जिसकी वतन से बेइंतहाई मोहब्बत की बानगी पूरी दुनिया में मशहूर रही "मैं जब मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना
लहू से मेरी पेशानी पर हिंदुस्तान लिख देना।
"किसने दस्तक दी, कौन है
आप तो अंदर है बाहर कौन है"
एक शख्शियत जिन्होंने गजलों की आंखों में काजल भरा। जिन्होंने न सिर्फ ग़ज़ल सुनाई बल्कि पढ़ाई भी थी, उन्होंने मोहब्बत को नए अंदाज में बयां किया उसका दूर दूर तक कोई सानी नहीं।
वो स्टेज पर होते तो बड़े आत्मविश्वास से कह देते मुशायरे पर पकड़ रखना "मैं राहत इंदौरी हूँ न जाने कब बड़ा शेर सुना दूँ। इतना गजब का आत्मविश्वास किसी बड़े शायर के पास ही हो सकता है। मीर ग़ालिब फ़ैज़ यक़ीनन बहुत बड़े नाम है मगर हमे गर्व है हमने राहत का दौर देखा है।आने वाली नस्लो को सुना सकेंगे हमने राहत साहब के दौर की पैदाइश रहे।यह जीवन की अपने आप में किसी बडी उपलब्धि से कम नही। 2020 वाकई कहर बनकर टूटा है हमपे आज इस बात का अंदाजा हो गया।जिनकी शायरी जिनकी गजले सुनकर राहत मिलती थी,आज यकीन नही हो रहा वो राहत साहब हमारे साथ नही रहे।
जाने कितने किस्से कितने कहानी पीछे छोड़ यह अपने आप में एक युग का अंत है,बेशक जिंदगी से कोई नही बचेगा यहां ये सबका हिसाब करती है। मगर हम इस जिंदगी को भी गर्व से कहेंगे।
हमने देश का सच्चा बेटा देखा है
हां हमने "राहत" को देखा है।
Parikshit Tyagi की फेसबुक वाल से 

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