2023 आने दीजिए, आज का जो दौर मुश्किल लग रहा है, वो तब नॉर्मल लगेगा, ठीक वैसे ही जैसे आडवाणी आजकल बेचारे लगते हैं?


दिलीप खान 
1. कुछ 'जनता का मूड' वादी कांग्रेसियों को लगता है कि राम मंदिर पर इनका ताज़ा प्रलाप इन्हें जनता के बीच मज़बूत करेगा.
2. कुछ लिबरल्स को भी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के वक़्त लगा था कि अब मंदिर-मस्जिद का दशकों पुराना बवाल ख़त्म हुआ. अब देश में सब अच्छी बातें होंगी.
लगता है इन्होंने संघ को एक 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' वाला मोर्चा समझ रखा है. संघ की पोटली अभी कार्यक्रमों और योजनाओं से भरी हुई है. जो निकलेगा बवाल निकलेगा.
अभी 2023 आने दीजिए. आज का जो दौर मुश्किल लग रहा है, वो तब नॉर्मल लगेगा. ठीक वैसे ही जैसे आडवाणी आजकल बेचारे लगते हैं. राम मंदिर प्रतीक भर है. मूल एजेंडे में सिर्फ़ एक पर ही कदम बढ़ा है. CAA और NRC. अभी जल्द ही UCC आएगा और धीरे-धीरे गोलवलकर का भारत बनता जाएगा.
मोदी तब कम्यूनल भी नहीं लगेगा. कांग्रेस 'मूडवादी' बनकर बीजेपी के पीछे-पीछे तो चलेगी, लेकिन इतनी पीछे छूट जाएगी कि 44 वाला आंकड़ा भी बड़ा दिखेगा. जब एक ही दाम में जनता को रिबॉक मिलेगा तो वो रिबूक नहीं ख़रीदेगी. 2002 वाले मोदी के लिए 1984 वाला कमलनाथ चांदी की ईंट भेज रहा है.
दिग्विजय सिंह राजीव गांधी को श्रेय दे रहा है. प्रियंका गांधी अलंकृत हिंदी में राम का महत्व समझा रही है, जबकि राम मंदिर के शौक़ीनों को पता है कि ये सब नकली माल है. असली जब मार्केट में है तो नक्कालों से लोग सावधान रहते हैं. जो सावधान हैं उन्हीं को कांग्रेस फंसाना चाहती है. नहीं होगा.

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