सर दे के ज़माने की हुक़ूमत ख़रीद ली !

ध्रुव गुप्त 
इस्लामी वर्ष का पहला और उसके चार सबसे पवित्र महीनों में एक मुहर्रम चल रहा है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद ने इसे अल्लाह का महीना कहा है। मुहर्रम के महीने के शुरुआती दस दिन विश्व इतिहास के एक सबसे अनोखे और त्रासद युद्ध के साक्षी रहे हैं जब कर्बला में इंसानियत के दुश्मन यजीद की अथाह सैन्य शक्ति के विरुद्ध हज़रत मोहम्मद के नवासे  हुसैन इब्न अली ने सत्य और न्याय के लिए अपने थोड़े-से स्वजनों के साथ प्रतीकात्मक प्रतिरोध का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया था।
मुहर्रम के दसवें  दिन को यौमें आशुरा कहा जाता है। यह वह दिन है जब हुसैन की कर्बला में उनके सभी बहत्तर स्वजनों के साथ शहादत हुई थी। कई दिनों तक भूखा-प्यासा रखने के बाद यज़ीद की सेना ने उनकी बर्बर हत्या कर दी थी। यौमे आशुरा का इस्लाम ही नहीं, मानवता के इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान है। उस बलिदान के किस्से और मर्सिया पढ़ औऱ सुनकर आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।
कब था पसंद रसूल को रोना हुसैन का
आग़ोश-ए-फ़ातिमा थी बिछौना हुसैन का
बेगौर ओ बेकफ़न है क़यामत से कम नहीं
सहरा की गर्म रेत पे सोना हुसैन का !
मनुष्यता के हित में सब कुछ लुटाकर भी कर्बला में हुसैन ने अदम्य साहस और बलिदान की जो रोशनी फैलाई, वह सदियों से उच्च जीवन-मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ रहे लोगों की राह रौशन करती आ रही है। कहा भी जाता है कि 'क़त्ले हुसैन असल में मरगे यज़ीद हैं / इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद।'
इमाम हुसैन का वह बलिदान मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। हुसैन महज़ मुसलमानों के ही नहीं, हम सबके हैं। इस्लाम के प्रसार के बारे में पूछे गए एक सवाल के ज़वाब में एक बार महात्मा गांधी ने कहा था - 'मेरा विश्वास है कि इस्लाम का विस्तार उसके अनुयायियों की तलवार के ज़ोर पर नहीं, इमाम हुसैन के सर्वोच्च बलिदान की वज़ह से हुआ।'
नेल्सन मंडेला ने अपने एक संस्मरण में लिखा है - 'क़ैद में मैं बीस साल से ज्यादा गुज़ार चुका था। एक रात मुझे ख्याल आया कि मैं सरकार की शर्तों पर आत्मसमर्पण कर इस यातना से मुक्त हो जाऊं, लेकिन तभी अचानक मुझे इमाम हुसैन और करबला की याद आई। उनकी याद ने मुझे वह ताक़त दी कि मैं विपरीत परिस्थितियों में भी स्वतंत्रता के लिए खड़ा रह सकूं।'
लोग सही कहते हैं कि इमाम हुसैन जैसी सोच और जज़्बे वाले लोग कभी मरते नहीं। अपनी विरासत के रूप में हुसैन आज भी ज़िन्दा हैं, मगर यजीद भी अभी कहां मरा है ? यजीद अब एक व्यक्ति का नहीं, एक अन्यायी और बर्बर सोच का नाम है। आज इस बर्बर सोच ने दुनिया का एक बड़ा हिस्सा घेर रखा है। दुनिया में आज जहां कहीं भी आतंक, भय, अन्याय, बर्बरता, अपराध और हिंसा है, यजीद वहां-वहां मौज़ूद है।
यही वज़ह है कि हुसैन आज के दौर में पहले से ज्यादा प्रासंगिक हैं। मुहर्रम हुसैन के मातम में अपने हाथों अपना ही खून बहाने या ताज़िये निकालकर जश्न मनाने का नहीं, उनके बलिदान से प्रेरणा लेते हुए मनुष्यता, समानता, अमन, न्याय और अधिकार के लिए उठ खड़े होने की चुनौती है।

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