राहुल एंड कम्पनी ने यह निर्णय किया है कि गांधी परिवार से कोई अध्यक्ष नही होगा तो यह नई सम्भावनाओं के द्वार खोलने वाला निर्णय है?


मनीष सिंह 
अगर राहुल एंड कम्पनी ने यह निर्णय किया है कि गांधी परिवार से कोई अध्यक्ष नही होगा, तो यह नई सम्भावनाओ के द्वार खोलने वाला निर्णय है। मगर इस सोने में सुहागा लग जाए, अगर अगला अध्यक्ष दक्षिण से हो।
सबसे पहली बात तो यह, कि गांधी फैमली ने दक्षिण का कभी आभार व्यक्त नही किया। नरसिंहराव, जो दक्षिण के अकेले प्रधानमंत्री थे, परिवार की वजह से नही, परिवार के बावजूद पद पर हुए। अपने प्रधानमंत्री के साथ परिवार की दूरी और उपेक्षा, निश्चित ही दक्षिण के दिल मे एक घाव की तरह होगा। वाईएसआर के पुत्र के साथ दुर्व्यवहार ने तो, आंध्र से पार्टी का तंबू ही उखाड़ दिया।
आज वक्त है, कि दक्षिण को उसका ड्यू दिया जाए। दक्षिण ने जरूरत के वक्त इस दल को हमेशा शरण दी है। अमेठी हारे राहुल आज सांसद है, तो दक्षिण की वजह से। 2009 में मनमोहन की मजबूत वापसी हुई तो दक्षिण की वजह से, और 1977 रायबरेली से हारी, हताश इंदिरा को ताकत मिली तो दक्षिण की वजह से। याद कीजिये- एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर चिकमंगलूर..
वह चिकमंगलूर 1996 में जनता दल को गया और अब भाजपा का किला है। मगर दक्षिण में आखरी, और डोलता हुआ किला है। दक्षिण की तासीर अलग है। उत्तर के विपरीत, वह अक्लमंदों की धरती है। वह रोजी, रोटी, धंधे, रोजगार, सुविधा, और पॉपुलिज्म पर चलती है। तमाम प्रयासों के बावजूद उत्तर की नफरती राजनीति से दक्षिण दूर है। जिंदगी के मूल सवालों के करीब है। यह कांग्रेस का सन्देश पकड़ने के लिए बेटर प्रिपेयर्ड है। उत्तर के उलट, उधर कांग्रेस के भरोसेमंद क्षेत्रीय साथी भी हैं।
1977 की आंधी में जब पूरे उत्तर में कांग्रेस का तम्बू उखड़ गया था, दक्षिण में तब भी उसका आधार बना रहा। नक्शा देखिये। असल मे कांग्रेस 152 पर थी मगर उसके एलाइज के साथ वह 192 सीट पर रही। आज के दौर में उत्तर के राज्यो में कुछ मामूली सफलता इतनी संख्या के साथ जुड़ जाए, तो देश की दिशा तत्क्षण बदल जाएगी।
केंद्र में परिवार का दावेदार न होना, सकारात्मक है। उन क्षेत्रीय दलों के लिए जो कांग्रेस के राजकुमार के रहते, विरोधी फॉर्मशन में सर्वोच्च पद के दावेदार नही हो सकते। परिवार का किसी फॉर्मशन के केंद्र में न होना, उम्मीद से भरे छोटे छोटे जमावड़ो को एक साथ लाने में कारगर हो सकता है।
इसके लिए कांग्रेस को एक मध्यम आकार के लीडर की जरूरत होगी, जो झुक कर रीच आउट करे। रियलपोलिटिक हो, संगठन की समझ हो, तत्काल बड़ी महत्वाकांक्षा न हो। एक बड़ा फार्मेशन बनाकर उत्तर में अच्छी डील दिलाये और दक्षिण में अपने बूते चमत्कार कर, सेंटर ऑफ ग्रेविटी कांग्रेस के कब्जे में रखे।
डीके शिवकुमार मेरा पिक होंगे। इनके साथ थरूर और राहुल को बस एक कदम पीछे रहकर, क्रमशः इंटेलक्चुअल और मोरल बैकअप देना होगा। राहुल कांग्रेस का गोंद हैं। उन्हें यह जिम्मा उठाना होगा। यूजलेस ज्योतिरादित्य, और अपनी भद पिटवा चुके सचिन पायलट खुद इनके मार्ग से हट चुके हैं। इसलिए यह बदलाव आसान है, वक्त की दरकार है। यह तिकड़ी कांग्रेस की जरूरत है। और सच कहें, तो कांग्रेस से ज्यादा देश की जरूरत है।

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