साल में 2 दिन राष्ट्रध्वज ग़रीबों के लिए दाल-रोटी का इंतज़ाम कर ही देता है?


सौमित्र रॉय 
घर की छत से एमपी सरकार के सचिवालय यानी वल्लभ भवन की सजावट साफ़ नज़र आ रही है। कुछ रोशन हिस्सा विधानसभा का भी दिख रहा है। लोकतंत्र सरकारी रोशनी में नहाया हुआ है। एमपी सरकार ने हाल ही में बाजार से 1000 करोड़ उठाये हैं।
मोदी सरकार को आज रिज़र्व बैंक ने खर्चे के लिए 57 हज़ार करोड़ दिए हैं। मेरे आज़ाद देश की सरकारें कर्ज़ की ग़ुलाम बन रही है। गर्व हो रहा है। फ़िर मेरी आँखें सड़क पर हाथ में तिरंगा लिए राष्ट्रभक्तों को तलाशते बच्चों को खोजने लगती हैं।
सड़क पर कुछ बच्चे घूम रहे हैं। साब, झंडा ले लो। कहीं 20 तो कहीं 10 का एक। एक झंडे से बच्चे का दिल नहीं भरता। नज़रें कह रही हैं, सब ले लो। साल में 2 दिन ही सही, राष्ट्रध्वज ग़रीबों के लिए दाल-रोटी का इंतज़ाम तो कर ही देता है। बाकी दिन फाके ही सही। यह भी गर्व का विषय है।
इस देश में गर्व करने के लिए बहुत से विषय हैं। फुटपाथ पर कुछ तिरंगे मास्क भी नज़र आये हैं। नहीं जानता ये कितना उचित है, लेकिन राष्ट्रध्वज अगर कोरोना से बचा लेता है तो शायद ग़लत भी क्या है! इस पर भी गर्व क्यों नहीं होना चाहिए?
अभी-अभी महामहिम ने गांधीजी से लेकर गलवान घाटी के बहादुरों तक, सब पर गर्व किया। मैं सोचने लगा कि गलवान के लिए गर्व क्यों, जबकि वहां कोई घुसा ही नहीं था। बरसात के कीचड़ के बीच एक जगह चूने से ध्वज स्तंभ को पोता गया है। कल झंडा फहराया जाएगा। मुझे गर्व का अहसास हुआ।
देशभक्ति के गीत गूंजेंगे। लोग अभी से पार्टी-पिकनिक की तैयारी में जुटे हैं। जानकर सीना चौड़ा हो गया। मैं अपनी बात को आज़ादी से आपके साथ साझा कर पा रहा हूँ, यह भी गर्व का विषय है, वरना अवमानना और FIR आजकल ट्रेंडिंग हैं।
गर्व तब भी होता है, जब साफ नजर आ रहे सारे झोल-झाल को सरकारें एकदम दुरुस्त ठहरा देती हैं। ग़लत को सही मनवा लेना भी लोकतंत्र की एक बड़ी उपलब्धि है। हमने इसकी आज़ादी सरकार को ख़ुद सौंपी है।
भक्त आज़ाद हैं, सरेआम ठोक देने, छेड़ने, धमकाने-चमकाने, गाली देने, धर्म के नाम पर गुंडई करने के लिए। नेता आज़ाद हैं मनचाहे तरीके से कभी भी युधिष्ठिर बन जाने के लिए। ये आज़ादी सबको मुबारक हो।

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