'जहालत' कब तक आखिर कब तक !


हिदायत खान 
कोरोना को लेकर सख़्ती है, लगातार मरीज़ बढ़ रहे हैं, बावजूद इसके आख़िर कौन थे, जो ताजिया लेकर घरों से निकल पड़े और उनके पीछे भीड़ दौड़ने लगी। ज़ाहिर है,गलत हुआ है और इसके लिए माफ़ी नहीं दी जा सकती है। बड़ी मुश्किल से खजराना कोरोना के चुंगल से बाहर आया है, उसे फिर धकेलने की कोशिश हुई है।
वही इलाका है, जिसने कोरोना का गुस्सा देखा है।शुरुआती दौर में यहां लगातार मरीज़ निकले हैं, मौतें हुई हैं, सन्नाटा पसरा रहा है, दहशत फैली है।लोगों ने मज़बूती से उसका मुकाबला किया था और कोरोना को तकरीबन बाहर कर दिया गया था। जहां दूसरी तरफ मरीज निकल रहे हैं,वहीं खजराना महफूज़ है। ऐसे में यहां मोहर्रम का जुलूस निकालकर चंद जाहिलों ने फिर इलाके को सुर्खियों में ला दिया है और ख़तरे में भी। पहले ही साफ कर दिया गया था, मोहर्रम के जुलूस नहीं निकलेंगे।
ताजिए बना लीजिए, पर उस तरह से सड़क पर नहीं दिखेंगे, जैसे दिखते रहे हैं,लेकिन जहालत एक बार फिर सिर चढ़कर बोली है।उसने सड़क पर जो हंगामा किया है, उसका बचाव नही किया जा सकता है। क्या इन्हें नहीं पता था, जिन सड़कों या गलियों से ताजिया निकलने वाला है, वहां भीड़ है, छुट्टी है,फुर्सत हैं और ताजिया देखकर लोग घर में नहीं रह पाएंगे, उसके पीछे ज़रूर चलेंगे, नारेबाजी होगी, लेकिन बस... मूर्खों की टोली निकल पड़ी।
इतवार को लॉकडाउन रहता है, सब बंद होता है,इसकी परवाह भी नहीं की गई है, जबकि कोरोना में क्या कुर्बानी नहीं दी गई है ? रमज़ान घर में गुज़रे हैं, ईद की नमाज़ घरों में हुई है, अभी भी मस्जिदों में पाबंदी है, कई बड़े त्यौहार सन्नाटे में गुज़र गए हैं,हज़ार रातों से बेहतर शबे कद्र भी घर में ढूंढी गई है, लेकिन जहालत का तमाशा सड़क पर हो गया।
ताजिया बनाना कोई अच्छी बात तो है नहीं, इस बुराई से बुराई ही निकलना थी, जो सामने खड़ी है।ज़ाहिर है, पुलिस की नाकामी रही है, उसे वक़्त से पहले हालात को भांपना चाहिए था, लेकिन उसे लग रहा था, इतना संगीन दौर देखने के बाद शायद खजराना सुधर गया है, पर सुधरा नहीं है, उसने बता दिया है, जब भी जहालत का डमरु बाजेगा,वो ज़रूर नाचते हुए बाहर आएंगे।
बात सिर्फ खजराना की नहीं है, दूसरे इलाकों में भी हंगामा हुआ है।पता नहीं इन पर इतना सुरुर क्यों छा जाता है। जो हुआ है, उसके सामने सियासी जुलुस, ढोल-तमाशे की बात नहीं की जा सकती हैं, क्योंकि अभी सिर्फ इसी गलती पर बात होना चाहिए।वैसे किसी की गलती दिखाकर अपनी गलती दबाई नही जा सकती है। जो किया गया है, उसके लिए कोई कवच नही है।

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