दोस्त और राज़दार हो तो जया प्रदा जैसी? मरते दम तक अमर सिंह के साथ रहीं


नदीम एस अख्तर 
दोस्त और राज़दार हो तो जया प्रदा जैसी। मरते दम तक अमर सिंह के साथ रहीं, पूरे समर्पण के साथ। ऐसा किरदार मुझे तुर्की के ड्रामा सीरीज़ अर्तुरुल ग़ाज़ी में दिखा, जो अर्तुरुल के Alp हैं, योद्धा हैं, साथी है। इनके नाम दोआन, तुर्गुत और बाम्सी हैं।
मौकारस्त और selfish कोई हो तो अमिताभ बच्चन जैसा। सबको यूज़ करके अपना मतलब निकाला और चलते बने। गांधी परिवार से लेकर अमर सिंह तक और महमूद से लेकर कादर खान और सुनील दत्त तक। परवीन बॉबी और रेखा का नाम भी उसके शिकार में शामिल है। अभी इनकी दोस्ती मोदी जी से है। सत्ता बदलते ही फिर नए यार बना लेंगे।
भाषा, बोली और व्यवहार पर नियंत्रण हो तो राहुल गांधी जैसा।   इनका राजनीतिक कैरियर अभी भले ढलान पर हो लेकिन राहुल ने कभी राजनीतिक रैलियों, संसद, पत्रकार वार्ता और लोकजीवन में मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। हमेशा संयत बने रहे और ना नफरत वाली बोली बोली, ना ही किसी को गाली दी या गलत शब्द कहे। इनको कांग्रेस की अध्यक्षी तक छोड़नी पड़ गई पर कभी विरोधियों के लिए अपशब्द नहीं कहे।
अपमान का घूंट पीकर जीने की कला हो तो लालकृष्ण आडवाणी जैसी। बीजेपी को रथ यात्रा और मंदिर आंदोलन के मार्फ़त सिफर से शिखर तक पहुंचाया। फिर भी पार्टी की अध्यक्षी से हाथ गंवाना पड़ा और नरेंद्र-अमित राज में अज्ञातवास व उपेक्षा का जीवन जीना पड़ा। इसके बावजूद कभी अपने मातृ संगठन और अपनी पार्टी के बारे में दो शब्द भी बुरा नहीं कहा। ना ही कल्याण सिंह की तरह पार्टी बदली। बस मुंह सिल लिया और अपमान का घूंट पीकर सबकुछ टुकुर-टुकुर देख रहे हैं। अभी खबर आ रही है कि अयोध्या के राम मंदिर भूमिपूजन में उनको नहीं बुलाया गया है। पर आडवाणी चुप हैं। इतना माद्दा अच्छे-अच्छों में नहीं होता। लोग गुस्से से फट जाते हैं।
और आखिर में बहू हो तो सोनिया गांधी जैसी। जिस घर में ब्याह कर आईं, उसके लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। इटली की होने के बावजूद ना सिर्फ उस हिंदुस्तान की रवायत, वेश-भूषा को अपनाया बल्कि उस पार्टी को भी नया जीवन दिया, जिसकी बागडोर शुरू से उसके ससुराल वालों के हाथ में रही। इन्होंने असहनीय कष्ट झेले। पहले अपनी सास को खोया, फिर पति बम धमाके में मारे गए पर सोनिया विचलित नहीं हुईं। कांग्रेस पार्टी को सम्बल देती रहीं और जान के खतरे के बावजूद गांधी परिवार की अगली पीढ़ी, राहुल और प्रियंका को राजनीति में उतार दिया। चाहतीं तो पति के मरने के बाद सब कुछ समेटकर बच्चों समेत देश छोड़ देतीं। उनकी जान से ज्यादा बढ़कर कुछ नहीं। पर सोनिया एक सच्ची बहू साबित हुईं।
ना सिर्फ रोड पर उतरकर कांग्रेस को सत्ता में लेकर आई, बल्कि मनमोहन सिंह को पीएम बनवाकर ये साबित किया कि कांग्रेस पार्टी और देश में वही होगा, जो वह चाहेंगी। प्रणव मुखर्जी, शरद पवार और अन्य महत्वकांक्षी नेताओं से कांग्रेस को मुक्त किया और ये सुनिश्चित किया कि कांग्रेस पार्टी टूटे नहीं और इसकी बागडोर गांधी परिवार के हाथ में रहे। गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका गांधी की तरह इन्होंने ना तो कांग्रेस छोड़ी, ना अपने ससुराल की विरासत को विरोधियों के हाथों रुसवा होने का मौका दिया।
और जाते-जाते एक और बात। डंके की चोट पर झूठ बोलने में कोई माहिर हो तो ..........
पाठक अपने विवेक से रिक्त स्थान की पूर्ति कर लें।

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