गुंजन सक्सेनाः द कारगिल गर्ल की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यह एक वॉर फिल्म नहीं है...


फिल्म अपने नाम में लिखे 'कारगिल' शब्द को जस्टीफाई करने के मोह में नहीं पड़ती। वह युद्व को सिर्फ युद्व की तरह देखती है, उन्माद की तरह नहीं। यह एक लड़की की फिल्म भी नहीं है, ना ही एक पायलट की। दरअसल यह एक लड़की को समाज के द्वारा देखे जाने के तयशुदा नजर‌िए की फिल्म है। उस समाज जिसमें परिवार भी है, रिश्तेदार भी और हजारों फिट ऊपर बने एयरफोर्स के स्टेशन भी।
पुरुष आमतौर पर जब ये मानते हैं कि लड़की फला प्रोफेशन में बेहतर नहीं करेगी, तो उस समय वह अपनी समझ से लड़की को ह्यूमिलेट नहीं कर रहे होते हैं। दरअसल उस समय वे उस पर या तो तरस खा रहे होते हैं या उसे किसी ऐसे खतरे से बचा रहे होते हैं,जो लड़की नहीं देख पा रही होती है। गुंजन सक्सेना भारत की पहली फीमेल एयर फोर्स पायलट की कहानी बताई जाती है। लेकिन यह कहानी अकेली गुंजन की ना होकर भारतीय पुरुषों द्वारा महिलाओं पर तरस खाने की मानसिकता की कहानी है। यदि आप पुरुष हैं तो फिल्म देखते वक्त ऐसे दर्जनों मौके आएंगे जब आप खुद को कटघरे में पाएंगे। ऐसा भी नहीं है कि फिल्म एकतरफा है। कुछ ऐसे मौके भी हैं जब महिलाओं को खतरे से बचाने वाली मानकिसता को भी डिफेंड किया जाएगा। उतने ही मजबूत, तार्किक संवादों और किरदारों के साथ।
गुंजन सक्सेना का मुख्य फोकस मध्यमवर्गीय परिवार की ऐसी लड़की की कहानी कहना है जो एक ऐसा प्रोफेशन चुनना चाहती है जो आदिकाल से बिना कुछ कहे पुरुषों के लिए आरक्षित है। पिता को छोड़कर परिवार में सभी को लड़की की यह ख्वाहिश वीयर्ड भी लगती है और बचकानी भी। फिर भी लड़की एयरफोर्स में पायलट बन जाती हैं। ऐसी तमाम फिल्‍में होती हैं जो यहीं से खत्म हो जाती हैं। गुंजन सक्सेना एक तरह से यहीं से शुरू होती है।
उधमपुर के एयरफोर्स बेस कैंप में गुंजन को फीमेल ट्वायलेट ना होने से लेकर 'चोली के पीछे क्या है' गानों और शराब के भभकों से भरी पार्टियां झेलनी होती हैं। उन जोक्स को इग्नोर करना है जिसके सेंट्रल प्वाइंट में या तो लड़की है या उसका जिस्म। उसे इन्हीं विषयों पर अनवरत होने वाली ब्वॉयज टॉक से बचना होता है। प्रॉब्लम वहां नहीं है। गुंजन इसी समाज से आई थी, वह यह चीजें पहले भी बदले हुए तरीकों से फेस करती रही है। वह इससे खुद को अडजेस्ट कर लेती है।
असल प्रॉब्लम गुंजन के 'कैपेबल होने या ना होने' की है। उसके हिस्से का काम सिर्फ इसलिए छीन लिया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि वह पुरुषों जितनी मजबूत नहीं है। हर बार इसके पीछे अधिकारियों का पुरुषवाद भी नहीं है। उनकी एक थ्योरी है। थ्योरी यह है कि 'यह एक वॉर जोन है। यहां दुश्मन बड़ी बड़ी आंखों में लिए आंसू देखकर नहीं मरेगा, वो दुश्मन की गोली से मरेगा। हम यहां देश को बचाने के लिए बैठे हैं। आपको बराबरी देने के लिए नहीं'। एक झटके में बोला गया यह हजारों साल से चली आ रही सोच का मॉडेस्ट वर्जन है। फ़िल्म में एक पंजे लड़ाने का भी सीन है। यह आपको बहुत देर तक कचोटता है।
फिल्म के आखिरी के दस मिनट में सबकुछ ठीक हो जाता है। यह फिल्म के सबसे कमजोर मिनट हैं। जहां गुंजन जबरन हीरो बनाई जा रही होती है। परिवार और बेस कैंप दोनों में। युद्व के हिस्से को बहुत ही सतही तरीके से शूट किया गया। शायद युद्व को दिखाना फिल्म के सेंट्रल आईडिया में था ही नहीं। पर जिस बात को गुंजन सक्सेना दिखाना चाहती है उसमें यह सोहल आना सफल होती है।
फिल्म के सबसे अच्छे हिस्से गुंजन और उसके पिता के बीच होने वाली बातचीत के हैं। गुंजन का रोल जाहन्वी कपूर ने निभाया है और पिता का पंकज त्रिपाठी ने। पंकज उम्दा अभिनेता है। लड़की को 'बचपन से ही छूट' देने वाले एक विनम्र और प्रगतिशील पिता की भूमिका को वह बहुत बेहतर तरीके से बुनते और रचते हैं। 
Pankaj अब हर तरह के पिता बन चुके हैं। अगर आप नेपोटिज्म नाम के बुलबुले से उबरकर फिल्म देखें तो आपको जाहन्वी का काम वैसे ही अच्छा लगेगा जैसा नीरजा में सोनम कपूर का लगा था। श्रीदेवी और बोनी की इस बड़ी बेटी ने अच्छा अभिनय किया है। किसी फिल्मी घराने से आना किसी की काबियलत नहीं है तो उसको सिर्फ इसलिए ही अवॉयड करना जस्टिस भी नहीं। पुरुषवादी मानसिकता के जिस परंपरवाादी चेहरे की आवश्यकता थी विनीत सिंह चौहान उसे बेहतर तरीके से निभाते हैं। Vineet और बड़े रोल के लिए बने हैं। इतने से जी नहीं भरता।
फिल्म 1999 के आसपास की है। पिछले बीस बरसों में लड़की और उसके प्रोफेशन को लेकर बहुत बड़ा बदलाव हमारे बीच आया है। इस‌ लिहाज से मेट्रो शहरों में पले बढ़े लोगों को जेंडर को लेकर होने वाला ये भेदभाव शायद थोड़ा बनावटी लगे, लेकिन हम जैसे ही इस समाज को बीस साल पीछे ले जाएं ये बातें सच लगने लगती है।
यह अच्छा है कि यह फिल्म 1999 की है। 2020 में हम ना ऐसा समाज एफोर्ट कर सकते हैं ना ही ऐसी एयर फ़ोर्स। एयरफोर्स को फिल्‍म से कुछ आपत्तियां हैं। उनकी आप‌त्तियां जायज हैं...फ़िल्म में देशभक्ति की एक परिभाषा भी है,जो इस समय वाली पापुलर परिभाषा से शायद मैच न करे....

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