संघ को अब और क्या चाहिए?


दिलीप खान 
संघ को और क्या चाहिए? जिस चीज़ के लिए उसे ज़ोर लगाना पड़ रहा था, वो अब बॉटम लाइन बनती जा रही है. कांग्रेस के नेता जय श्रीराम के नारे लगा रहे हैं, चांदी की ईंटें भेज रहे हैं. समाजवादी पार्टी परशुराम की भव्य मूर्ति बनाने जा रही है. बीएसपी उससे भी भव्य मूर्ति बनवाने की बात कर रही है.
जिन प्रतीकों को सर्वग्राह्य बनाने के दौरान संघ-बीजेपी इन पार्टियों से टकराते रहे, उस एजेंडे को श्रवण कुमार बनकर ये लोग ख़ुद ढोने में जुट गए हैं. जब टकराव वाले विचार/प्रतीक सर्वसम्मत बॉटम लाइन बन जाएं तो समझिए विपक्ष की राजनीति मर चुकी है. इन लोगों ने काम करना बंद कर दिया है. ये लोग मान बैठे हैं कि जनता बीजेपी के साथ है और उसका एक टुकड़ा इन्हें तोड़ना है.
इस दौरान इनके ख़ुद के प्लॉट पर बीजेपी अपनी चारदीवारी बना रही है, लेकिन प्लॉट नहीं, इन्हें वही टुकड़ा चाहिए. 1992 में इनके पास मंडल की राजनीति थी. इस वक़्त मंडल के उसूलों पर रोज़ चोट हो रही है, इन्हें दिखना बंद हो गया है. ये सब पूंछ लगाकर नकली घोड़ा बनकर रेस में दौड़ने उतरे हैं.

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