तंगहाल, बेरोज़गार, भूखी अवाम से अपने फ़ायदे के लिए हिंदुस्तान में कुछ भी कराया जा सकता है?


सौमित्र रॉय 
बेंगलुरु में दंगों की जांच करने पंहुची पुलिस को पता चला है कि महीनों तक बेरोज़गार घर में बैठे पुरुषों ने इसे अंजाम दिया है। अब इनमें से 85% फरार हैं। अगर आपके पास नौकरी न हो, बच्चों की फीस और वार्ड शुल्क देने के पैसे न हों तो कोई भी आपको हिंसा के लिए प्रेरित कर सकता है।
आप मानें या न मानें, राम राज्य में आगे यह देशव्यापी होने जा रहा है। यह खेल मौजूदा निज़ाम के लिए बेहद मुफीद है। तंगहाल, बेरोज़गार, भूखी अवाम से अपने फ़ायदे के लिए हिंदुस्तान में कुछ भी कराया जा सकता है। आज से नहीं, आज़ादी के बाद बीते 74 साल का इतिहास यही कहता है।
इसे साम्प्रदायिक रंग देकर आज का निज़ाम अपनी जड़ों को और गहरा कर रहा है। सिर्फ यही नहीं, हालात बाकी फिरकापरस्तों के लिए भी माक़ूल हैं। आप इस सच्चाई से भी मुंह फेर सकते हैं कि देश की न्याय प्रणाली से ज़्यादा उम्मीद करना ग़लत होगा।
कल कश्मीर के कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज़ की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ कर दी। केंद्र ने कह दिया कि सोज़ नज़रबंद नहीं हैं और मी-लार्ड ने मान लिया। ये अलग बात है कि सोज़ की नज़रबंदी का वायरल वीडियो दुनिया ने देखा। यह सब इसलिए, क्योंकि अवाम चुपचाप तमाशा देख रही है।
बेलारूस को देखिये। किस तरह कोरोना के बावजूद वहां की औरतों ने दमन के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण तरीके से सड़क पर उतरकर आवाज़ उठाई। आप यह भी कह सकते हैं कि होने दो, हमें क्या फ़र्क़ पड़ता है। जब आग हमारे मकानों तक आएगी तब देखेंगे। आशंका सिर्फ इतनी है कि तब तक कहीं देर न हो जाए।

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