मुझे मत पुकारो: यदि तुम्हारी अंतरात्मा बच रही हो तो उसमें झांककर कभी अपने इस कन्हैया की प्रेम की बंसी अवश्य सुनना


ध्रुव गुप्त 
हे भारतवासियों, मेरे जन्मोत्सव के बहाने आज मत आवाज लगाओ मुझे ! तुम्हारे भारत की मेरी यात्रा द्वापर युग तक ही ठीक थी। तब धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए मुझे आना आवश्यक था। कलियुग में अवतार लेकर संभवतः मैं स्वयं संकट में फंस जाऊंगा।
तुम्हारे देश में सत्ता पक्ष हो या विपक्ष - दोनों ही के मूल में अधर्म है। दोनों ही पक्षों में कंसों, शकुनियों, धृतराष्ट्रों, दुर्योधनों और दुःशासनों की भारी भीड़ है। अधर्म ही अधर्म के विरुद्ध खड़ा है। अधिसंख्यक जन इन दोनों के मोहपाश में बंधकर सत्य, न्याय, समता, भाईचारे और प्रेम का मार्ग कब का भूल चुके हैं। कभी युद्ध हुआ भी तो धर्मयुद्ध नहीं, अधर्मयुद्ध ही होगा।
अधर्म ही अधर्म से लड़ेगा। अधर्म ही मरेगा, अधर्म ही मारेगा। अधर्म ही जीतेगा, अधर्म ही हारेगा। भारतभूमि में जब कहीं धर्म है ही नहीं तो महाभारत रचने की क्या आवश्यकता है मुझे ? ये कपटी लोग अपना महाभारत स्वयं रचेंगे और लड़-मरकर इस पवित्र भूमि को बोझ से मुक्त करेंगे।
और हां, यदि तुम्हारी अंतरात्मा बच रही हो तो उसमें झांककर कभी अपने इस कन्हैया की प्रेम की बंसी अवश्य सुनना। तुम सबके असंख्य पापों से मुक्ति का कोई रास्ता निकलेगा तो वहीं से निकलेगा।

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