डॉन फिल्म के पर्दे के पीछे का सच


- वीर विनोद छाबड़ा 
हर फ़िल्म के पीछे एक कहानी है, परदे के पीछे। बहुत रोमांचक और कभी-कभी दुखद और भयानक भी। ज़बरदस्त हिट 'डॉन' के पीछे की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। मशहूर सिनेमाटोग्राफर नरीमन ईरानी को फिल्म बनाने का कीड़ा काटा। उन्होंने अशोक कुमार, सुनील दत्त और वहीदा रहमान को लेकर फिल्म बनाई 'ज़िंदगी ज़िंदगी' (1972). सुपर फ्लॉप हुई।
नरीमन पर लाखों का क़र्ज़ चढ़ गया। फिल्म शूट करने वाला आदमी कैसे चुकाए? बेचारे बहुत परेशान रहते थे। उन दिनों वो मनोज कुमार की 'रोटी कपड़ा और मकान' शूट कर रहे थे। मनोज के सहायक चंद्रा बरोट, अमिताभ और ज़ीनत अमान की उनसे बहुत अच्छी निभने लगी। नरीमन की व्यथा सुन कर वे बहुत व्यथित हुए। इरादा किया किया कि नरीमन की मदद की जाए। उन्होंने एक प्लान बनाया, नरीमन की मदद के लिए एक फिल्म बनाई जाए। नरीमन प्रोड्यूस करेंगे और चंद्रा डायरेक्शन संभालेंगे।
सवाल उठा कहानी का। नरीमन और चंद्रा ने लेखक सलीम-जावेद से संपर्क किया जो उन दिनों हिट फिल्म लेखन के पर्याय बने हुए थे। सलीम-जावेद ने कहा, स्क्रिप्ट तो है और बिलकुल तैयार। उन्होंने कहानी सुनाई। बहुत पसंद आई। लेकिन साथ ही साथ सलीम-जावेद ने सावधान भी किया, तमाम नामी-गिरामी फिल्मकार इस स्क्रिप्ट को रिजेक्ट कर चुके हैं। सब का कहना है, गॉडफ़ादर चलेगा, डॉन नहीं। लेकिन इसके बावजूद नरीमन और चंद्रा डरे नहीं। बनाएंगे, ज़रूर बनाएंगे।
और तमाम परेशानियों के बावजूद फिल्म बनी, साढ़े तीन साल लग गए। पैसा ही नहीं था। फिर इस बीच अमिताभ सुपर स्टार बन गए और जेनी बेबी की पतंग भी आसमान पर उड़ने लगी। इनकी मसरूफ़ियात बहुत बढ़ गयीं। बड़ी मुश्किल से तारीख़ मिलती थी। जेनी बहुत लेट आती थीं। इधर प्राण साहब का एक्सीडेंट हो गया। स्क्रिप्ट बदली गयी। प्राण साहब को लंगड़ा दिखाया गया। तमाम अन्य मौके भी आये जब स्क्रिप्ट बदली गयी। सलीम-जावेद ने बहुत सहयोग दिया।
फिल्म रिलीज़ के लिए तैयार हुई। लेकिन तभी पहाड़ टूटा। नरीमन ईरानी की एक एक्सीडेंट में मौत हो गयी। मगर चंद्रा ने हिम्मत नहीं हारी। आगे बढ़ते रहे। अपने बॉस मनोज कुमार को फिल्म दिखाई। मनोज ने कहा, फिल्म तो अच्छी है। लेकिन सेकंड हॉफ बहुत टाईट है, एक्शन बहुत है। ऑडियंस को थोड़ा आराम दो। दो गाने डाल दो। लेकिन सलीम-जावेद पसड़ गए। फिल्म की निरंतरता टूट जायेगी। स्क्रिप्ट नहीं बदलेगी। इधर अमिताभ भी बहुत इंटरेस्टेड थे, डबल रोल में टैलेंट दिखाने का भरपूर मौका मिल रहा था।
उन्होंने भी सलीम-जावेद पर ज़ोर डाला। खैर, थोड़े दबाव पर वो तैयार हो गए, मगर सिर्फ एक गाने के लिए। म्युज़िक डायरेक्टर कल्याणजी-आनंद जी ने बताया कि उनके पास अंजान का लिखा एक गाना है जिसे देवानंद की 'बनारसी बाबू' (1973) के लिए रिकॉर्ड किया गया था लेकिन उसे फ़िल्माने की ज़रूरत नहीं समझी गयी। तय हुआ उसी गाने को डाल दिया जाए।
मई 1978 में फिल्म रिलीज़ हुई। कोई ख़ास पब्लिसिटी नहीं। बजट ही नहीं था। पहला हफ्ता बहुत ठंडा गया। मगर अगले हफ्ते से फिल्म चल निकली और इसकी वज़ह थी फिल्म में बढ़ाया गया वो गाना - खाइके पान बनारस वाला... जिसको ज़बरदस्त माउथ पब्लिसिटी मिली। गोल्डन जुबली हुई। उस साल की तीसरी सबसे बड़ी हिट। सारा फ़ायदा नरीमन के परिवार को दे दिया गया।

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