लिपुलेख अब तक भारत-नेपाल के बीच का विवाद था लेकिन अब मुहूर्त का सवाल सबसे बड़ा है?


दिलीप खान 
राम मंदिर पर मध्य प्रदेश कांग्रेस की हालत देखिए. वहां कांग्रेस के तीन बड़े नेता थे. एक भागकर बीजेपी चले गए. बचे दो. दिग्विजय सिंह और कमलनाथ. दिग्विजय सिंह ने कहा कि देश में ‘हर कोई’ चाहता है कि मंदिर बनें. कमलनाथ ने दो कदम आगे बढ़कर कहा कि जब भूमिपूजन होगा तो वे मध्य प्रदेश में हनुमान की पूजा करेंगे.
कमलनाथ ने राम मंदिर का श्रेय राजीव गांधी को देने की भी कोशिश की. ऐतिहासिक तौर पर ये सच है. ये सच है कि विश्व हिंदू परिषद, RSS और बीजेपी के लिए इस उन्मादी राजनीति के लिए ज़मीन पर रेड कारपेट बिछाकर राजीव गांधी ने ताला खोल दिया था. सबकुछ कांग्रेस के ज़माने में हुआ, लेकिन, मंदिर का रास्ता खुला मोदी के राज में.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को नरेन्द्र मोदी ने संसद के भाषण में ‘अपनी सरकार’ की उपलब्धि करार दिया था. राम मंदिर बीजेपी का वादा था. बीजेपी बनवा रही है. कांग्रेस का कभी ये वादा नहीं था, लेकिन कांग्रेस श्रेय लेना चाहती है. कांग्रेस ढंकना भी चाहती है और छुपना भी. उसे प्रत्यक्ष तौर पर मंदिर के नाम पर राजनीति करनी भी नहीं और उसे क्रेडिट भी चाहिए.
कांग्रेस तड़पकर मर जाएगी, लेकिन लोगों को ये नहीं समझा पाएगी कि राम मंदिर में उसका कोई ‘योगदान’ भी है. लोगों के ज़ेहन में ‘असली रामभक्त’ कौन है, ये स्पष्ट है.
कांग्रेस इस रेस में भी हारने के लिए उतरना चाहती है. कांग्रेस के सवालों पर नज़र दौड़ाइए. दिग्विजय सिंह ने कहा कि इसमें ‘शंकराचार्य’ को क्यों नहीं रखा गया? पूजन के मुहूर्त पर भी सवाल उठाया गया.
गृह मंत्री और उग्र रामभक्त कोरोना की चपेट में है. राम मंदिर के लिए रथ निकालकर दौड़ाने वाले आडवाणी-जोशी को बुलाया नहीं गया. दोनों पर फ़िलहाल बाबरी मस्जिद विध्वंश मामले में आपराधिक मुक़दमा चल रहा है. कोरोना के मामले में दो दिनों से भारत अमेरिका को छोड़कर दुनिया में नंबर वन बना हुआ है. राम मंदिर ट्रस्ट के पुजारी कोरोना संक्रमित हैं. लेकिन, सवाल मुहूर्त को लेकर किए जा रहे हैं.
बाक़ी रफ़ाल आने के ठीक एक-दो दिन बाद चीन लद्दाख के साथ-साथ लिपुलेख में भी घुस गया. लिपुलेख अब तक भारत-नेपाल के बीच का विवाद था. लेकिन, मुहूर्त का सवाल सबसे बड़ा है.

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