यूपी, बिहार, असम डूबे हैं, सड़क पर गुंडे बेख़ौफ़ हत्याएं कर रहे हैं, इकॉनमी गर्त में है और गोदी मीडिया सत्य कथा बना रहा है?


सौमित्र रॉय 
लगभग 13-14 साल पहले की बात है। एक बड़े मीडिया हाउस की साप्ताहिक पत्रिका निकला करती थी। नाम था सत्य कथा। इसे मनोहर कहानियां और रेलवे स्टेशन के बाहर बिकने वाली सड़क छाप अश्लील पत्रिकाओं का मिला-जुला रूप समझ लें।
क्राइम की हार्ड न्यूज़ को मनचाहा विस्तार देने वाली सत्य कथा के 8 टेबलायड पन्नों को पढ़ते हुए लोग बिना टिकट जनरल डिब्बे में बैठकर 12-14 घंटे का सफ़र यूं तय कर लिया करते थे।
पत्रिका की सामग्री इतनी उच्च कोटि की होती थी कि पढ़ने वाले की आंखों के आगे एक बेआवाज़ एडल्ट मूवी चलने लगे। कंटेंट बनाने वाले भी बहुत उच्च कोटि के हुआ करते थे। सामग्री अक्सर रात के सन्नाटे में तैयार होती। बाद में विदेशी रंगीन कहानियां, भूत-प्रेत और रहस्य-रोमांच भी सामग्री में जुड़ गए।
लोकप्रियता इतनी कि 15-20 हज़ार कॉपियां अलग से बेचने पर भी बिक जातीं। ऊपर से पोपले मुंह वाले दद्दू टाइप के लोग सुबह से अखबार के दरवाजे पर कांपते हाथों से सत्य-कथा लेने को खड़े मिलते। आप किरदारों के नाम बदल दीजिये, पर मसाला इतना निम्न रखिये कि पाठक को मज़ा आ जाए।
घटना में अगर लड़की वाला एंगल हो तो सोने पर सुहागा। सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी के मामले में वाकई सत्य कथा बनाई जा रही है। पहले दिशा सालियान (जो अब जीवित नहीं हैं) और अब रिया चक्रवर्ती। यूपी, बिहार, असम डूबे हैं, सड़क पर गुंडे बेख़ौफ़ हत्याएं कर रहे हैं, इकॉनमी गर्त में है और गोदी मीडिया सत्य कथा बना रहा है।
इस तरह की पत्रकारिता किसी कोर्स में नहीं है। इसके लिए आपको बहुत घटिया मानसिकता वाला होना पड़ेगा। आपको मानसिक बलात्कार सीखना होगा। न सीख पाएं तो हलक में दो घूंट शराब के उतारकर तकनीक का सहारा लें। मां-बहन से नीचे बात ही न करें और यौन मामलों में अकल्पनीय रचनात्मकता रखें। हो जाएगा।
गोदी मीडिया में इस प्रायोजित कार्यक्रम के पीछे की सियासत के बारे में सब जानते हैं। लेकिन इसने प्राचीन भारतीय कृषि समुदाय की गप्प बाजी की परंपरा को फिर स्थापित किया है। सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प इस परंपरा के तरफदारों के लिए स्लेट की तरह है।

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