एक देश एक कौम केवल किताबो में है, हकीकत यह है कि हर धर्म के लोग देश को अपने रंग में रंगना चाहते हैं?


शादाब सलीम
स्वतंत्रता दिवस के दिन विपक्ष के लोग बहुत आहत होते है। वह कहते है- यह कोई आज़ादी है, इससे अच्छे तो अंग्रेजों के काल में थे। सत्ता में सारे फासिस्ट बैठे है, हिन्दू विरोधी बैठे है, संविधान विरोधी बैठे है। जो विपक्ष में आता है स्वतंत्रता उसे कभी नहीं भांति, जैसे ही सत्ता में आता है
अंग्रेजों के विरुद्ध मशाल खड़ी कर देता, उनका नेता लाल किले पर चढ़ जाता है और देशप्रेम के गप्पे मारता है। लाल किले पर चढ़कर गप्पें मारते उनके नेता को देखकर जनता वशीभूत हो उठती है। जो सत्ता से बाहर जाता है देश उसे खाने दौड़ता है। फिर वह कहता- इस देश को तो बदलना पड़ेगा इस निज़ाम को तो बदल ही डालो।
स्वतंत्रता दिवस मानते बस वही अच्छे लगते थे जिन्होंने अंग्रेजों से लड़कर अपनी बागडोर अपने हाथों में ली थी। वह लोग मर खप गए फिर स्वतंत्रता दिवस नकली हो गया। अब लोग बोरियत मिटाने को यूँही नकली स्वतंत्रता दिवस मनाया करते है। जिन्होंने अंग्रेजों की एक लाठी नहीं खाई उनका क्या स्वतंत्रता दिवस! जिन्होंने रोज़ा ही नहीं रखा उनका क्या इफ्तार।
जब से नेशन स्टेट आई है तब से एक देश एक कौम हो गया पर एक देश एक कौम कभी बनी ही नहीं। कौम अब भी धर्मो और जातियों से ही बनती है। एक देश एक कौम केवल किताबो में है। हर जाति और हर धर्म देश को अपने रंग में रंगना चाहता है।

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