आज़ादी के 73 साल में इन दोनों देशों ने जो कुछ हासिल किया है, वह है - भूख, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद और मज़हबी कट्टरता

ध्रुव गुप्त 
भारतीय उपमहाद्वीप में फिलहाल दो-दो आजादियोंके जश्न है। चौदह अगस्त को पाकिस्तान की यौमे आज़ादी है और पंद्रह अगस्त को भारत का स्वतंत्रता दिवस। ये दोनों आज़ादियां धर्म के आधार पर देश के विभाजन, असंख्य निर्दोष लोगों की लाशों, यातनाओं और बर्बादियों की बुनियाद पर खड़ी हुई थीं।
आज़ादी के तिहत्तर साल लंबे सफ़र में इन दोनों देशों ने जो कुछ हासिल किया है, वह है - भूख, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, सामाजिक-आर्थिक-लैंगिक असमानता, मज़हबी कट्टरता, हथियारों की अंधी दौड़, युद्ध-लोलुपता और भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्थाएं। दोनों देशों में सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक - हर स्तर पर अभी प्रगतिशीलता से रूढ़िवादिता की उल्टी यात्रा चल रही है।
उधर पाकिस्तान अपनी जन्मजात धार्मिक कट्टरता,उग्र भारत विरोध, इस्लाम के प्रसार के नाम पर चल रहे आतंक के दर्जनों कारखानों और सेना की तुलना में कमज़ोर राजनीतिक व्यवस्था की वजह से आज दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क बन चुका है। उसकी गृह नीति मुल्ले-मौलवी तय करते हैं और विदेश नीति सेना।
आर्थिक नीति पहले अमेरिका तय करता था, अब चीन तय करता है। अपने आंतरिक अंतर्विरोधों और प्रादेशिक असंतुलन के कारण पांच दशक पहले वह दो टुकड़ों में बंटा और अभी कई और टुकड़ों में बंटने के कगार पर खड़ा है। आर्थिक बदहाली के बीच सिंध, बलूचिस्तान सहित कई राज्यों में वहां गृहयुद्ध के हालात बने हुए हैं।
दूसरी तरफ सर्वधर्मसमभाव, बसुधैव कुटुम्बकम और उदारता की गौरवशाली परंपरा वाले अपने भारत में हालात अभी उतने बुरे तो नहीं हैं, लेकिन कट्टरपंथियों की लगातार कोशिशों से यह भी पाकिस्तान के रास्ते पर चल निकला है। भिन्न आस्थाओं के बीच परस्पर सम्मान तथा वैचारिक सहिष्णुता की परंपरा नष्ट हो रही है। धर्मों और जातियों के बीच का अविश्वास लगातार गहरा हुआ है।
भौगोलिक तौर पर हम एक देश ज़रूर हैं, लेकिन भावनात्मक तौर पर हम कई राष्ट्रों में विभाजित हो चुके हैं। हिंदुत्व का गौरव लौटाने के नाम पर सक्रिय हिन्दू संगठन और कट्टर वहाबी विचारधारा के प्रसार में लगी मुस्लिम संस्थाएं देश को मध्यकाल में वापस ले जाने की भूमिका तैयार कर रही हैं।
इक्कीसवी सदी के वैज्ञानिक युग में भी हम अधिसंख्यक भारतीय धर्म, जाति, मंदिर-मस्जिद, दाढ़ी-टोपी, मुल्ले-साधु, मनुस्मृति, शरीयत और गाय-गोबर-गोमूत्र में अपना भविष्य खोज रहे हैं। हमारी सोच की यह प्रतिगामी यात्रा हमें कहां ले जाएगी, इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं है।
बहरहाल दंभ, अंधविश्वास, छद्म धार्मिकता और मूर्खताओं की गलाकाट प्रतियोगिता में एक दूसरे को पीछे छोड़ने की अथक कोशिशों में लगे दोनों पड़ोसी देशों - भारत और पाकिस्तान को उनकी यौमे आज़ादी की शुभकामनाएं !

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